श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 24

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 35 मिनट का पठन 115 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च | नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ||२४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
अच्छेद्यः
अकाट्य
अयम्
यह
अदाह्यः
अदाह्य
अयम्
यह
अक्लेद्यः
अभेद्य (गीला न होने वाला)
अशोष्यः
असुख्य (सूख न सकने वाला)
एव
ही
च
और
नित्यः
नित्य
सर्वगतः
सर्वव्यापी
स्थाणुः
स्थिर
अचलः
अचल
अयम्
यह
सनातनः
सनातन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यह आत्मा अच्छेद्य (काटा नहीं जा सकता), अदाह्य (जलाया नहीं जा सकता), अक्लेद्य (गीला नहीं किया जा सकता), और अशोष्य (सुखाया नहीं जा सकता) है। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भूमिका एवं आध्यात्मिक महत्त्व

सनातन हिंदू धर्म और भारतीय दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को उपनिषदों का सार माना गया है। भगवान श्री कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अर्जुन को दिए गए उपदेश केवल एक युद्धनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण मानव जाति के लिए आत्मज्ञान और जीवन के परम सत्य का मार्गदर्शक ग्रंथ हैं। विशेष रूप से, गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) में आत्मा के अमरता का जो वैज्ञानिक, तार्किक और आध्यात्मिक निरूपण मिलता है, वह विश्व साहित्य में अद्वितीय है। जब अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं और युद्ध से विरत होने का विचार करते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उनके अज्ञान को दूर करने के लिए आत्मा के अश्वर, अजर और अमर स्वरूप का विस्तार से वर्णन करते हैं।

यह श्लोक—"अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च | नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ||२४||"—जीवात्मा की अमरता का उद्घोष करने वाला परम श्लोक है। आधुनिक युग में जहाँ मनुष्य भौतिकता की दौड़ में अपनी मानसिक शांति खो रहा है, और मृत्यु के भय से ग्रसित रहता है, वहाँ यह श्लोक एक महान संबल प्रदान करता है। यह मनुष्य को यह अहसास कराता है कि यह शरीर केवल एक वस्त्र के समान है, जिसे आत्मा त्यागती है, किंतु आत्मा स्वयं सर्वव्यापी, अचल और सनातन है। इस प्रकार, इस श्लोक का पठन, मनन और श्रवण साधक को शोक, मोह, और भय के बंधनों से मुक्त कर परम चेतना से जोड़ता है तथा उसे जीवन के वास्तविक उद्देश्य यानी मोक्ष या आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता अथ द्वितीयोऽध्यायः (सांख्ययोगः) ॥

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४॥


पदच्छेद: अच्छेद्यः अयम् अदाह्यः अयम् अक्लेद्यः अशोष्यः एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुः अचलः अयम् सनातनः॥

पाठ विधि एवं ध्यान:

