श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 35

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 40 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः | येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ||३५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
भयात्
भय से
रणात्
युद्ध से
उपरतम्
विरत
मंस्यन्ते
मानेंगे
त्वाम्
तुझे
महारथाः
महारथी
येषाम्
जिनके
च
और
त्वम्
तू
बहुमतः
बहुत सम्मानित
भूत्वा
होकर
यास्यसि
जाएगा
लाघवम्
तुच्छता (हल्कापन)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

बड़े-बड़े योद्धा तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे, और जिनके द्वारा तू बहुत सम्मानित था, उनके पास तू तुच्छ (हल्का) हो जाएगा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: भगवद्गीता के इस श्लोक की महत्ता और वैश्विक प्रासंगिकता

सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान सर्वोच्च शिखरों पर विराजमान है। महाभारत के कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब अर्जुन अपने ही स्वजनों, गुरुओं और प्रियजनों को सामने देखकर मोह और विषाद से ग्रस्त हो जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें उनके कर्तव्य, धर्म और वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं। प्रस्तुत श्लोक—'भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः...'—गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक दृष्टि से गहरा संदेश है। इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के उस मानसिक द्वंद्व को झकझोरा है, जो युद्ध के मैदान से भागने या कर्तव्य से विमुख होने पर उत्पन्न होने वाला था।

आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं, मानसिक तनावों और नैतिक दुविधाओं के बीच यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार मनुष्य अपने यश, अपयश, सामाजिक प्रतिष्ठा और कर्तव्य पथ से भटकने के परिणामों का सामना करता है। जब एक योद्धा या कर्मयोगी अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटता है, तो समाज, सहकर्मी और प्रतिद्वंदी उसे उसकी कायरता के रूप में देखते हैं। भगवद्गीता का यह श्लोक केवल महाभारत कालीन युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर उस व्यक्ति के लिए एक जीवंत मार्गदर्शिका है जो जीवन के किसी भी रणक्षेत्र में कठिनाइयों से घबराकर मैदान छोड़कर भागने का विचार करता है। Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर हम इसी श्लोक के शाश्वत सत्यों, उसके पद-दर-पद अर्थ, पौराणिक पृष्ठभूमि और मानसिक लाभों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि साधक अपनी हर चुनौती का डटकर सामना कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीता पाठ करते समय उच्चारण की शुद्धता और लय का विशेष महत्व होता है। द्वितीय अध्याय के इस श्लोक को सस्वर पढ़ने की विधि इस प्रकार है:

