श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 7

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 45 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः | यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

20 पद
कार्पण्यदोष
कृपणता के दोष से
उपहत
ग्रस्त
स्वभावः
स्वभाव वाला
पृच्छामि
पूछता हूँ
त्वाम्
आपसे
धर्मसम्मूढचेताः
धर्म के विषय में मूढ़ चित्त वाला
यत्
जो
श्रेयः
कल्याणकारी
स्यात्
हो
निश्चितम्
निश्चित रूप से
ब्रूहि
कहो
तत्
वह
मे
मुझे
शिष्यः
शिष्य
ते
आपका
अहम्
मैं हूँ
शाधि
सिखाइए
माम्
मुझे
त्वाम्
आपको
प्रपन्नम्
शरणागत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मेरा स्वभाव कृपणता के दोष से ग्रसित हो गया है और धर्म के विषय में मूढ़ बुद्धि होकर मैं आपसे पूछता हूँ। जो निश्चित कल्याणकारी हो, वह मुझसे कहिए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपको शरणागत हूँ, मुझे सिखाइए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु साक्षात भगवान श्री कृष्ण के मुखकमल से निःसृत वह अमृतधारा माना गया है, जो मानव मात्र को जन्म-मृत्यु के चक्र तथा अज्ञान के गांधार अंधकार से निकालकर दिव्य प्रकाश की ओर ले जाती है। गीता का प्रत्येक श्लोक अपने आप में एक महामंत्र है, जो जीवन की उलझनों को सुलझाने की अद्भुत क्षमता रखता है। विशेष रूप से जब हम महाभारत के रणक्षेत्र कुरुक्षेत्र की उस धर्मभूमि का स्मरण करते हैं, जहाँ दोनों सेनाओं के बीच अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं, तब यह श्लोक (कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः...) संपूर्ण मानवता के लिए एक मार्गदर्शक स्तंभ के रूप में उभर कर सामने आता है।

इस श्लोक में अर्जुन की मनोदशा का वह सजीव चित्रण है जिससे प्रत्येक मनुष्य अपने दैनिक जीवन में कभी न कभी अवश्य रूबरू होता है। जब अहंकार, मोह, और कर्तव्य के बीच का संघर्ष चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तब बुद्धि काम करना बंद कर देती है। ऐसे संकटपूर्ण क्षणों में, जहाँ लौकिक ज्ञान और भौतिक उपाय पूर्णतः विफल हो जाते हैं, वहीं से आध्यात्मिक चेतना का वास्तविक आरंभ होता है। अर्जुन का यह कथन केवल एक योद्धा की व्यथा नहीं है, बल्कि यह हर उस जिज्ञासु आत्मा की पुकार है जो इस भवसागर रूपी कुरुक्षेत्र में सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के मध्य उलझकर रह गई है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक 'शरणागति योग' का प्रवेश द्वार है। जब तक मनुष्य में 'मैं सब कुछ जानता हूँ' या 'मैं अपने बल पर सब संभाल लूंगा' का अहंकार रहता है, तब तक दिव्य कृपा का अवतरण संभव नहीं होता। अर्जुन ने जब अपनी दीनता और अज्ञानता को पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार किया और अपने आराध्य श्री कृष्ण के चरणों में स्वयं को एक शिष्य के रूप में समर्पित कर दिया, तभी गीता के ज्ञान का वह दिव्य सूर्योद हुआ जिसकी रोशनी सदियों से पूरी मानवता को आलोकित कर रही है। इस आलेख में हम इसी अत्यंत गूढ़ और प्रेरणादायी श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे, जो भक्तालोक (Bhaktilok.in) के पाठकों के लिए आत्मिक शांति और जीवन प्रबंधन का अचूक साधन सिद्ध होगा।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं पाठ विधि

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।

यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥ ७॥


अथवा (पदों का विच्छेद रूप):

कार्पण्य-दोष-उपहत-स्वभावः पृच्छामि त्वां धर्म-सम्मूढ-चेताः।
यत्-श्रेयः स्यात्-निश्चितम् ब्रूहि तत्-मे शिष्यः ते अहम् शाधि माम् त्वाम् प्रपन्नम्॥

