मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||४८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदयोगस्थः
योग में स्थित होकर
कुरु
कर
कर्माणि
कर्म
सङ्गम्
आसक्ति
त्यक्त्वा
त्यागकर
धनञ्जय
हे धनञ्जय
सिद्ध्यसिद्ध्योः
सफलता और असफलता में
समः
समान
भूत्वा
होकर
समत्वम्
समत्व
योगः
योग
उच्यते
कहा जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि-असिद्धि में समान होकर, योग में स्थिर होकर कर्म कर। समत्व ही योग कहलाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना
सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए जीवन जीने की कला, मोक्ष का मार्ग और मानसिक संतुलन का सर्वोत्कृष्ट शास्त्र माना गया है। महाभारत के रणक्षेत्र कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुजनों और भाइयों को सामने देखकर कर्तव्य-विमूढ़ हो गए, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वह युगों-युगों से मानव जाति का मार्गदर्शन करता आ रहा है। इसी दिव्य संवाद का एक अति महत्वपूर्ण और जीवन-परिवर्तकारी श्लोक है—"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥"।
यह श्लोक कर्मयोग का सार है। आधुनिक युग में जहाँ मनुष्य हर पल तनाव, प्रतिस्पर्धा, असफलता के भय और अत्यधिक महत्त्वाकांक्षाओं के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है, वहाँ भगवान श्रीकृष्ण का यह उपदेश एक अचूक औषधि की भांति कार्य करता है। 'समत्व' यानी जीवन की द्वन्द्वपूर्ण परिस्थितियों—सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, और विशेष रूप से सफलता-असफलता—में चित्त की स्थिरता बनाए रखना ही वास्तविक योग है। सामान्य मनुष्य किसी कार्य में सफलता मिलने पर हर्ष से उन्मत हो जाता है और असफलता मिलने पर गहरी निराशा या अवसाद के गर्त में डूब जाता है। परंतु गीता का यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके परिणाम पर नहीं।
जब साधक अपनी चेतना को भगवत्स्वरूप (योग) में स्थित करके कर्म करता है, तो उसके कर्म बंधनों का कारण नहीं बनते, बल्कि मुक्ति और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह ब्रह्मांडीय चेतना के साथ व्यक्तिगत चेतना का समन्वय है, जहाँ कर्तापन के अहंकार का विसर्जन हो जाता है और दिव्य इच्छा के साथ पूर्ण समर्पण का भाव जाग्रत होता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥
उच्चारण विधि एवं पाठ का नियम: इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करके शांत मन से करना चाहिए। इसका उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के स्पष्टीकरण पर ध्यान देना चाहिए। 'धनञ्जय' शब्द अर्जुन का संबोधन है, जिसका अर्थ है वह जिसने सभी दिशाओं से धन या विजय प्राप्त की हो, परंतु यहाँ इसका तात्पर्य उस साधक से है जो अपनी आंतरिक ऊर्जा को जागृत कर चुका है।
प्रतिदिन न्यूनतम 11 या 108 बार इस श्लोक का मानसिक जप या अनुष्ठान करने से चित्त की चंचलता शांत होती है और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है। इसे अपने कार्यस्थल पर जाने से पूर्व स्मरण करने से कार्यकुशलता में अपूर्व वृद्धि होती है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का अगाध ज्ञान छिपा है। नीचे दी गई तालिका में इसके एक-एक पद का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत महाकाव्य के भीष्म पर्व से जुड़ी हुई है। कुरुक्षेत्र के विशाल मैदान में कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। शंखनाद हो चुका था, युद्ध का आरंभ होने ही वाला था कि पांडव सेना के मुख्य वीर अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलने का अनुरोध किया। जब अर्जुन ने देखा कि सामने उनके ताऊजी भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, और उनके अपने भाई-बंधु युद्ध करने के लिए तत्पर खड़े हैं, तब उनका मोह जागृत हो गया।
अर्जुन का गांडीव धनुष उनके हाथों से छूटने लगा। उनके शरीर में कंपकंपी छूटने लगी और उन्होंने कहा कि वे अपनों का व करके राज्यसुख नहीं भोगना चाहते। वे युद्धभूमि से पलायन करने और संन्यास लेने की बात करने लगे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की इस कायरता और भ्रम को दूर करने के लिए जो ज्ञान दिया, वही 'श्रीमद्भगवद्गीता' के रूप में अमर हो गया। भगवान श्रीकृष्ण ने समझाया कि क्षत्रिय का धर्म युद्ध करना और धर्म की रक्षा करना है। कर्तव्य मार्ग से पीछे हटना न केवल पाप है, बल्कि आत्मिक पतन का मार्ग भी है।
