श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 5

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 38 मिनट का पठन 140 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ||५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
गुरून्
गुरुजनों को
अहत्वा
न मारकर
हि
निश्चय ही
महानुभावान्
महानुभाव
श्रेयः
अच्छा
भोक्तुम्
भोगना
भैक्ष्यम्
भिक्षा
अपि
भी
इह
इस
लोके
लोक में
हत्वा
मारकर
अर्थकामान्
अर्थ और काम की इच्छा वाले
तु
तो
गुरून्
गुरुजनों को
इह
इसी
एव
ही
भुञ्जीय
भोगूँ
भोगान्
भोगों को
रुधिरप्रदिग्धान्
रुधिर से सने हुए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस लोक में ऐसे महानुभाव गुरुजनों को मारकर उनके दिए हुए (रुधिर से सने) भोगों को भोगने की अपेक्षा उन्हें न मारकर भिक्षा (माँगकर) खाना भी श्रेयस्कर है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

"गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके..." - अर्जुन के मोह, कर्तव्य और आत्मज्ञान की सनातन गाथा।

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान केवल एक ग्रंथ का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए जीवनेत्तर ज्ञान का महासागर है। महाभारत के युद्ध के ठीक पूर्व, जब कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब धर्मसंकट में फंसे अर्जुन की मानसिक स्थिति का वर्णन इस ग्रंथ का मूल आधार बनता है। यह श्लोक—"गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके..."—अर्जुन के अंतःकरण में चल रहे उस गहन मनोवैज्ञानिक और नैतिक संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है, जहां सांसारिक प्रतिष्ठा, गुरुजनों के प्रति अगाध श्रद्धा, और क्षत्रिय धर्म के कठोर कर्तव्यों के बीच एक भयंकर खाई उत्पन्न हो जाती है।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से यह प्रसंग केवल दो पक्षों के बीच का युद्ध नहीं है, बल्कि यह हर उस मनुष्य की आत्मा की पुकार है जो अपने जीवन के किसी मोड़ पर धर्म, मोह, कर्तव्य और पाप-पुण्य के भंवर में उलझ जाता है। अर्जुन यहाँ अपने गुरुओं (जैसे द्रोणाचार्य और कृपाचार्य) तथा कुल-पुलह महानुभावों के प्रति आदरभाव के कारण उनके वध को महापाप मानते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे महानुभावों को मारकर इस लोक में राज्यसुख भोगने से तो कहीं अधिक श्रेयस्कर (कल्याणकारी) भिक्षा मांगकर जीवन व्यतीत करना है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कैसे मनुष्य का अहंकार और मोह उसे उसके सर्वोच्च कर्तव्य से विचलित करने का प्रयास करता है। यद्यपि अर्जुन की यह भावना दिखने में अत्यंत विनम्र, नैतिक और करुणापूर्ण प्रतीत होती है, किंतु वेदान्त और भगवान श्रीकृष्ण की दृष्टि में यह कर्तव्य-विमुखता, मोह जनित कायरता और अज्ञानता का ही एक रूप है। इस आलेख में हम इसी अत्यंत गूढ़ श्लोक का शाब्दिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक और व्यावहारिक विश्लेषण करेंगे, जो साधकों को उनके जीवन पथ पर सत्य और धर्म का मार्ग दिखाने में सहायक सिद्ध होगा।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता - प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) - श्लोक ५ ॥

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हतवार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥ ५॥


श्लोकानुकूल संस्कृत पाठ (संधि विच्छेद सहित):

गुरून् अहत्वा हि महानुभावान् श्रेयः भोक्तुम् भैक्ष्यम् अपि इह लोके।
हत्वा अर्थकामान् तु गुरून् इह एव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥

पाठ विधि एवं ध्यान: इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को शांत चित्त होकर भगवान श्रीकृष्ण और गीता के उपदेशों का स्मरण करना चाहिए। यह श्लोक हमें यह आत्म-चिंतਨ करने की प्रेरणा देता है कि सांसारिक भोग-विलासिता और भौतिक संपदा, यदि किसी के सर्वस्व को नष्ट करके या अपनों का खून बहाकर प्राप्त की जाए, तो वे कभी भी आंतरिक शांति और प्रसन्नता प्रदान नहीं कर सकतीं। इसका नियमित पारायण साधक को अपने अंतःकरण के मोह को पहचानने और उससे ऊपर उठने की शक्ति प्रदान करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

