मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः | निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ||३६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदअवाच्यवादान्
अकथ्य वचन
च
और
बहून्
अनेक
वदिष्यन्ति
कहेंगे
तव
तेरे
अहिताः
शत्रु
निन्दन्तः
निन्दा करते हुए
तव
तेरी
सामर्थ्यम्
सामर्थ्य की
ततः
उससे
दुःखतरम्
अधिक दुःखदायी
नु
क्या
किम्
है?
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
तेरे शत्रु तेरी सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत से अकथ्य वचन कहेंगे। उससे बढ़कर दुःखदायी और क्या होगा?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
प्रस्तावना: अपमान, अपयश और आध्यात्मिक उत्थान का महामंत्र
सनातन संस्कृति और श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक मानव जीवन के किसी न किसी ऐसे गूढ़ सत्य को उद्घाटित करता है, जो सांसारिक मोह-माया और मानसिक दुविधाओं के अंधकार को चीरकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। जब हम महाभारत के रणक्षेत्र कुरुक्षेत्र की ओर दृष्टि डालते हैं, तो पाते हैं कि अर्जुन जैसी महान विभूति, जो साक्षात् नारायण के सखा और श्रेष्ठ धनुर्धर थे, वे भी मोह और कर्तव्य-विमूढ़ता के चक्रव्यूह में उलझ गए थे। ऐसे संकटपूर्ण क्षण में भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिए, वे आज संपूर्ण मानवता के लिए 'गीता अमृत' के रूप में जीवन जीने की कला बने हुए हैं।
विशेष रूप से, द्वितीय अध्याय के श्लोक 36 में भगवान कृष्ण अर्जुन को उस वास्तविकता से अवगत कराते हैं जिसका सामना हर उस मनुष्य को करना पड़ता है जो सत्य, धर्म और अपने कर्तव्यों के मार्ग पर अडिग रहता है। जब कोई व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा, अपने मूल्यों और अपने धर्म की रक्षा के लिए खड़ा होता है, तो समाज और उसके विरोधी उसकी आलोचना करने से पीछे नहीं हटते। 'अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः' केवल एक चेतावनी नहीं है, अपितु यह संसार के उस शाश्वत स्वभाव का दर्पण है जहाँ यश और अपयश, मान और अपमान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस लेख के माध्यम से हम इस श्लोक के शाब्दिक अर्थ, इसके दार्शनिक पक्षों, महाभारत कालीन पृष्ठभूमि और आज के आधुनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता का अत्यंत सूक्ष्म और व्यापक अध्ययन करेंगे।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः |
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ||३६||
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 2, श्लोक 36)
श्लोक का संस्कृत पदच्छेद:
अवाच्य-वादान् च बहून् वदिष्यन्ति तव अहिताः ।
निन्दन्तः तव सामर्थ्यम् ततः दुःखतरम् नु किम् ॥
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के मनोबल को बढ़ाने और उन्हें युद्ध से विमुख होने पर मिलने वाले सामाजिक परिणामों से सचेत कर रहे हैं। यदि अर्जुन युद्ध छोड़कर भाग जाते हैं, तो उनके विरोधी शत्रु न केवल उनका उपहास उड़ाएंगे, बल्कि उनकी वीरता और उनके पुरुषार्थ पर भी अनगिनत लांछन लगाएंगे। एक योद्धा के लिए मान-सम्मान उसकी प्राणों से भी बढ़कर होता है, और जब उसी मान-सम्मान पर घात होता है, तो वह मृत्यु से भी बदतर स्थिति होती है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में एक गहरा मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक संदेश छिपा है। आइए इसे तालिका के माध्यम से विस्तार से समझें:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
महाभारत के युद्ध का प्रसंग संपूर्ण मानव इतिहास का सबसे बड़ा और जटिल नैतिक संघर्ष है। जब दोनों सेनाएं कुरुक्षेत्र के खुले मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं, तब कौरव पक्ष में दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और भीष्म पितामह जैसे दिग्गज योद्धा उपस्थित थे। दूसरी ओर, पांडवों की सेना का मुख्य आधार अर्जुन थे, जिनकी गांडीव धनुष की टंकण से तीनों लोक कांपते थे। युद्ध आरंभ होने ही वाला था कि अर्जुन ने अपने सारथी बने भगवान श्री कृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले चलने का आग्रह किया।
वहाँ अपने ही गुरुओं, कुलपतियों, चचेरे भाइयों और संबंधियों को देखकर अर्जुन का हृदय करुणा और विषाद से भर गया। उनके हाथ से गांडीव छूटने लगा, शरीर कांपने लगा और उन्होंने युद्ध करने से स्पष्ट मना कर दिया। उन्होंने सोचा कि अपनों को मारकर मिलने वाले राज्य से तो भिक्षा मांगकर खाना श्रेयस्कर है। अर्जुन का यह निर्णय उनकी दृष्टि में वैराग्य और अहिंसा पर आधारित था, परंतु भगवान श्री कृष्ण ने तुरंत उनके इस भ्रम को तोड़ दिया। श्री कृष्ण जानते थे कि अर्जुन का यह मोह कायरता और कर्तव्यच्युति से उत्पन्न हुआ है, न कि किसी वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान से।