द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) के इस 48वें श्लोक में भगवान ने अर्जुन को 'कर्मयोग' की मूल कुंजी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन में भागना समाधान नहीं है। युद्ध जीवन का दूसरा नाम है, और हर मनुष्य को अपने जीवन रूपी रणक्षेत्र में संघर्ष करना ही पड़ता है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि व्यक्ति को परिणाम की चिंता छोड़कर अपने कर्मों की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। यदि कर्म निष्काम भाव से किया जाए, तो वह व्यक्ति को बंधन मुक्त कर देता है।
यह कथा हमें सिखाती है कि हमारे जीवन में भी जब संकट के बादल मंडराते हैं और हम कर्तव्य और मोह के बीच उलझ जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण का यह उपदेश हमें सही दिशा दिखाता है। 'योगस्थः कुरु कर्माणि' का पालन करके हम अपने हर कर्म को यज्ञ बना सकते हैं।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अद्वितीय श्लोक का नियमित पठन, मनन और जीवन में आचरण करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं:
1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति
सफलता और असफलता के द्वंद्व से ऊपर उठने के कारण मन में अनावश्यक चिंता, डर और तनाव समाप्त हो जाते हैं, जिससे गहरा मानसिक सुकून मिलता है।
2. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि
समभाव आने से व्यक्ति का विवेक तीव्र होता है। वह संकट की स्थिति में भी घबराता नहीं है और अत्यंत सटीक एवं निष्पक्ष निर्णय लेता है।
3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास
नियमित जप से शरीर के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों और विचारों को दूर रखती है।
4. कर्म बंधनों से शुद्धि (कर्म शुद्धि)
आसक्ति का त्याग करके कर्म करने से नए कर्मों के बुरे फल या पाप का बंधन नहीं बनता, जिससे साधक धीरे-धीरे मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
5. कार्यकुशलता और उत्पादकता में वृद्धि
गीता का वचन "योगः कर्मसु कौशलम्" (योग ही कर्मों में कुशलता है) चरितार्थ होता है। बिना फल की चिंता के कार्य करने से एकाग्रता बढ़ती है।
6. अहंकार और ममत्व का शमन
"मैं करने वाला हूँ" (कर्तापन का भाव) समाप्त हो जाता है, जिससे अहंकार गलता है और साधक में विनम्रता एवं सहिष्णुता का गुण विकसित होता है।
7. दैवीय कृपा और ईश्वर से जुड़ाव
योगस्थ होने का अर्थ ही ईश्वर से जुड़ना है। निरंतर इस भाव में रहने से साधक को भगवान की अप्रतिम कृपा और आंतरिक आनंद की अनुभूति होती है।
8. जीवन में संतुलन और स्थिरता
सुख में अत्यधिक हर्षित न होना और दुःख में विचलित न होना—यह समत्व जीवन को एक स्थिर और गरिमामयी नौका की तरह सुरक्षित रखता है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
यह आलेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत के भीष्म पर्व), और आदरणीय आचार्यों की टीकाओं के गहन अध्ययन के पश्चात प्रस्तुत किया गया है। Bhaktilok.in के हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और धार्मिक शोधकर्ताओं ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अर्थ, उसका दार्शनिक मर्म तथा आधुनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता पाठकों तक पूर्ण शुद्धता, प्रामाणिकता और सुलभ हिंदी भाषा में पहुंचे।
हमारा उद्देश्य सनातन धर्म के शाश्वत सत्यों को आज की पीढ़ी के समक्ष तार्किक और व्यावहारिक रूप में रखना है, ताकि प्रत्येक पाठक अपने दैनिक जीवन में तनाव मुक्त होकर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सके। किसी भी प्रकार की धार्मिक जिज्ञासा या अध्ययन के लिए आप हमारे अन्य लेखों का भी संदर्भ ले सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे धनञ्जय! आसक्ति त्यागकर, सफलता-असफलता में समान रहकर, योग में स्थित होकर कर्म कर। समत्व ही योग कहलाता है। Be steadfast in yoga, perform your duty abandoning attachment, and be equal in success and failure. Such equanimity is called yoga.
योग की परिभाषा / Definition of Yoga
योग का अर्थ है समत्व – सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान भाव।