श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 27

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 35 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च | तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ||२७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
जातस्य
जन्मे हुए की
हि
निश्चय ही
ध्रुवः
निश्चित
मृत्युः
मृत्यु
ध्रुवम्
निश्चित
जन्म
जन्म
मृतस्य
मरे हुए का
च
और
तस्मात्
इसलिए
अपरिहार्ये
अवश्यम्भावी
अर्थे
विषय में
न
नहीं
त्वम्
तू
शोचितुम्
शोक करना
अर्हसि
योग्य है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य (अवश्यम्भावी) विषय में तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Bhaktilok.in — सनातन धर्म, श्रीमद्भगवद्गीता और वेदान्त दर्शन का पावन ज्ञानकोश

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय महत्ता

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को संपूर्ण मानव जाति के लिए एक जीवन्त मार्गदर्शिका माना गया है। यह ग्रंथ केवल युद्ध के मैदान में दिया गया उपदेश मात्र नहीं है, अपितु यह जीवन और मृत्यु के महान रहस्यों को सुलझाने वाली एक सार्वभौमिक कुंजी है। जब हम संसार के बंधनों और दुखों के सागर में गोता लगाते हैं, तब हमें अपने अस्तित्व के मूल सत्य से साक्षात्कार कराने वाली इस दिव्य वाणी की आवश्यकता होती है। प्रस्तुत श्लोक—“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च | तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ||२७||”—श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का एक अत्यंत ही मर्मस्पर्शी और ज्ञानवर्धक श्लोक है। यह मनुष्य को उसके जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई, यानी मृत्यु और पुनर्जन्म के शाश्वत चक्र से परिचित कराता है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक अद्वैत वेदांत और कर्मयोग की नींव को मजबूत करता है। भारतीय मनीषा ने कभी भी मृत्यु को अंत नहीं माना, बल्कि इसे चेतना की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करने का माध्यम स्वीकार किया है। आधुनिक युग में, जहां इंसान भौतिकता की दौड़ में अपनी मानसिक शांति खो रहा है और प्रियजनों के बिछड़ने या नाशवान वस्तुओं के नष्ट होने पर अत्यधिक शोक में डूब जाता है, वहां यह श्लोक एक महान संबल प्रदान करता है। यह मनुष्य की चेतना को संकुचित दायरे से निकालकर ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ता है। जब एक साधु, जिज्ञासु या साधारण मनुष्य इस गूढ़ सत्य को अपने जीवन में उतार लेता है, तो उसके भीतर से भय, मोह और शोक की काली छाया हमेशा के लिए छंट जाती है। यही कारण है कि भगवद्गीता के इस श्लोक का पठन और मनन हमारे दैनिक जीवन में मानसिक स्थिरता, आत्मबल और परम शांति का संचार करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ २७ ॥


जातस्य हि ध्रुवः मृत्युः ध्रुवम् जन्म मृतस्य च।
तस्मात् अपरिहार्ये अर्थे न त्वम् शोचितुम् अर्हसि॥

(उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के विराम और दीर्घ स्वरों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'मृत्युर्ध्रुवो' में विसर्ग संधि का सुंदर प्रयोग हुआ है, जिसके उच्चारण से वाणी में पवित्रता और मन में एकाग्रता आती है।)

