श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 6

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 35 मिनट का पठन 117 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः | यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ||६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

23 पद
न
नहीं
च
और
एतत्
यह
विद्मः
हम जानते हैं
कतरत्
कौन सा
नः
हमारे लिए
गरीयः
श्रेयस्कर
यत्
कि
वा
या
जयेम
हम जीतें
यदि
यदि
वा
या
न
हमें
जयेयुः
वे जीतें
यान्
जिनको
एव
निश्चय ही
हत्वा
मारकर
न
नहीं
जिजीविषामः
हम जीना चाहते
ते
वे
अवस्थिताः
खड़े हैं
प्रमुखे
सामने
धार्तराष्ट्राः
धृतराष्ट्र के पुत्र।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

और हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेयस्कर है – कि हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारकर हम जीना नहीं चाहते, वे ही आज हमारे सामने खड़े हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भारतीय सनातन संस्कृति, वेद-वेदांगों और श्रीमद्भगवद्गीता के विशाल अध्यात्म सागर में कुरुक्षेत्र की रणभूमि का यह प्रसंग केवल दो पक्षों के बीच युद्ध का इतिहास मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक मानव के अंतःकरण में प्रतिदिन चलने वाले धर्म और अधर्म, कर्तव्य और मोह, तथा राग और विराग के महायुद्ध का अत्यंत जीवंत और दार्शनिक चित्र है। जब हम 'Bhaktilok.in' के इस विशेष आध्यात्मिक विश्रेषण में प्रवेश करते हैं, तो हमें अर्जुन के उस विकट मानसिक और मनोवैज्ञानिक संकट का बोध होता है, जहाँ उनके जीवन के सारे निर्णय, क्षत्रिय धर्म के सारे सिद्धांत और आचार्य-गुरुजनों के प्रति अगाध प्रेम एक ही बिंदु पर आकर पूरी तरह से ध्वस्त हो जाते हैं।

यह छठा श्लोक अर्जुन की उस चरम अनिश्चय की स्थिति, विमर्श शून्यता और आंतरिक करुणा को उजागर करता है, जहाँ विजय का उल्लास भी पराजय की पीड़ा से अधिक भयानक प्रतीत होने लगता है। कुरुक्षेत्र की उस भयानक वेला में, जहाँ शंखनाद और युद्ध के नगाड़ों से दिशाएँ गूँज रही थीं, अर्जुन का रथ दोनों सेनाओं के मध्य आकर रुकता है। जैसे ही अर्जुन अपने ही गुरुजनों, पितामहों, भाइयों, पुत्रों और प्रिय मित्रों को विपक्ष में खड़ा देखते हैं, उनका गाण्डीव धनुष उनके हाथों से फिसलने लगता है। इस श्लोक में अर्जुन की यह स्वीकारोक्ति कि "हम यह नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है—जीतना या हारना", इस बात का प्रमाण है कि भौतिक बुद्धि जब अहंकार और मोह से घिर जाती है, तब वह अपने सबसे बड़े कर्तव्य पथ से भी विमुख होने लगती है। यह संपूर्ण प्रसंग मानव मात्र को यह संदेश देता है कि जब तक जीवन में ज्ञान का प्रकाश और आत्मकल्याण का बोध नहीं होता, तब तक बाहरी उपलब्धियां और विजय भी आत्मा के लिए भारी कारागार के समान प्रतीत होती हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता — प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) — श्लोक ६

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषामः
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥ ६ ॥

(उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक पद के अंत में विश्राम दें। 'गरीयो' तथा 'जयेयुः' का उच्चारण अनुनासिक और स्पष्ट होना चाहिए ताकि वैदिक छंद की लयशीलता और माधुर्य अक्षुण्ण बना रहे।)