इस श्लोक का दैनिक प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके शांत चित्त से कम से कम 11 बार पाठ करना चाहिए। पाठ के समय अपने भीतर आत्मा की अजर-अमर ज्योति का ध्यान करना चाहिए। यह विधि चित्त को एकाग्र करने और मानसिक दृढ़ता प्रदान करने में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद में सनातन संस्कृति के महान दार्शनिक तत्व निहित हैं। आइए तालिका के माध्यम से इसके हर एक शब्द के साधारण और आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अच्छेद्यः (Achhedyah) जिसे काटा न जा सके आत्मा पर किसी भी प्रकार के शस्त्र (तलवार, बाण आदि) का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह किसी भी भौतिक यंत्र से खंड-खंड नहीं की जा सकती।
अयम् (Ayam) यह (आत्मा) प्रत्येक शरीर में निवास करने वाली वह चेतन सत्ता या आत्म-तत्त्व जिसकी ओर भगवान संकेत कर रहे हैं।
अदाह्यः (Adahyah) जिसे जलाया न जा सके अग्नि इस आत्मा को दग्ध नहीं कर सकती। सांसारिक आग केवल शरीर को जलाती है, आत्मा उससे पूर्णतः परे और अप्रभावित रहती है।
अक्लेद्यः (Akledyah) जिसे गलाया या गीला न किया जा सके जल इस आत्मा को भिगो या गला नहीं सकता। यह जल और द्रव्यों के प्रभाव से परे है।
अशोष्यः (Ashoshyah) जिसे सुखाया न जा सके वायु या धूप इस आत्मा के सार को सुखा नहीं सकती। यह प्राकृतिक तत्वों के क्षयकारी प्रभावों से पूरी तरह मुक्त है।
नित्यः (Nityah) सदा रहने वाला (अमर) आत्मा का कभी जन्म नहीं होता और न कभी मृत्यु होती है। यह भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालों से परे नित्य निरंतर है।
सर्वगतः (Sarvagatah) सर्वव्यापी आत्मा सर्वत्र विद्यमान है। यह किसी एक स्थान या देश तक सीमित नहीं है, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है।
स्थाणुः (Sthanuh) स्थिर / अडिग यह वृक्ष के तने की भाँति या पर्वत की भाँति अचल और दृढ़ है, जो अपने मूल स्वरूप से कभी विचलित नहीं होता।
अचलः (Achalah) गतिहीन या स्थिर रहने वाला जिसमें किसी भी प्रकार का विकार या गमन-आगमन (भौतिक अर्थ में) नहीं होता, वह सनातन रूप से अपनी ही महिमा में स्थित है।
सनातनः (Sanatanah) पुराना होते हुए भी हमेशा नया (शाश्वत) सनातन का अर्थ है जिसका न कभी आदि है और न अंत। यह शाديन और सार्वकालिक सत्य है जो सृष्टि के प्रलयकाल में भी शेष रहता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत का महायुद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, जब कौरव और पाण्डव सेनाएं आमने-सामने थीं, तब पांडवश्रेष्ठ अर्जुन ने अपने सारथि बने भगवान श्रीकृष्ण से अपनी सेनाओं के मध्य रथ खड़ा करने का अनुरोध किया। रथ जब दोनों सेनाओं के बीच पहुँचा, तो अर्जुन ने देखा कि सामने उनके ही गुरु (द्रोणाचार्य), पितामह (भीष्म पितामह), भाई, भतीजे और अन्य स्नेहीजन खड़े हैं। इस दृश्य को देखकर अर्जुन का हृदय करुणा, मोह और विषाद से भर गया। उनके हाथ से गाण्डीव धनुष फिसलने लगा, उनका शरीर कांपने लगा और उनका मन विचलित हो गया। अर्जुन ने युद्ध करने से स्पष्ट इनकार कर दिया और कहा कि ऐसे प्रियजनों को मारकर मुझे त्रैलोक्य का राज्य भी मिल जाए, तब भी मैं यह पाप नहीं करना चाहता।

इस अत्यंत नाजुक, मोहग्रस्त और कायरतापूर्ण स्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के अज्ञान को दूर करने के लिए जो उपदेश दिया, वही 'श्रीमद्भगवद्गीता' के रूप में विख्यात हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले अर्जुन की इस मानसिक दुर्बलता की भर्त्सना की और उसे क्षात्रधर्म की याद दिलाई। इसके बाद, आत्मा और शरीर के भेद को समझाते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि शरीर तो नश्वर है—आज है तो कल नष्ट हो जाएगा, किंतु इसके भीतर विराजमान आत्मा अजेय, अमर और अछेद्री है।

ऋषि व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अंश (भीष्म पर्व) में यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि जीवन के हर संकट और विषाद के क्षण में केवल आत्मज्ञान ही मनुष्य को सही मार्ग दिखा सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के इन विशिष्ट गुणों (अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य आदि) के माध्यम से अर्जुन के भीतर छिपे मृत्यु के भय और मोह को जड़ से उखाड़ फेंका। यह ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रसंग आज भी संपूर्ण मानवता को कर्तव्य पथ पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है, भले ही परिस्थितियां कितनी भी विकट क्यों न हों।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान श्लोक का निरंतर पठन, मनन और स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मृत्यु भय से मुक्ति (Freedom from Fear of Death)

आत्मा के अछेद्री और अमर स्वरूप को जान लेने से मनुष्य के मन से मृत्यु का स्वाभाविक भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है, क्योंकि उसे यह ज्ञात हो जाता है कि मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं।

2. मानसिक शांति एवं स्थिरता (Mental Peace & Stability)