निम्नलिखित तालिका में इस पावन श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहरा आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
गुरून् (Gurun) गुरुओं को (जैसे द्रोणाचार्य आदि) वे व्यक्ति जो हमें ज्ञान, संस्कार और जीवन जीने की कला सिखाते हैं, वे वंदनीय हैं।
अहत्वा (Ahatva) न मारकर / वध न करके हिंसा से बचने की सात्विक प्रवृत्ति, जो यहाँ अर्जुन के मोह का कारण बनती है।
हि (Hi) निश्चय ही / क्योंकि निश्चित रूप से यह एक अकाट्य नैतिक सत्य है जो अर्जुन के मन में स्थापित है।
महानुभावान् (Mahanubhavan) महान स्वभाव वाले / आदरणीय महापुरुषों को जो लोग उच्च आचरण, ज्ञान और गरिमा से संपन्न हैं, उनका सम्मान करना सनातन धर्म सिखाता है।
श्रेयः (Shreyah) कल्याणकारी / श्रेष्ठ जो आत्मा और मोक्ष के मार्ग पर ले जाए, न कि केवल तात्कालिक सुख (प्रेय) दे।
भोक्तुम् (Bhoktum) भोग करना / खाना जीवन निर्वाह करना या सांसारिक सुखों का उपभोग करना।
भैक्ष्यम् अपि (Bhaikshyam api) भिक्षा मांगकर भी अकिंचन या संन्यासी की तरह जीवन बिताना, जो भौतिकता से पूर्णतः विरक्त होता है।
इह लोके (Iha loke) इस संसार में / इस लोक में वर्तमान भौतिक जीवन, जहाँ मनुष्य मान-सम्मान और यश की कामना करता है।
अर्थकामान् (Arthakaman) धन और काम-वासना की इच्छा रखने वाले वे लोग जो भौतिक संपदा और सांसारिक भोगों के प्रति अत्यधिक आसक्त हैं।
रुधिरप्रदिग्धान् (Rudhirapradigdhan) रक्त से सने हुए / खून से रंगे हुए हिंसा, पाप और अपनों के विनाश से प्राप्त होने वाले दुखों और कलंक के प्रतीक भोग।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के आदि पर्व और भीष्म पर्व से जुड़ी हुई है। कौरवों और पांडवों के बीच हस्तिनापुर के सिंहासन, न्याय और धर्म को लेकर अनेक वर्षों तक अनबन चली। अंततः जब समस्त संधियाँ और शांति प्रस्ताव विफल हो गए, तब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में युद्ध का बिगुल बजा। पांचजन्य शंख की गूंज और युद्ध की घोषणा के बाद, पांडव सेना के मुख्य योद्धा और धनुर्धर अर्जुन ने अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलने का अनुरोध किया।

जैसे ही अर्जुन ने रथ पर खड़े होकर चारों ओर दृष्टि डाली, उन्होंने देखा कि सामने खड़े लोगों में कोई और नहीं, बल्कि उनके अपने ताऊ भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, मामा शल्य, भाई दुर्योधन और अन्य आदरणीयजन खड़े हैं। इस दृश्य ने अर्जुन के भीतर के योद्धा को झकझोर कर रख दिया। उनके हाथ से गांधिव धनुष सरकने लगा, शरीर कांपने लगा और मुंह सूखने लगा।

यह प्रसंग हमें वेदव्यास जी द्वारा रचित महाभारत के उस शाश्वत सत्य से परिचित कराता है जहाँ धर्म की रक्षा के लिए अपनों से ही युद्ध करना पड़ सकता है। महर्षि वेदव्यास ने गीता के माध्यम से यह दर्शाया है कि किस प्रकार एक साधारण मनुष्य (और यहाँ तक कि महान धनुर्धर अर्जुन भी) मोह के वशीभूत होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो सकता है। अर्जुन का यह तर्क कि "गुरुओं को मारकर रक्त से सने भोग भोगने से अच्छा है कि भिक्षा मांगकर जिया जाए," उनकी तात्कालिक करुणा को तो दर्शाता है, परंतु यह क्षत्रिय धर्म के उस आदेश के विपरीत था जो अन्याय के खिलाफ खड़े होने की मांग करता था। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी भ्रम को दूर करने के लिए उन्हें निष्काम कर्मयोग का दिव्य उपदेश दिया, जो आज संपूर्ण मानव जाति के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इन श्लोकों का मनन, पठन और उनके मर्म को समझने से जीवन में निम्नलिखित महान आध्यात्मिक व मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और संशय का नाश

जीवन के जटिल निर्णयों और दुविधाओं के समय गीता के अध्ययन से मन में स्पष्टता आती है और मानसिक संशय समाप्त होते हैं।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

इन श्लोकों के चिंतन से व्यक्ति की ऊर्जा सात्विक बनती है, जिससे उसके आसपास सकारात्मक आवरण का निर्माण होता है।

3. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

मोह और अहंकार जनित अधार्मिक कर्मों से मुक्ति मिलती है और मनुष्य निष्काम भाव से कर्म करने की प्रेरणा पाता है।