यहीं पर भगवान कृष्ण ने इस श्लोक का प्रयोग किया। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि यदि तुम आज युद्ध के मैदान से पीठ दिखाकर भाग जाओगे, तो दुर्योधन और कर्ण जैसे तुम्हारे कटु शत्रु चुप नहीं बैठेंगे। वे तुम्हें कायर कहेंगे, तुम्हारी वीरता का उपहास उड़ाएंगे और कहेंगे कि यह वही अर्जुन है जो बड़ी-बड़ी बातें करता था, लेकिन ऐन वक्त पर मैदान छोड़कर भाग गया। एक शूरवीर और क्षत्रिय के लिए युद्ध में वीरगति पाना स्वर्ग के द्वार खोलने के समान है, परंतु अपयश और कायरता का कलंक जीवनभर पीछा नहीं छोड़ता। इस प्रकार, यह श्लोक हमें सिखाता है कि अपने धर्म और कर्तव्य का पालन न करने पर समाज द्वारा मिलने वाला तिरस्कार मनुष्य को अंदर से और अधिक तोड़ देता है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)
श्रीमद्भगवद्गीता के इन श्लोकों का स्वाध्याय, मनन और जप करने से साधक को न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन की विकट परिस्थितियों से लड़ने की अद्भुत आंतरिक शक्ति भी प्राप्त होती है:
1. मानसिक दृढ़ता और आत्मबल में वृद्धि
नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ करने से मन में आने वाले भय, हीन भावना और पलायनवादी सोच का नाश होता है। यह कठिन समय में अडिग रहने की शक्ति देता है।
2. सामाजिक अपमान और आलोचना से मुक्ति
यह श्लोक सिखाता है कि दुनिया क्या कहती है, इसकी परवाह किए बिना अपने धर्म और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। इससे आलोचकों के प्रति भय समाप्त होता है.
3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)
गीता के श्लोकों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) नकारात्मक विचारों को दूर भगाते हैं और शरीर में एक सकारात्मक ऊर्जा का कवच तैयार करते हैं।
4. कर्म प्रधान जीवन की प्रेरणा
यह साधक को परिणाम की चिंता किए बिना अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे कर्मों की शुद्धता बनी रहती है।
5. अहंकार और मान-अपमान से परे दृष्टि
लगातार अध्ययन से यह समझ विकसित होती है कि मान और अपमान केवल नश्वर शरीर के साथ जुड़े हैं, आत्मा इनसे सर्वथा अछूती और पवित्र है।
6. निर्णय लेने की क्षमता में सुधार
जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ों पर जब भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है, तब गीता के ज्ञान से बुद्धि तीव्र और विवेकशील बनती है, जिससे सही निर्णय लिए जाते हैं।
7. आंतरिक शांति और संतोष
जब मनुष्य अपनी जिम्मेदारियों से नहीं भागता और पूरी निष्ठा से काम करता है, तो उसे एक गहरी आत्मिक शांति और संतोष की प्राप्ति होती है।
8. भगवत्कृपा और भक्ति का अनुभव
भगवान कृष्ण के वचनों को अपने जीवन में उतारने से साधक को भगवान की प्रत्यक्ष कृपा और मार्गदर्शन का अनुभव होने लगता है, जिससे भक्ति मार्ग प्रशस्त होता है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख को वेदों, पुराणों, और उपनिषदों के महान ग्रंथों के अध्ययन के पश्चात अत्यंत सावधानी और समर्पण के साथ तैयार किया गया है। प्रस्तुत सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' की श्रेणी के अंतर्गत आती है, जिसका उद्देश्य सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को पाठकों तक सरल, स्पष्ट और प्रामाणिक रूप में पहुँचाना है।
श्रीमद्भगवद्गीता के वेदव्यास रचित महाभारत के भीष्म पर्व से लिए गए इन श्लोकों की व्याख्या आचार्य शंकर, स्वामी रामसुखदास और आदि गुरुओं के भाष्यों के आधार पर की गई है। हमारा प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक पाठक को उच्चतम स्तर की आध्यात्मिक सामग्री मिले, जो न केवल बौद्धिक स्तर पर संतुष्ट करे, बल्कि उनके जीवन को एक नई दिशा भी प्रदान करे।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
तेरे शत्रु तेरी सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत से अपशब्द कहेंगे। इससे अधिक दुःखदायी और क्या हो सकता है? Your enemies will slander your strength and speak many unutterable words. What could be more painful than that?
अपमान / Insult
कृष्ण अर्जुन के स्वाभिमान को जगाते हैं – शत्रुओं के ताने सहने से बेहतर है युद्ध में मरना।