श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 47

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 37 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||४७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
कर्मणि
कर्म में
एव
ही
अधिकारः
अधिकार
ते
तेरा
मा
नहीं
फलेषु
फलों में
कदाचन
कभी
मा
मत
कर्मफलहेतुः
कर्मफल का हेतु (कारण)
भूः
हो
मा
मत
ते
तेरा
सङ्गः
आसक्ति
अस्तु
हो
अकर्मणि
कर्म न करने में।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल का हेतु मत हो, और तेरी अकर्मण्यता (कर्म न करने) में भी आसक्ति न हो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्याय 2, श्लोक 47 का दिव्य और दार्शनिक प्रादुर्भाव

सनातन हिंदू धर्म और विश्व आध्यात्मिक साहित्य के इतिहास में श्रीमद्भगवद्गीता का यह चौंतालीसवां (द्वितीय अध्याय का सैंतालीसवां) श्लोक केवल एक संस्कृत पद्य नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना को जागृत करने वाला एक महामंत्र है। जब-जब मानव मन असमंजस, अवसाद, कर्तव्य-विमुखता और भविष्य की अनिश्चितता के भंवर में फंसता है, तब-तब भगवान श्रीकृष्ण का यह दिव्य उपदेश एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ के रूप में उभरता है। कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अपने स्वजनों को सामने देखकर अर्जुन के धनुष-बाण गिर पड़े थे, उनके मन में मोह उत्पन्न हो गया था कि इस भीषण युद्ध से केवल विनाश ही होगा। ऐसे सुकोमल और संकटपूर्ण क्षण में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया, उसका सार इस अद्वितीय श्लोक में समाहित है।

यह श्लोक 'कर्मयोग' का मूल आधार स्तंभ है। सामान्य मनुष्य का जीवन हमेशा फल की चिंता, भविष्य की आशंका और अतीत के पश्चाताप के चक्रव्यूह में उलझा रहता है। हम जो भी कार्य करते हैं, उसके परिणाम (सफलता या असफलता, लाभ या हानि, मान या अपमान) पर हमारी दृष्टि इतनी अधिक केंद्रित होती है कि हम उस वर्तमान क्षण और उस कार्य की पवित्रता को भूल जाते हैं जो हमारे हाथ में है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से मानवीय चेतना को एक अत्यंत ऊंचे धरातल पर ले जाते हैं। वे स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने तक सीमित है, उसके परिणाम पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। परिणाम अनेक कारकों (प्रारब्ध, देश, काल, परिस्थिति और ईश्वरीय विधान) पर निर्भर करता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक आधुनिक कॉर्पोरेट जगत से लेकर प्राचीन संन्यास परंपरा तक, हर जगह समान रूप से प्रासंगिक है। यह हमें सिखाता है कि किस प्रकार बिना किसी मानसिक तनाव, भय या आसक्ति के अपने कर्तव्यों का पालन किया जाए। जब कोई साधक या कर्मयोगी इस सिद्धांत को अपने जीवन में उतार लेता है, तो उसके भीतर एक अद्भुत मानसिक स्थिरता (स्थितप्रज्ञता) उत्पन्न होती है। वह सफलता के मद में अंधा नहीं होता और असफलता के आघात से विचलित नहीं होता। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी महामंत्र के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, पौराणिक संदर्भ और दैनिक जीवन में इसके व्यावहारिक उपयोग का गहन अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री परमात्मने नमः

अथ द्वितीयोऽध्यायः - सांख्ययोग (श्लोक ४७)

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन。
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ ४७ ॥