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद में वेदान्त का सार छिपा हुआ है। आइए, तालिका के माध्यम से इसके हर एक शब्द के सरल अर्थ और उनके आध्यात्मिक आयाम को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
जातस्य उत्पन्न हुए प्राणी का / जन्म लेने वाले का जो भी जीव इस संसार में भौतिक शरीर धारण कर चुका है, उसका जन्म ही इस बात की घोषणा है कि वह नश्वर है।
हि निश्चय ही / क्योंकि यह ब्रह्मांडीय नियम अकाट्य है, इसमें किसी भी प्रकार के अपवाद या संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।
ध्रुवः निश्चित / अटल / सत्य वह सत्य जो काल, समय और स्थान की सीमाओं से परे होकर सदैव एक जैसा रहता है, वही ध्रुव है।
मृत्युः मृत्यु / शरीर का पतन भौतिक शरीर का पंचतत्वों में विलीन होना। यह आत्मा का अंत नहीं, केवल आवरण का बदलना है।
ध्रुवम् निश्चित रूप से सत्य मृत्यु के उपरांत पुनर्जन्म का चक्र भी उतना ही अकाट्य और शाश्वत सत्य है जितना कि जन्म के बाद मृत्यु।
जन्म उत्पत्ति / नया शरीर धारण करना कर्मों के अनुसार आत्मा का पुनः किसी योनि में जन्म लेना और कर्म फल भोगने की यात्रा शुरू करना।
मृतस्य च और मरे हुए (शरीर छोड़े हुए) जीव का जिसने अपनी वर्तमान देह त्याग दी है, उसका नया मार्ग और नया जन्म भी प्रकृति के नियमों के अंतर्गत तय है।
तस्मात् इसलिए / इस कारण से जब संपूर्ण सत्य स्पष्ट हो चुका है, तब अर्जुन (या साधक) के लिए भ्रम में रहने का कोई कारण नहीं बचता।
अपरिहार्ये अर्थे जिसे टाला न जा सके, ऐसे अटल विषय पर प्रकृति के इस अनिवार्य विधान को संसार में कोई भी देवी-देवता या महापुरुष भी बदल नहीं सकता।
न त्वं शोचितुमर्हसि तुझे शोक करना उचित नहीं है अतः हे अर्जुन! इस अपरिहार्य सत्य को जानकर व्यर्थ की चिंता या विलाप करना तेरी बुद्धिमत्ता के अनुकूल नहीं है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महारणकुरुक्षेत्र से जुड़ी हुई है। जब कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने थीं, तब हस्तिनापुर के राजकुमार और भगवान श्री कृष्ण के परम सखा अर्जुन मोह और विषाद के अथाह सागर में डूब गए। अपने ही गुरुजनों, दादा भीष्म, आचार्यों, भाइयों और संबंधियों को युद्धभूमि में देखकर अर्जुन का गांडीव उनके हाथों से छूटने लगा। उनके मन में यह विचार आया कि यदि युद्ध में अपनों का वध करना पड़े, तो ऐसे विजय या राज्य का क्या लाभ जिसमें अपने ही रक्त से धरती लाल हो जाए। अर्जुन का यह विलाप केवल पारिवारिक मोह तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उस मूल मानवीय दुर्बलता का प्रतीक था जो हर व्यक्ति को संकट के समय घेर लेती है।

तब भगवान श्री कृष्ण ने जगतगुरु की भूमिका निभाते हुए अर्जुन के इस अज्ञान को दूर करने का बीड़ा उठाया। श्री कृष्ण ने सबसे पहले अर्जुन को डांटा और उसकी इस कायरता को 'क्लीब्यम्' (नपुंसकता/हीनता) कहकर संबोधित किया, जो उसकी आंतरिक वीरता के विपरीत थी। भगवान ने समझाया कि तू जिन शरीरधारियों के लिए शोक कर रहा है, वे शरीर नश्वर हैं किंतु आत्मा अमर है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत के इस अंश (श्रीमद्भगवद्गीता) में यह श्लोक सांख्य योग के अंतर्गत आता है। भगवान कृष्ण ने स्पष्ट किया कि शोक करने से न तो मरा हुआ व्यक्ति वापस आ सकता है और न ही प्रकृति का चक्र रुक सकता है। अज्ञानी लोग रूप, रंग और शरीर के नाश पर रोते हैं, जबकि ज्ञानी पुरुष न तो जीवित के लिए शोक करते हैं और न ही मृत के लिए। इस प्रकार, यह ऐतिहासिक प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन के सबसे बड़े संघर्षों के बीच भी कर्तव्य (धर्म) से विमुख होना उचित नहीं है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन या स्मरण करने से साधक को अनेक प्रकार के मानसिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

जीवन की अनिश्चितताओं और असफलताओं के कारण उत्पन्न होने वाली चिंता, तनाव और अवसाद से मुक्ति मिलती है तथा मन शांत रहता है।

2. मृत्यु के भय का शमन

यह श्लोक मनुष्य के मन से मृत्यु का स्वाभाविक भय दूर करता है और उसे यह समझाता है कि आत्मा अमर है, जिससे जीवन जीने का दृष्टिकोण बदल जाता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