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।

येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥३५॥

श्लोक का उच्चारण एवं पाठ विधि:
  • प्रथम चरण: प्रात:काल स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र मन से आसन पर बैठें।
  • द्वितीय चरण: भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप का ध्यान करते हुए श्लोक का स्पष्ट और सस्वर उच्चारण करें।
  • तृतीय चरण: प्रत्येक शब्द के उच्चारण में दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखें ताकि श्लोक की ऊर्जा और कंपन साधक के भीतर प्रवाहित हो सके।
  • चतुर्थ चरण: पाठ के पश्चात श्लोक के आंतरिक अर्थ का स्मरण करते हुए अपने दैनिक जीवन के कर्तव्यों का पालन करने का संकल्प लें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक की गहराई तक पहुँचने के लिए उसके प्रत्येक पद का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में शब्दों के अर्थ और उनके गूढ़ भावों को स्पष्ट किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
भयात् भय से, डर के कारण कदाचित युद्ध से विमुख होना वीरता नहीं, बल्कि आंतरिक भय और मानसिक कमजोरी का प्रतीक है।
रणात् रणभूमि से, युद्ध क्षेत्र से जीवन का प्रत्येक कर्मक्षेत्र एक रणभूमि है, जहाँ से पलायन करना धर्मविरुद्ध है।
उपरतम् निवृत्त हुआ, भागा हुआ, पीछे हटा हुआ अपने नियत कर्मों और कर्तव्यों को बीच में ही छोड़ देना 'उपरत' होना कहलाता है।
मंस्यन्ते मानेंगे, विचार करेंगे समाज और विरोधी लोग आपके पलायन को किस दृष्टि से देखेंगे, इसका मनोवैज्ञानिक आकलन।
त्वाम् तुझको, अर्जुन को व्यक्तिगत रूप से अर्जुन के यश और प्रतिष्ठा पर लगने वाला यह एक बड़ा दाग होगा।
महारथाः दुर्योधन, कर्ण, भीष्म आदि महान योद्धा जो स्वयं युद्ध कला में निपुण हैं, वे कायरता को कभी माफ नहीं करते और न ही उसकी सराहना करेंगे।
येषां च और जिन लोगों के लिए वे लोग जिनका सम्मान अर्जुन ने अब तक अपनी वीरता और पराक्रम से अर्जित किया था।
त्वम् तू (अर्जुन) वही अर्जुन जिसे संसार एक महान धनुर्धर और अपराजेय योद्धा के रूप में जानता है।
बहुमतः बहुत सम्मानित, अत्यधिक आदरणीय जिन्होंने तुम्हें हमेशा श्रेष्ठ माना, जिनकी नजरों में तुम्हारा स्थान सर्वोच्च था।
भूत्वा होकर (यानी पहले सम्मानित रहकर) उच्च स्थिति से अचानक गिर जाने की स्थिति का यथार्थ चित्रण।
यास्यसि तू प्राप्त हो जाएगा, पहुँच जाएगा यश के शिखर से पतन की ओर जाने की अनिवार्य गति।
लाघवम् लघुता को, अपयश को, हीनता को सम्मान का ह्रास होना, उपहास का पात्र बनना और समाज में प्रतिष्ठा का गिर जाना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध का प्रसंग सनातन इतिहास का सबसे बड़ा और निर्णयात्मक मोड़ है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब कौरवों और पांडवों की सेनाएँ आमने-सामने थीं, तब पांडव सेना के मुख्य सेनापति और महान धनुर्धर अर्जुन ने अपने सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण से अपना रथ दोनों सेनाओं के मध्य में खड़ा करने को कहा। जब अर्जुन ने देखा कि सामने खड़े लोगों में उनके अपने गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, ताऊ के पुत्र, साले, और प्रिय मित्र हैं, तो उनके भीतर मोह का एक अथाह समुद्र उमड़ पड़ा। उन्होंने गांडीव धनुष नीचे रख दिया और युद्ध न करने का निर्णय लेते हुए रथ के पिछले भाग में बैठ गए।

इस संदर्भ में, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराया। भगवान ने समझाया कि युद्ध से भागना कोई मोक्ष का मार्ग नहीं है, बल्कि यह अज्ञान, कायरता और अपने कर्तव्यों से विमुख होने का लक्षण है। दुर्योधन, कर्ण और शासन के अन्य महारथी, जो अब तक अर्जुन के पराक्रम से भयभीत रहते थे, वे यह नहीं सोचेंगे कि अर्जुन ने करुणावश युद्ध छोड़ा है। वे यही मानेंगे कि अर्जुन कौरवों के बल से डरकर रणक्षेत्र से भाग खड़ा हुआ है।

यह प्रसंग महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के 'भीष्म पर्व' के अंतर्गत भगवद्गीता के रूप में वर्णित है। इसमें मानवीय मनोविज्ञान का अद्भुत चित्रण मिलता है। जब एक प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने मार्ग से विचलित होता है, तो उसके विरोधी उसका उपहास उड़ाते हैं और समाज में उसका मान-सम्मान धूल में मिल जाता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह चेतावनी देकर उसके भीतर की सोई हुई क्षत्रिय चेतना को जगाया, ताकि वह अपनी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारी को समझे और कायरता के अंधकार से बाहर निकलकर अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करे।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

भगवद्गीता के इस श्लोक का नियमित मनन, चिंतन और जप करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक एवं मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक दृढ़ता और साहस में वृद्धि

इस श्लोक का स्मरण करने से व्यक्ति के भीतर जीवन की कठिन परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करने का अदम्य साहस उत्पन्न होता है। यह पलायनवादी प्रवृत्ति को समाप्त करता है।

2. कर्तव्य पथ पर अडिग रहना

साधक अपने व्यक्तिगत मोह और स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने नैतिक और सामाजिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना सीखता है, जिससे जीवन में सच्ची सफलता मिलती है.