श्लोक का उच्चारण एवं पठन विधि:
  • उच्चारण शुद्धि: 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' को 'कर्मणि एव अधिकारः ते' के रूप में स्पष्ट उच्चारित करें। 'कदाचन' में 'न' का उच्चारण अनुनासिक होना चाहिए।
  • पठन का समय: इस श्लोक का पाठ प्रातः काल स्नान के पश्चात ध्यान की मुद्रा में करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
  • मानसिक स्थिति: पाठ करते समय मन को पूर्णतः शांत रखें और अपने इष्टदेव या भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए कर्मठ बनने का संकल्प लें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस महान श्लोक की प्रत्येक पंक्ति और शब्द का गहरा दार्शनिक अर्थ है। आइए, इसका विस्तृत विश्लेषण सारणी के माध्यम से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
कर्मणि (Karmani) कर्म करने में, कर्तव्य पालन में मनुष्य का क्षेत्र केवल अपने निर्धारित और धर्मसम्मत कर्तव्यों को पूरा करने तक सीमित है।
एव (Eva) ही यह इस बात की पुष्टि करता है कि आपके पास केवल कर्म करने की ही स्वतंत्रता है, और कुछ नहीं।
अधिकारः (Adhikaraha) अधिकार, स्वामित्व, स्वतंत्रता ईश्वर ने हमें कर्म चुनने और करने की पूर्ण स्वतंत्रता (Free Will) दी है, लेकिन परिणामों पर नियंत्रण नहीं दिया।
ते (Te) तेरा, तुम्हारा भगवान श्रीकृष्ण सीधे अर्जुन (और समस्त मानव जाति) को संबोधित कर रहे हैं कि तुम्हारा अधिकार निहित है।
मा (Maa) मत, कभी नहीं निषेधवाचक शब्द जो हमें गलत दिशा में जाने से रोकता है।
फलेषु (Phaleshu) कर्मों के फलों में (परिणामों में) जीत-हार, लाभ-हानि, यश-अपयश आदि सांसारिक परिणाम।
कदाचन (Kadachana) कभी भी, किसी भी काल में चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, किसी भी समय फल की लालसा रखकर कर्म नहीं करना चाहिए।
मा कर्मफलहेतुः भूः तू कर्म के फल का कारण मत बन अपने आपको कर्मों के फल का भोक्ता या कर्ता मानने का अहंकार न पालें। फल देना प्रकृति या ईश्वर का काम है।
मा ते सङ्गः अस्तु तेरी आसक्ति न हो मन को किसी भी बुरी आदत, आलस्य या गलत प्रवृत्ति से दूर रखें।
अकर्मणि (Akarmani) कर्म न करने में, अकर्मण्यता या आलस्य में फल की प्राप्ति न होने की आशंका से कभी भी कार्य करना न छोड़ें। अकर्मण्यता सबसे बड़ा पाप है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक अभिन्न अंग है, जिसमें कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक मैदान से जुड़ी है, जहां कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। यह वह महान युद्ध था जिसे धर्मयुद्ध कहा गया, क्योंकि यह अधर्म, अन्याय और अहंकार के प्रतीक कौरव साम्राज्य के विरुद्ध धर्म की स्थापना के लिए लड़ा जा रहा था। जब युद्ध की रणभेरी बजने ही वाली थी, तब पांडव सेना के प्रमुख योद्धा और महारथी अर्जुन ने अपने सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि वे उनके रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले चलें ताकि वे देख सकें कि उन्हें किसके विरुद्ध युद्ध करना है।

रथ के बीचों-बीच पहुँचने पर अर्जुन ने देखा कि सामने उनके अपने ही गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, भाई दुर्योधन, चचेरे भाई, मित्र और सगे-संबधी खड़े हैं। यह दृश्य देखकर अर्जुन का कोमल हृदय करुणा और विषाद से भर गया। उनके हाथ से गांडीव धनुष छूट गया, उनके शरीर में कंपकंपी छूटने लगी, और उन्होंने श्रीकृष्ण से स्पष्ट कह दिया कि वे अपनों का वक्त करके मिलने वाले राज्य या विजय नहीं चाहते। वे युद्ध भूमि में ही हथियार डालकर बैठ गए। अर्जुन की यह मानसिक स्थिति आज के आधुनिक मनुष्य के उस अवसाद (Depression) और निर्णयहीनता की प्रतीक है जब व्यक्ति जीवन की कठिनाइयों से घबराकर अपने कर्तव्यों से भागने की कोशिश करता है।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने एक गुरु और जगद्गुरु की भूमिका निभाते हुए अर्जुन को जो उपदेश दिया, वही 'श्रीमद्भगवद्गीता' कहलाई। श्रीकृष्ण ने सबसे पहले अर्जुन के इस मोह को कायरता और अज्ञान बताया। उन्होंने समझाया कि शरीर नश्वर है परंतु आत्मा अमर है। कर्तव्य का पालन करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है। क्षत्रिय होने के नाते युद्ध करना अर्जुन का कर्तव्य था, और उस कर्तव्य से विमुख होना पाप था। इसी क्रम में भगवान ने द्वितीय अध्याय के 47वें श्लोक में 'कर्मयोग' का वह अद्भुत सिद्धांत दिया जिसने अर्जुन के सभी संशय दूर कर दिए और उसे अपने महान कर्तव्य का पालन करने के लिए पुनः उद्यत कर दिया। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ आज भी संपूर्ण मानवता को सही दिशा दिखा रहा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस दिव्य श्लोक का स्मरण, मनन और जीवन में आचरण करने से साधक को अनेक प्रकार के आध्यात्मिक, मानसिक और लौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक तनाव और चिंता से मुक्ति

