श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 26

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 40 मिनट का पठन 115 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् | तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ||२६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
अथ
अब
च
और
एनम्
इस (शरीर) को
नित्यजातम्
बार-बार जन्मने वाला
नित्यम्
सदा
वा
या
मन्यसे
मानते हो
मृतम्
मरने वाला
तथापि
तो भी
त्वम्
तू
महाबाहो
हे महाबाहो
न
नहीं
एवम्
इस प्रकार
शोचितुम्
शोक करना
अर्हसि
योग्य है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

और यदि तू इस (शरीर) को बार-बार जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानता है, तब भी हे महाबाहो! तुझे इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) का आधिकारिक आध्यात्मिक और शास्त्रीय शोध ग्रंथ


आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण

श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) का यह छब्बीसवाँ श्लोक (अथ चैनं नित्यजातं...) भारतीय सनातन दर्शन, वेदांत और जीवन-मृत्यु के शाश्वत सत्य का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और बौद्धिक रूप से झकझोर देने वाला स्तंभ है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन विषाद से ग्रस्त होकर अपने स्वजनों के वध की आशंका से कांप रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल सांत्वना नहीं दी, बल्कि अस्तित्व के उस अकाट्य सत्य से परिचित कराया, जो काल, समय और भौतिक सीमाओं से परे है। सामान्य मानव जीवन में मृत्यु एक ऐसा विषय है जिसके नाम से ही भय, शोक, अवसाद और मोह का आवरण छा जाता है। व्यक्ति अपने प्रियजनों के शरीर छूटने पर इस प्रकार विलाप करता है मानो उसका संपूर्ण अस्तित्व ही नष्ट हो गया हो।

किंतु, इस दिव्य श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन और समस्त मानवता को यह समझाते हैं कि प्रकृति का यह नियम अत्यंत अटल है कि जो इस भौतिक संसार में जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जिसकी मृत्यु हुई है, उसका पुनर्जन्म भी सुनिश्चित है। इस प्रकार जन्म और मर्जी का यह चक्र पहिए की भांति निरंतर घूमता रहता है। यदि कोई व्यक्ति भौतिकवादी दृष्टिकोण से यह भी मान ले कि आत्मा जैसी कोई अमर वस्तु नहीं है और केवल यह भौतिक शरीर ही सब कुछ है, तो भी प्रकृति के इस अनिवार्य नियम (उत्पत्ति और विनाश) के अनुसार शोक मनाने का कोई तार्किक या वैचारिक आधार नहीं बचता। शोक और मोह तब उत्पन्न होते हैं जब हम नश्वर को अनश्वर और अनश्वर को नश्वर मान लेते हैं।

भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपरा में जीवन को केवल सत्तर-अस्सी वर्षों के इस कालखंड तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि इसे आत्मा की अनंत यात्रा का एक अल्पकालिक पड़ाव माना गया है। 'महाबाहो' (हे महान भुजाओं वाले) कहकर श्रीकृष्ण अर्जुन के उस पराक्रम और पुरुषार्थ का आह्वान करते हैं जो केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि आंतरिक कमजोरियों, अज्ञानता, शोक और मानसिक दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करने के लिए भी आवश्यक है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन के अनिवार्य सत्यों को स्वीकार करके ही हम मानसिक शांति, उच्चतर चेतना और समत्व भाव को प्राप्त कर सकते हैं। भक्तिलोक.इन (Bhaktilok.in) के इस समर्पित आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के विभिन्न आयामों, शाब्दिक अर्थों, पौराणिक संदर्भों और हमारे दैनिक जीवन पर पड़ने वाले इसके गहरे प्रभावों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे ताकि हर साधक अज्ञान के अंधकार से निकलकर ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर हो सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री परमात्मने नमः

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥२६॥


पदच्छेद:

अथ च एनम् नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् | तथा अपि त्वं महाबाहो न एवम् शोचितुम् अर्हसि ||