4. ईश्वरीय कृपा और शरणागति

भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण समर्पण का भाव जागृत होता है, जिससे साधक को हर परिस्थिति में आत्मबल प्राप्त होता है।

5. अहंकार का शमन और विनम्रता

अर्जुन की भांति अपनी कमजोरियों और मोह को स्वीकार कर ज्ञान मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा मिलती है।

6. कर्तव्यनिष्ठा की सुदृढ़ता

व्यक्ति अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या मोह के ठीक ढंग से निभाना सीखता है।

7. भय और विषाद से मुक्ति

भविष्य की अनिश्चितताओं और असफलताओं के भय से मन को मुक्ति मिलती है, क्योंकि साधक कर्म को ही अपना धर्म मानता है।

8. मोक्ष और उच्चतर चेतना की प्राप्ति

आत्मा के अमरत्व का बोध होने से जन्म-मृत्‍यु के बंधनों से छूटने की दिशा में चेतना का विकास होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, पुराणों, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के मूल भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन संस्कृति का शुद्ध, अकाट्य और जीवनोपयोगी ज्ञान पहुंचाना है।

इस श्लोक की व्याख्या करते समय हमने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि अर्जुन के भीतर की करुणा और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिए जाने वाले ज्ञान के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट किया जाए। कोई भी पाठक जो अपने जीवन में धर्म, कर्तव्य और अध्यात्म का संतुलन साधना चाहता है, वह इस आलेख के माध्यम से गीता के मूल दर्शन को सरलता से आत्मसात कर सकता है। सभी संदर्भ प्रामाणिक शास्त्रीय परंपराओं पर आधारित हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: अर्जुन के मन में अपने गुरुओं (द्रोणाचार्य और कृपाचार्य) के प्रति अगाध आदर और स्नेह था। वे मानते थे कि गुरुओं का वध करके यदि उन्हें त्रैलोक्य का राज्य भी मिल जाए, तो वह राज्य रक्त से रंगा होगा और उससे पाप ही लगेगा। इसलिए सांसारिक प्रतिष्ठा और भोग-विलासिता की तुलना में भिक्षा मांगकर संतोषजनक जीवन बिताना उनके लिए अधिक नैतिक और कल्याणकारी प्रतीत हुआ।

उत्तर: यद्यपि अर्जुन की यह भावना दिखने में बहुत नैतिक, नम्र और करुणापूर्ण लगती है, किंतु वेदान्त और भगवान श्रीकृष्ण की दृष्टि में यह कर्तव्य-विमुखता (कायरता) का ही रूप थी। एक क्षत्रिय होने के नाते अन्याय और अधर्म के विरुद्ध युद्ध करना उनका मुख्य धर्म था, जिससे वे मोह के कारण भाग रहे थे।

उत्तर: आधुनिक जीवन में भी कई बार मनुष्य अपने निजी संबंधों, मोह या डर के कारण अपने सत्य और कर्तव्यों से मुंह मोड़ने का प्रयास करता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमें अपने जीवन के कठिन दौर में मोह या व्यक्तिगत भावनाओं के कारण अपने उत्तरदायित्वों से नहीं भागना चाहिए, बल्कि सत्य और धर्म का साथ देना चाहिए।

उत्तर: 'रुधिरप्रदिग्धान्' का शाब्दिक अर्थ है 'रक्त से सने हुए'। दार्शनिक रूप से इसका अर्थ यह है कि जो सुख, संपदा या अधिकार अपनों के हनन, हिंसा, छल या किसी का अहित करके प्राप्त किए जाते हैं, वे आंतरिक शांति नहीं देते बल्कि वे पाप और पश्चाताप के रक्त से रंगे होते हैं।

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) का मुख्य संदेश यह दिखाना है कि किस प्रकार मोह, अज्ञान और शोक मनुष्य की बुद्धि को आच्छादित कर लेते हैं। यह अध्याय ज्ञान और कर्मयोग के उपदेश के लिए एक आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार करता है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य के सारे भ्रमों को दूर कर उसे कर्तव्य पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं: इन महान गुरुजनों को मारने के बाद जो भी भोग मिलेंगे, वे रक्त से सने होंगे; इसलिए उन्हें न मारकर भिक्षा माँगकर जीवन बिताना भी बेहतर है। Arjuna argues that any happiness obtained by killing revered elders would be contaminated.

आध्यात्मिक दृष्टि / Spiritual Perspective

अर्जुन का यह तर्क सतही तौर पर नैतिक लगता है, परन्तु यह उनके मोह और कर्तव्य से विमुखता का ही परिणाम है। गीता आगे बताएगी कि सच्चा नैतिक कर्तव्य स्वधर्म का पालन है, न कि भावनात्मक आवेग में लिया गया निर्णय।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 5 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 5/72 7% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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