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई में उतरने से हमें अर्जुन की मनोदशा और वेदव्यास जी की रचना-शैली की दिव्यता का दर्शन होता है। नीचे दी गई तालिका इस श्लोक के प्रत्येक पद का सटीक और आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
न च (Na cha) और न ही / और नहीं अज्ञान और अनिश्चय की उस स्थिति का सूचक जहाँ चित्त पूरी तरह से भ्रमित हो चुका है।
एतत् विद्मः (Etat vidmah) हम यह जानते हैं बुद्धि की विफलता और तर्क-वितर्क की सीमाओं का बोध, जहाँ ज्ञान होते हुए भी निर्णय नहीं लिया जा सकता।
कतरत् नः गरीयः (Katarat nah gariyah) इनमें से कौन सा हमारे लिए अधिक श्रेष्ठ है धर्मसंकट की स्थिति, जहाँ कर्तव्य और मोह के बीच का अंतर स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहा है।
यद्वा जयेम (Yadva jayema) या तो हम उन्हें जीत लें युद्ध में विजय प्राप्त करने की संभावना, जो सामान्य स्थिति में क्षत्रिय का परम लक्ष्य होती है।
यदि वा नो जयेयुः (Yadi va no jayeyuh) या वे हमें जीत लें शत्रु पक्ष द्वारा पराजित होने की स्थिति, जिसे अर्जुन अपने कुल और अपनों के संदर्भ में देख रहे हैं।
यान् एव हत्वा (Yan eva hatva) जिन्हें ही मारकर अपने ही गुरुजनों और रक्तसंबंधियों के संहार का पापी विचार, जो अर्जुन के मन को मथ रहा है।
न जिजीविषामः (Na jijivishamah) हम जीना भी नहीं चाहते जीवन के प्रति सम्पूर्ण वितृष्णा, जहाँ विजय या सत्ता का सुख भी अर्थहीन प्रतीत होता है।
ते अवस्थिताः (Te avasthitah) वे सब उपस्थित हैं कुरुक्षेत्र के मोर्चे पर सामने खड़े वे लोग जिनका जीवन कभी अर्जुन के लिए प्रेरणास्रोत रहा था।
प्रमुखे (Pramukhe) हमारे सामने / अग्रभाग में आमने-सामने की खड़ी वह चुनौती जिससे आँखें मिलाने का साहस अर्जुन का मन नहीं जुटा पा रहा है।
धार्तराष्ट्राः (Dhartarashtrah) धृतराष्ट्र के पुत्र (और उनके सहयोगी) वे संबंधी जिनके साथ सौहार्दपूर्ण संबंध होने चाहिए थे, वे आज काल के रूप में सामने खड़े हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत का यह महाकाव्यीय प्रसंग महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित उस अमर ग्रंथ का हिस्सा है, जिसे 'पंचम वेद' और मोक्ष का द्वार कहा जाता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं व्यूह रचना करके खड़ी थीं। हस्तिनापुर के सिंहासन के अधिकार को लेकर कौरवों और पांडवों के मध्य यह युद्ध अपरिहार्य हो चुका था। भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के अनुरोध पर उनके रथ को दोनों सेनाओं के मध्य लाकर खड़ा कर दिया था। इस क्षण तक अर्जुन एक महान योद्धा, अपराजय धनुर्धर और 'धनंजय' के रूप में जाने जाते थे, जिन्होंने कई बार देवताओं और असुरों के युद्ध में विजय प्राप्त की थी।

परंतु जैसे ही अर्जुन ने अपने सामने पितामह भीष्म, जिन्हें उन्होंने अपनी गोद में खेलाया था; गुरु द्रोणाचार्य, जिन्होंने उन्हें संसार का श्रेष्ठतम धनुर्धर बनाया था; और अपने भाइयों, ममाओं तथा आदरणीय जनों को देखा, उनके भीतर का वात्सल्य और मोह जाग उठा। शास्त्रीय दृष्टिकोण से यह प्रसंग उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ जीव अपने मूल स्वरूप को भूलकर शारीरिक और पारिवारिक बंधनों में उलझ जाता है। महर्षि वेदव्यास ने इस प्रसंग के माध्यम से यह दर्शाया है कि किस प्रकार महान से महान व्यक्ति भी जब सांसारिक मोह के पाश में बंध जाता है, तब उसकी बुद्धि कुंठित हो जाती है। यह पृष्ठभूमि हमें यह सिखाती है कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर जब भी हमारा सामना धर्म और कर्तव्य से हो, तब व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर सत्य का मार्ग चुनना ही वास्तविक पुरुषार्थ है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

1. मानसिक विकारों और संशय का शमन

इस श्लोक और इसके मर्म को समझने से व्यक्ति के मन में उत्पन्न होने वाले अनावश्यक संशय, हीनभावना और निर्णयहीनता के दोष दूर होते हैं।

2. आंतरिक शांति और स्थिरता

यह हमें सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियों चाहे जितनी भी प्रतिकूल हों, आंतरिक स्थिरता और संयम को कभी नहीं खोना चाहिए।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

गीता के श्लोकों का नियमित पाठ और मनन करने से सूक्ष्म शरीर शुद्ध होता है और सकारात्मक ऊर्जा का एक मजबूत कवच बनता है।

4. कर्मिक शुद्धि और निष्काम भाव

यह प्रसंग हमें परिणामों की आसक्ति से मुक्त होकर अपने नियत कर्म को करने की प्रेरणा देता है, जिससे संचित कर्मों का क्षय होता है।

5. गुरु और बड़ों के प्रति यथार्थ सम्मान

यह हमें रिश्तों की गरिमा और उनके प्रति सम्मान का बोध कराता है, साथ ही यह भी सिखाता है कि धर्म का पालन सर्वोच्च है।