जब व्यक्ति फल की चिंता छोड़ देता है, तो उसका 90% मानसिक तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है। वह वर्तमान में जीना सीख जाता है।

2. एकाग्रता और कार्यक्षमता में वृद्धि

बिना फल की लालसा के कार्य करने से मन पूरी तरह से उस कार्य की गुणवत्ता पर केंद्रित रहता है, जिससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है।

3. अहंकार का शमन (निःस्वार्थ भाव)

'मैंने यह किया और मुझे यह मिला' का अहंकार समाप्त होता है और व्यक्ति अपने आपको ईश्वरीय योजना का एक निमित्त मात्र मानता है।

4. असफलता से उबरने की शक्ति

यह श्लोक सिखाता है कि असफलता केवल कर्म का परिणाम है, आपकी संपूर्ण योग्यता का प्रमाण नहीं। इससे व्यक्ति निराशा से बचता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विकास

नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ और मनन करने से मन में सात्त्विक विचारों का संचार होता है और शरीर के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का घेरा बनता है।

6. कर्म बंधनों से मुक्ति (कर्म शुद्धि)

निष्काम कर्म करने से व्यक्ति नए कर्मफलों के बंधनों में नहीं बंधता, जो कि मोक्ष और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करता है।

7. अकर्मण्यता और आलस्य का नाश

श्लोक का उत्तरार्ध स्पष्ट रूप से चेतावनी देता है कि कर्म न करने का विचार भी न लाएं, जिससे आलस्य और प्रमाद दूर भागते हैं।

8. ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति

जो भक्त अपने जीवन को भगवद्गीता के आदेशों के अनुसार ढालता है, उस पर भगवान श्रीकृष्ण की अतुल्नीय और निरंतर कृपा बनी रहती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, विशेषकर महर्षि वेदव्यास विरचित श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य के संदर्भों सहित) के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, पुराणों और उपनिषदों के शुद्ध, प्रामाणिक और वैज्ञानिक आध्यात्मिक ज्ञान को पहुंचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय संस्कृत व्याकरण, प्रामाणिक शब्दकोशों और पारंपरिक वेदान्त परंपरा का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि पाठकों को उच्चतम गुणवत्ता की जानकारी मिल सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह प्रसिद्ध श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्ययोग) का 47वां (47th) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने सांख्य दर्शन और कर्मयोग की नींव रखी है।

बिल्कुल नहीं! "फल की इच्छा न रखने" (निष्काम कर्म) का अर्थ है कि आप परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्त या चिंतित न हों। इसका उद्देश्य कार्य की गुणवत्ता पर पूरा ध्यान देना है, न कि केवल मिलने वाले पुरस्कार या लाभ पर। बुद्धिमत्तापूर्ण योजना बनाना कर्म का हिस्सा है, लेकिन परिणाम को लेकर मानसिक तनाव पालना गलत है।

आज की हाई-प्रेशर कॉर्पोरेट नौकरियों, परीक्षाओं और प्रतिस्पर्धी जीवन में लोग डिप्रेशन, एंग्जायटी और तनाव के शिकार हो जाते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि टारगेट या परिणाम हमारे हाथ में नहीं हैं, हमारे हाथ में केवल बेहतरीन प्रयास करना है। यह दृष्टिकोण मानसिक शांति और बेहतर कार्य प्रदर्शन दोनों सुनिश्चित करता है।

इसका अर्थ है कि "तुम्हारी आसक्ति अकर्मणि (कर्म न करने या आलस्य) में न हो।" भगवान श्रीकृष्ण यह चेतावनी दे रहे हैं कि फल की इच्छा न रखने का यह मतलब नहीं है कि आप काम करना ही छोड़ दें। कर्तव्य का पालन हर हाल में करना अनिवार्य है।

हाँ, नियमित रूप से गीता के श्लोकों का पाठ और उनके अर्थ पर मनन करने से चित्त शुद्ध होता है, सात्त्विक गुणों का विकास होता है और मोक्ष या आत्मसाक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है। यह मन को स्थिरता प्रदान करता है।

© Bhaktilok.in - सर्वाधिकार सुरक्षित। सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान का समर्पित डिजिटल मंच।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल का हेतु मत बन, और कर्म न करने में भी आसक्ति मत रख। You have a right to perform your prescribed duty, but you are not entitled to the fruits of action. Never consider yourself the cause of the results, and never be attached to not doing your duty.

कर्मयोग / Path of Action

यह श्लोक कर्मयोग का मूल मन्त्र है। निष्काम कर्म ही बन्धनमुक्ति का कारण है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 47 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 47/72 65% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!