पारायण विधि: इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात शांत चित्त से करना चाहिए। गीता के दूसरे अध्याय के इस भाग का स्मरण मन को अतीन्द्रिय शांति प्रदान करता है और शोक-संताप से मुक्ति दिलाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द का गहराई से अध्ययन करने पर इसके दार्शनिक और आध्यात्मिक संदेश की परतें खुलती हैं। नीचे दी गई सारणी में प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका व्यापक आध्यात्मिक व दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अथ (अथ) अब, अथवा, यदि, इस प्रकार यह शब्द पिछली तार्किक चर्चा से आगे बढ़कर एक नए और वैकल्पिक दृष्टिकोण (Hypothesis) की ओर संकेत करता है।
च (च) और, भी तर्कों की श्रृंखला को जोड़ते हुए एक दूसरा पक्ष प्रस्तुत करने का संयोजक पद।
एनम् (एनम्) इस (आत्मा या शरीर को) यहाँ 'एनम्' का संदर्भ उस दृश्यमान शरीर या अव्यक्त आत्मा से है जिस पर अर्जुन शोक कर रहे हैं।
नित्यजातं (नित्यजातम्) सदा उत्पन्न होने वाला / निरंतर जन्म लेने वाला यह बहुत भौतिकवादी या प्रकृति के स्वभाव की ओर संकेत करता है कि भौतिक रूप से हर क्षण संसार में जन्म और सृजन हो रहा है।
नित्यं (नित्यम्) सदा, निरंतर, हमेशा काल की निरंतरता को दर्शाता है, जहाँ परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर सत्य है।
वा (वा) अथवा, या दो अलग-अलग तर्कों (या तो सदा जन्मने वाला मानो, या सदा मरने वाला मानो) के बीच विकल्प।
मन्यसे (मन्यसे) तुम मानते हो / समझते हो भगवान अर्जुन की बुद्धि और उनके पूर्वाग्रहों या भौतिकवादी सोच को संबोधित कर रहे हैं।
मृतम् (मृतम्) मरा हुआ, मृत विनाश या शरीर के पतन की स्थिति, जिसे लोग जीवन का अंत मान लेते हैं।
तथापि (तथा अपि) तो भी, फिर भी सभी संभावित तर्कों और मान्यताओं के बावजूद निष्कर्ष क्या होना चाहिए, इसका परिचय।
त्वं (त्वम्) तुम (अर्जुन) व्यक्तिगत रूप से साधक या जिज्ञासा रखने वाले जीव का संबोधन।
महाबाहो (महाबाहो) हे महान भुजाओं वाले, पराक्रमी अर्जुन के क्षत्रिय धर्म, बल और उनके उच्च सामर्थ्य की याद दिलाना ताकि वे कायरता त्यागें।
नैवम् (न एवम्) ऐसा नहीं, इस प्रकार नहीं शोक करने की अज्ञानतापूर्ण प्रवृत्ति का निषेध।
शोचितुमर्हसि (शोचितुम् अर्हसि) शोक करने योग्य हो / तुम्हें शोक करना चाहिए 'न अर्हसि' के साथ मिलकर इसका अर्थ बनता है कि तुम शोक करने योग्य नहीं हो, तुम्हें विलाप नहीं करना चाहिए।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवत गीता का यह प्रसंग महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर आता है, जब कौरव और पाण्डव सेनाएं कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में आमने-सामने खड़ी थीं। यह वह क्षण था जब इतिहास का सबसे बड़ा धर्मयुद्ध प्रारंभ होने ही वाला था, किंतु ठीक युद्ध से पहले पाण्डवों के मुख्य सेनापति और श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन ने अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलने का अनुरोध भगवान श्रीकृष्ण से किया, जो उनके सारथी बने थे।