नियमित जप से व्यक्ति की औरा (Aura) शुद्ध होती है और नकारात्मक विचार समाप्त होकर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।

4. कर्म के प्रति निष्ठा

व्यक्ति फल की चिंता और भविष्य के अनावश्यक शोक से मुक्त होकर अपने वर्तमान कर्म पर पूरी एकाग्रता और निष्ठा के साथ ध्यान केंद्रित कर पाता है।

5. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

गीता के वचनों का चिंतन करने से अज्ञान रूपी मलिनता दूर होती है और अंतःकरण पवित्र तथा निर्मल बनता है।

6. मोह और आसक्ति से मुक्ति

संसार की नाशवान वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति अत्यधिक मोह समाप्त होता है, जिससे दुख के अवसरों पर भी सहनशक्ति बनी रहती है।

7. आध्यात्मिक जागृति

साधक धीरे-धीरे भौतिक जगत से ऊपर उठकर आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) और परमात्मा की भक्ति की ओर अग्रसर होता है।

8. भगवत कृपा की प्राप्ति

भगवान श्री कृष्ण के उपदेशों को जीवन में उतारने से भक्त को भगवान की अहैतुकी कृपा और परम शांति का अनुभव होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को वेदान्त दर्शन, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और स्वामी रामसुखदास जी के विवेचन के आधार पर), तथा महाभारत के पौराणिक संदर्भों का गहन अध्ययन करके तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन संस्कृति के मूल सिद्धांतों को बिना किसी मिलावट के, अत्यंत सरल और प्रामाणिक हिंदी में पहुंचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय हमारी संपादकीय टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक श्लोक का अर्थ व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध हो और उसका दार्शनिक मर्म आधुनिक संदर्भों में भी प्रासंगिक बना रहे। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा और मूल ग्रंथों के प्रमाण को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: यह पावन श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का 27वां (27th) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता का विस्तृत उपदेश दिया है।

उत्तर: इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जन्म और मृत्यु इस संसार के सबसे बड़े और अटल सत्य हैं। जो चीज प्रकृति के अनिवार्य नियमों (अपरिहार्य अर्थ) के अंतर्गत आती है, उसके लिए व्यर्थ का विलाप या शोक करना मूर्खता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य की संवेदनाएं समाप्त हो जाएं, बल्कि इसका तात्पर्य यह है कि हमें नाशवान शरीर के प्रति अज्ञानजनित मोह को छोड़कर शाश्वत सत्य को स्वीकार करना चाहिए।

उत्तर: हाँ, सनातन धर्म, वेद, उपनिषद और भगवद्गीता में पुनर्जन्म को एक अकाट्य सत्य माना गया है। इस श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि "मृतस्य च ध्रुवं जन्म" (अर्थात मरे हुए व्यक्ति का जन्म भी निश्चित है)। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।

उत्तर: जब किसी अपने की मृत्यु होती है, तो शोक होना स्वाभाविक मानवीय भावना है। परंतु जब कोई व्यक्ति इस श्लोक का स्मरण करता है, तो उसकी बुद्धि शोक के अंधकार से बाहर निकलकर ब्रह्मांडीय सत्य को स्वीकार करती है। यह मन को यह संबल देता है कि यह नियति है, जिसे कोई टाल नहीं सकता, जिससे मानसिक आघात से उबरने में बहुत सहायता मिलती है।

उत्तर: हाँ, इस श्लोक का प्रतिदिन पाठ करना अत्यंत लाभकारी है। इसके लिए कोई कठिन नियम नहीं हैं। प्रातःकाल स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र पहनकर, भगवान श्री कृष्ण या गीता जी के समक्ष एकाग्रचित्त होकर इसका पाठ किया जा सकता है। इसका निरंतर अभ्यास जीवन में वैराग्य, धैर्य और उच्च आध्यात्मिक चेतना का विकास करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है; और जो मरा है, उसका पुनर्जन्म निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य विषय में तू शोक न कर। For one who is born, death is certain; for one who dies, birth is certain. Therefore, you should not grieve over the inevitable.

नियति / Destiny

यह श्लोक हमें जीवन-मरण के चक्र की अनिवार्यता स्वीकार करना सिखाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 27 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 27/72 38% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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