3. सामाजिक प्रतिष्ठा एवं यश की रक्षा

यह श्लोक व्यक्ति को विवेकवान बनाता है ताकि वह ऐसा कोई कार्य न करे जिससे समाज में उसकी प्रतिष्ठा गिरे और वह उपहास का पात्र बने।

4. अहंकार और भ्रम का नाश

अर्जुन की तरह हमारे मन में भी कई बार भ्रम और गलत धारणाएँ जन्म लेती हैं। इस श्लोक का दिव्य ज्ञान उन सभी मानसिक विकारों और मोहरूपी बादलों को दूर करता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विकास

गीता के श्लोकों के नियमित कंपन से शरीर के आसपास सकारात्मक ऊर्जा का एक मजबूत सुरक्षा चक्र (औरा) तैयार होता है, जो नकारात्मक विचारों को दूर रखता है।

6. कर्म योग के मर्म की प्राप्ति

फल की चिंता किए बिना और अपनी जिम्मेदारियों से भागे बिना कर्म करते रहने की प्रेरणा मिलती है, जो गीता का मूल संदेश है।

7. आत्म-विश्लेषण की क्षमता में सुधार

व्यक्ति अपने निर्णयों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना सीखता है कि उसका कौन सा कदम उसे आगे ले जाएगा और कौन सा पीछे धकेलेगा।

8. ईश्वरीय कृपा और शरण प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण के वचनों को अपने जीवन में उतारने से साधक को निरंतर दिव्य मार्गदर्शन और भगवान की असीम कृपा की प्राप्ति होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री सनातन ग्रंथों, महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता मूल पाठ एवं विभिन्न आचार्यों के टीका ग्रंथों जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और संत ज्ञानेश्वर जी के दृष्टिकोण) पर आधारित है। हमारी विशेषज्ञ संपादकीय टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अर्थ, उसका सांस्कृतिक महत्व और उसकी दार्शनिक गहराई पाठकों तक पूरी प्रमाणिकता और सरलता के साथ पहुँचे।

यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री आधुनिक खोज इंजन अनुकूलन (SEO) और गूगल के 'Helpful Content' दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन करते हुए तैयार की गई है, ताकि डिजिटल युग के पाठकों को प्रामाणिक, त्रुटिहीन और उच्च गुणवत्तापूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो सके। हमारा उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल सत्यों को जन-जन तक पहुँचाना और मानसिक शांति के मार्ग को सुगम बनाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जीवन के किसी भी रणक्षेत्र या संकट के समय अपने कर्तव्यों से विमुख होना (भाग जाना) कायरता कहलाता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि यदि वे युद्ध छोड़कर भागेंगे, तो महान योद्धा उन्हें डरपोक मानेंगे और इससे उनके यश और प्रतिष्ठा का भारी पतन होगा।

दुर्योधन, कर्ण और अन्य महारथी यह बिल्कुल नहीं सोचेंगे कि अर्जुन ने करुणावश युद्ध छोड़ा है। वे यही मानेंगे कि अर्जुन कौरवों की शक्ति और भय के कारण युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हुआ है, जिससे अर्जुन की वीरता पर एक बड़ा कलंक लग जाएगा।

हाँ, बिल्कुल। आधुनिक जीवन में जब व्यक्ति अपने करियर, पारिवारिक जिम्मेदारियों या व्यवसायिक चुनौतियों से घबराकर हार मान लेता है या मैदान छोड़कर भागने की सोचता है, तो यह श्लोक उसे डटकर मुकाबला करने और अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की प्रेरणा देता है।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का 35वाँ श्लोक है। यह उस समय आता है जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह और कायरतायुक्त तर्कों का उत्तर देते हुए उसे उसके क्षत्रिय धर्म का बोध करा रहे होते हैं।

इसके नियमित पाठ और मनन से व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास बढ़ता है, निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है, भय और पलायनवादी मानसिकता समाप्त होती है, तथा वह अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पूरी निष्ठा से कर्म करता है।

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जय श्रीकृष्ण! सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

महारथी लोग समझेंगे कि तू भय के कारण युद्ध से हट गया, और जिनके द्वारा तू बहुत सम्मानित था, उनके सामने तू तुच्छ हो जाएगा। The great warriors will think you fled the battle out of fear, and you will be held in contempt by those who once held you in high esteem.

सामाजिक दृष्टि / Social Perspective

कृष्ण सामाजिक प्रतिष्ठा का तर्क भी देते हैं – युद्ध से भागना अर्जुन की छवि को धूमिल करेगा।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 35 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 35/72 49% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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