नियमित रूप से इस श्लोक का जाप करने से चंचल मन शांत होता है। यह जीवन की उथल-पुथल और दुखों के बीच भी व्यक्ति को स्थिर (स्थाणु और अचल) रहने की मानसिक शक्ति प्रदान करता है।

3. कर्मयोग की प्रेरणा (Inspiration for Karma Yoga)

यह श्लोक फल की चिंता या हानि के भय से मुक्त होकर अपने कर्तव्य (कर्म) का पालन करने की अद्भुत प्रेरणा देता है, जिससे व्यक्ति निष्काम कर्मयोगी बन जाता है।

4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura & Energy)

संस्कृत के इन दिव्य शब्दों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें आसपास के वातावरण को शुद्ध करती हैं और साधक के चारों ओर एक उच्च आध्यात्मिक सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनाती हैं।

5. शोक और मोह का नाश (Eradication of Grief and Delusion)

प्रियजनों के वियोग या भौतिक हानियों के कारण उत्पन्न होने वाले अत्यधिक शोक और मोह को दूर करने के लिए यह श्लोक अचूक औषधि का कार्य करता है।

6. आत्म-साक्षात्कार का मार्ग (Path to Self-Realization)

लगातार आत्म-स्वरूप का चिंतन करते रहने से साधक धीरे-धीरे बाह्य जगत से हटकर अपने भीतर स्थित परमात्मा की अंश स्वरूपा आत्मा का अनुभव करने लगता है।

7. कार्मिक शुद्धि (Purification of Karma)

भगवान श्रीकृष्ण के वचनों का स्मरण करने और उनके मर्म को जीवन में उतारने से संचित पाप कर्मों का क्षय होता है और जीवन में सात्विक वृत्तियों का विकास होता है।

8. भगवत कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)

गीता के ज्ञान को आत्मसात करने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुकी कृपा सदैव बनी रहती है, और वह जीवन के प्रत्येक पग पर सुरक्षित महसूस करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री प्राचीन वेदों, उपनिषदों और विशेष रूप से महर्षि वेद व्यास विरचित श्रीमद्भगवद्गीता (भीष्म पर्व, महाभारत) के मूल ग्रंथों और प्रामाणिक टीकाओं के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन संस्कृति, संस्कृत व्याकरण और दार्शनिक सत्यों का प्रस्तुतिकरण पूरी प्रमाणिकता, आदर और स्पष्टता के साथ हो, ताकि हमारे पाठकों तक सही और भ्रमरहित ज्ञान पहुँच सके। इस आलेख का उद्देश्य पाठकों को आत्मकेंद्रित बनाना और उन्हें उनके मूल आध्यात्मिक स्वरूप से परिचित कराना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह पावन श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का 24वां श्लोक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा के अमर और शाश्वत स्वरूप का उपदेश दिया है।

इनका अर्थ क्रमशः यह है—अच्छेद्य यानी जिसे काटा न जा सके, अदाह्य यानी जिसे अग्नि द्वारा जलाया न जा सके, और अक्लेद्य यानी जिसे जल द्वारा गीला या गलाया न जा सके। यह तीनों शब्द आत्मा की अश्वरता को दर्शाते हैं।

इस श्लोक के नियमित पाठ से मनुष्य के भीतर का मृत्यु का भय, अज्ञात चिंताएं और मानसिक अस्थिरता समाप्त होती है। यह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मन को शांत और अडिग रखने की शक्ति प्रदान करता है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान संपूर्ण मानव जाति के लिए है। किसी भी आयु, वर्ग या पृष्ठभूमि का व्यक्ति पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ इस श्लोक का पाठ और मनन कर सकता है।

'सर्वगतः' का अर्थ है कि आत्मा सर्वव्यापी है (हर जगह विद्यमान है), और 'सनातनः' का अर्थ है कि यह शाश्वत है यानी इसका न कभी आदि है और न कभी अंत। यह काल और देश की सीमाओं से परे है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यह आत्मा अकाट्य, अदाह्य, अभेद्य और असुख्य है। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है। This Self is unbreakable, incombustible, cannot be wetted nor dried. It is eternal, all-pervading, unchanging, immovable, and primeval.

सार / Essence

आत्मा के इन गुणों को जानकर अर्जुन को अपने शोक से ऊपर उठना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 24 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 24/72 33% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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