6. जीवन के संकटों से लड़ने की शक्ति

जब जीवन में कोई बड़ा धर्मसंकट आए, तब अर्जुन की इस स्थिति से प्रेरणा लेकर बुद्धि को स्थिर करने की शक्ति प्राप्त होती है।

7. ईश्वर की शरण में जाने की प्रेरणा

जब मनुष्य अपनी बुद्धि से हार जाता है, तभी वह वास्तविक रूप से भगवान श्रीकृष्ण जैसे सतगुरु की शरण में जाने के योग्य बनता है।

8. आध्यात्मिक चेतना का जागरण

नियमित गीता अध्ययन से मनुष्य की चेतना भौतिक जगत से ऊपर उठकर आत्मिक और परमात्मा की प्राप्ति की ओर अग्रसर होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह संपूर्ण सामग्री 'Bhaktilok.in' के विद्वान आचार्यों, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के मर्मज्ञों द्वारा अत्यंत शोध और निष्ठा के साथ संकलित की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस छठे श्लोक का विश्लेषण करते समय आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदासजी महाराज और अन्य पारंपरिक टीकाकारों के भाष्यों को आधार बनाया गया है ताकि पाठकों तक शुद्ध, सनातन और वेदोपनिषदों के अनुकूल ज्ञान पहुँच सके।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: हमारी यह प्रस्तुति केवल शब्दों का अनुवाद नहीं है, बल्कि यह उस शाश्वत ज्ञान की पुनर्रचना है जो मानव को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। प्रत्येक पद और श्लोक की प्रामाणिकता की पुष्टि पारंपरिक ग्रंथों और शास्त्रीय आचार्यों के मार्गदर्शन में की गई है, जिससे हमारे पाठकों को सर्वोत्तम और विश्वसनीय आध्यात्मिक सामग्री प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इस श्लोक का मुख्य सार अर्जुन की अत्यंत गहरी मानसिक दुविधा और मोहग्रस्त स्थिति है। अर्जुन यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि उनके लिए क्या उचित है—युद्ध जीतकर अपनों की हत्या का पाप लेना या युद्ध हारकर स्वयं कष्ट सहना। यह मोह की चरम सीमा को दर्शाता है जहाँ कर्तव्य और भावनाएं आपस में उलझ जाती हैं।

अर्जुन के मन में यह भावना इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि वे अपने सामने उन गुरुओं, पितामहों और प्रियजनों को देख रहे थे जिनके रक्त से सने सिंहासन पर बैठकर वे किसी भी प्रकार का सुख या विजय प्राप्त नहीं करना चाहते थे। उनके लिए सांसਾਰিক विजय से अधिक अपने स्वजनों का जीवन और उनका स्नेह महत्वपूर्ण हो गया था।

हाँ, इस श्लोक और गीता के अन्य अध्यायों का नियमित मनन और अध्ययन करने से व्यक्ति को यह समझने में सहायता मिलती है कि मन का भ्रम और मोह अस्थायी है। जब मनुष्य अपने कर्तव्य को समझकर भगवान की शरण में जाता है, तो उसका समस्त मानसिक तनाव और संशय दूर हो जाता है।

'धार्तराष्ट्राः' का शाब्दिक अर्थ है धृतराष्ट्र के पुत्र और उनके समर्थक। इस प्रसंग में यह शब्द केवल दुर्योधन और उसके भाइयों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस संपूर्ण कौरव पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है जो अनीति और अधर्म के मार्ग पर चलकर पांडવો के विरुद्ध युद्ध भूमि में डटा हुआ था।

Bhaktilok.in का उद्देश्य आधुनिक पीढ़ी को सनातन धर्म के मूल ग्रंथों से जोड़ना है। इन श्लोकों की प्रामाणिक, सरल और गहन दार्शनिक व्याख्या पाठकों को न केवल धार्मिक रूप से समृद्ध करती है, बल्कि उन्हें जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सामना करने के लिए आध्यात्मिक संबल भी प्रदान करती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं: हम यह नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है – कि हम जीतें या वे जीतें। धृतराष्ट्र के पुत्र, जिन्हें मारकर हम जीना नहीं चाहते, वे ही हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं। Arjuna is utterly confused; victory or defeat both seem undesirable because the enemy is his own kin.

आध्यात्मिक व्याख्या / Spiritual Interpretation

यह श्लोक मानव मन की उस दशा को दर्शाता है जब वह आसक्ति और कर्तव्य के द्वन्द्व में फँस जाता है। अर्जुन का यह कथन उनकी पूर्ण शरणागति का मार्ग प्रशस्त करता है, क्योंकि अब वे स्वयं कोई निर्णय नहीं ले पा रहे।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 6 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 6/72 8% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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