जब अर्जुन ने अपने ही गुरुओं (द्रोणाचार्य, कृराचार्य), पितामह (भीष्म), भाइयों, मित्रों और संबंधियों को युद्ध के मैदान में अपनों के विरुद्ध खड़ा देखा, तो उनका मोह अत्यधिक बढ़ गया। उनका शरीर कांपने लगा, गांडीव धनुष उनके हाथों से फिसलने लगा, और मानसिक रूप से वे पूरी तरह टूट गए। उन्होंने श्रीकृष्ण से स्पष्ट कह दिया कि वे अपने स्वजनों का वध करके किसी भी प्रकार का राज्य, सुख या विजय नहीं चाहते। उनके भीतर का यह विषाद वस्तुतः अज्ञान, मोह और कर्तव्यच्युति का मिश्रण था।

यहाँ महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस दिव्य अंश (भीष्म पर्व) में भगवान श्रीकृष्ण एक गुरु और जगत के मार्गदर्शक के रूप में प्रकट होते हैं। उन्होंने सबसे पहले अर्जुन की इस कायरता और वैराग्य के छद्म आवरण को फटकारा और उसे 'क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ' (हे पार्थ, नपुंसकता को मत प्राप्त हो) कहकर चेताया। इसके पश्चात, आत्मा की अमरता, शरीर की नश्वरता, और कर्मयोग के सिद्धांतों का उपदेश देना शुरू किया। श्लोक २६वां इसी तार्किक श्रृंखला की कड़ी है। श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि यदि तुम यह मान भी लो कि आत्मा नाम की कोई चीज नहीं है और शरीर ही सब कुछ है, तो भी प्रकृति का शाश्वत नियम यही है कि जो जन्मा है वह मरेगा और जो मरा है वह पुनः किसी न किसी रूप में उत्पन्न होगा। इस प्रकार, इस प्राकृतिक और अपरिवर्तनीय नियम पर शोक करना केवल ऊर्जा की बर्बादी और अज्ञानता का लक्षण है। यह ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि हमें यह सिखाती है कि जीवन के संकटों में किस प्रकार उच्च ज्ञान के द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवत गीता के इन श्लोकों का नियमित पठन, मनन और इनके गूढ़ अर्थों का जीवन में उतरना साधक के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मृत्यु के भय से मुक्ति (Freedom from Fear of Death)

इस श्लोक के निरंतर चिंतन से व्यक्ति के मन से मृत्यु का अस्वाभाविक भय समाप्त हो जाता है और वह जीवन को एक सहज प्रवाह के रूप में स्वीकार करने लगता है।

2. मानसिक शांति और स्थिरता (Mental Peace & Stability)

प्रियजनों के वियोग या जीवन की असफलताओं के कारण उत्पन्न होने वाले गंभीर शोक और अवसाद से उबरने में यह अचूक औषधि का कार्य करता है।

3. सकारात्मक और ऊर्जावान आभा (Positive Aura)

शोक और विलाप से मनुष्य की ऊर्जा क्षीण होती है। इस ज्ञान को आत्मसात करने से प्राणशक्ति बढ़ती है और चारों ओर एक सकारात्मक तथा शांत ऊर्जा का संचार होता है।

4. कर्म के प्रति निष्ठा (Dedication to Duty / Karmayoga)

परिणामों की चिंता और प्रियजनों के खोने के डर से मुक्त होकर व्यक्ति अपने वर्तमान कर्तव्य (कर्म) को पूरी ईमानदारी और दृढ़ता के साथ निभा पाता है।

5. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

अज्ञानजनित मोह और आसक्ति के कारण जो पापकर्म या मानसिक विकृतियां उत्पन्न होती हैं, वे दिव्य ज्ञान के प्रकाश में भस्म हो जाती हैं, जिससे अंतःकरण शुद्ध होता है।

6. समत्व भाव की प्राप्ति (Attainment of Equanimity)

सुख और दुःख, लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु जैसी द्वंद्वात्मक स्थितियों में मन को समभाव में रखने की अद्भुत क्षमता विकसित होती है।

7. ईश्वर कृपा और भक्ति का अनुभव (Divine Grace & Devotion)

गीता के वचनों को भगवान का प्रत्यक्ष संदेश मानकर अध्ययन करने से साधक की भक्ति प्रगाढ़ होती है और उसे श्रीहरि की अनुकंपा का अनुभव होता है।

8. उच्चतर चेतना का विकास (Evolution of Higher Consciousness)

स्थूल भौतिक जगत से ऊपर उठकर सूक्ष्म और आध्यात्मिक जगत की वास्तविकताओं को समझने की बुद्धि जाग्रत होती है, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलोक.इन (Bhaktilok.in) के संपादकीय मंडल, संस्कृत भाषाविदों और सनातन धर्म के मर्मज्ञों द्वारा इस आलेख को अत्यधिक प्रामाणिकता, शोध और पारंपरिक वैदिक मान्यताओं के आधार पर तैयार किया गया है। श्रीमद्भागवत गीता के मूल श्लोकों के अर्थ निकालते समय आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और संत ज्ञानेश्वर महाराज जैसे महान आचार्यों के भाष्यों का सूक्ष्म अध्ययन किया गया है ताकि पाठकों तक शुद्ध, मिलावट रहित और जीवनोपयोगी आध्यात्मिक ज्ञान पहुंच सके।

हमारा उद्देश्य केवल धार्मिक ग्रंथों के शब्दों को प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि आधुनिक युग की भागदौड़ और मानसिक तनाव से जूझ रहे हर साधक के जीवन में इन शाश्वत सत्यों के माध्यम से सकारात्मक परिवर्तन लाना है। इस विषय पर किसी भी प्रकार के संशय या व्यक्तिगत मार्गदर्शन के लिए आप हमारे विद्वान आचार्यों से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जन्म और मृत्यु प्रकृति का एक अटल और निरंतर चलने वाला नियम है। यदि आत्मा की अमरता को छोड़ भी दिया जाए और केवल भौतिक दृष्टिकोण से भी देखा जाए, तब भी जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, इसलिए किसी की मृत्यु पर अत्यधिक शोक या विलाप करना तार्किक रूप से उचित नहीं है।

'महाबाहो' का अर्थ है 'महान भुजाओं वाले' या पराक्रमी। श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके क्षत्रिय धर्म, आंतरिक बल और पुरुषार्थ का स्मरण कराते हैं ताकि वे कायरता, मोह और शोक के दुर्बल भावों से बाहर निकलकर अपने वास्तविक कर्तव्यों का पालन कर सकें।

मानवीय संवेदनाओं के कारण प्रियजन के जाने पर दुःख होना स्वाभाविक है, किंतु उस दुःख में डूबकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाना, मानसिक संतुलन खो देना और शोक को ही जीवन का सत्य मान लेना गीता के अनुसार अज्ञानता है। यह श्लोक हमें अति-शोक से उबरने और विवेक से काम लेने की प्रेरणा देता है।

जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं कि संसार की हर वस्तु और शरीर नश्वर है, तो हमारे मन से भविष्य की अनिश्चितताओं और खोने का भय कम होने लगता है। यह दृष्टिकोण हमारे मानसिक विकारों को शांत करता है और हमें वर्तमान में जीने की शक्ति देता है।

यह श्लोक श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) से लिया गया है। कुरुक्षेत्र के रणभूमि में जब अर्जुन युद्ध से पीछे हटने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मा और शरीर के भेद को समझाते हुए यह उपदेश दिया था।

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संकलन एवं संपादन: मुख्य devotional scholar और Sanskrit linguist टीम द्वारा।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

और यदि तू इस शरीर को बार-बार जन्म लेने वाला और सदा मरने वाला मानता है, तो भी हे महाबाहो! तुझे इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए। Even if you consider the body to be constantly born and dying, O mighty-armed, still you should not grieve.

तर्क / Logic

जन्म और मृत्यु शरीर के स्वाभाविक धर्म हैं। जो पैदा हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए शोक निरर्थक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 26 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 26/72 36% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!