श्लोक पाठ की शास्त्रीय एवं पारंपरिक विधि:
  • प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • भगवान श्री कृष्ण या अपने इष्टदेव के विग्रह अथवा चित्र के समक्ष शुद्ध घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें।
  • मन को शांत करते हुए तीन बार दीर्घ श्वास लें (प्राणायाम करें) और श्लोक का सस्वर स्पष्ट उच्चारण करें।
  • कम से कम 108 बार (एक माला) इस श्लोक का मानसिक जप करने से चित्त की चंचलता समाप्त होती है और भगवद्कृपा प्राप्त होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस सारणी में श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म व्याकरणिक विश्लेषण, सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहरा आध्यात्मिक एवं दार्शनिक मर्म प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Insight)
कार्पण्य (Karpanya) कृपणता, कायरता, दीनता यह वह संकीर्ण मानसिक स्थिति है जहाँ मनुष्य अपनी वास्तविक दिव्य शक्ति को भूलकर क्षुद्र सांसारिक मोह-माया और डर के वशीभूत हो जाता है।
दोषोपहतस्वभावः (Dosho-pohata-swabhavah) दोष से दूषित हुआ स्वभाव मोह और भय रूपी दोष के कारण अर्जुन का जो स्वाभाविक क्षत्रिय स्वभाव (वीरता और न्यायप्रियता) था, वह क्षणिक रूप से आच्छादित या ढक गया है।
पृच्छामि (Pricchami) मैं पूछता हूँ / प्रार्थना करता हूँ अहंकार का त्याग करके ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु के समक्ष हाथ जोड़कर विनम्र भाव से प्रश्न करने की प्रक्रिया, जो जिज्ञासा का प्रतीक है।
त्वाम् (Tvam) आपसे (श्री कृष्ण से) समस्त ब्रह्मांड के मार्गदर्शक, परम गुरु और आराध्य भगवान श्री कृष्ण को ही एकमात्र सही उत्तरदाता मानना।
धर्मसम्मूढचेताः (Dharma-sam-moodha-chetah) धर्म के विषय में मोहित चित्त वाला जब कर्तव्य और अकर्तव्य, पाप और पुण्य, तथा सही और गलत के निर्णय में बुद्धि पूरी तरह भ्रमित हो जाए, तब ऐसी स्थिति को 'धर्मसंमोह' कहते हैं।
यत् श्रेयः स्यात् (Yat Shreyah Syat) जो कल्याणकारी हो / जिससे परम कल्याण हो क्षणिक सुख (प्रेय) की कामना त्यागकर केवल और केवल शाश्वत और परम आध्यात्मिक कल्याण (श्रेय) की मांग करना।
निश्चितम् ब्रूहि (Nishchitam Bruhi) निश्चित रूप से कहिए / स्पष्ट आदेश दीजिए असमंजस की स्थिति को समाप्त कर ऐसा अकाट्य और स्पष्ट समाधान देना जिसमें कोई दुविधा या संशय शेष न रहे।
तत् मे (Tat Me) वह मेरे लिए (बताइए) अपने व्यक्तिगत कल्याण के लिए गुरु से सीधी और व्यक्तिगत अनुकंपा की याचना करना।
शिष्यः ते अहम् (Shishyaha Te Aham) मैं आपका शिष्य हूँ गुरु-शिष्य परंपरा का पूर्ण आदर करते हुए अपने को अनुशासित और आज्ञाकारी छात्र के रूप में स्वीकार करना। ज्ञान प्राप्ति के लिए यह प्रथम शर्त है।
शाधि माम् (Shadhi Mam) आप मेरी शिक्षा कीजिए / मुझे अनुशासन में रखिए मुझे सही मार्ग दिखाइए और यदि मैं भटकूँ तो मुझे नियंत्रित कीजिए। यह पूर्ण समर्पण का सूचक है।
त्वाम् प्रपन्नम् (Tvam Prapannam) जो आपकी शरण में आया हुआ है अपनी सारी स्वतंत्रताओं और बौद्धिक अहंकार को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर पूर्ण रूप से शरणागत हो जाना (शरणागति तत्त्व)।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के आरंभिक क्षणों से जुड़ी हुई है। जब कौरवों और पांडवों की सेनाएँ कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं, तब दोनों पक्षों के बीच युद्ध का शंखनाद हो चुका था। पांडవ सेना के मुख्य सेनापति और श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन ने अपने सारथी भगवान श्री कृष्ण से कहा कि वे उनके रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा करें, ताकि वे देख सकें कि युद्ध करने के लिए कौन-कौन से लोग यहाँ उपस्थित हैं।

रथ के मध्य में पहुँचते ही अर्जुन ने देखा कि सामने खड़े लोगों में उनके अपने गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, चचेरे भाई दुर्योधन आदि सभी उनके अपने ही परिवारजन, प्रियजन और गुरुजन हैं। इस दृश्य को देखते ही अर्जुन के भीतर का पारिवारिक मोह, करुणा और ममता जागृत हो गई। उनके हाथ से गांडीव धनुष फिसलने लगा, उनका शरीर कांपने लगा, और उनका गला सूखने लगा। उन्होंने श्री कृष्ण से स्पष्ट कह दिया कि वे अपनों का व करके इस राज्यसुख या विजय को नहीं चाहते। वे युद्ध न करने का निर्णय लेते हैं और रथ के पिछले भाग में शोक-विह्वल होकर बैठ जाते हैं।

यह वह क्षण था जब एक महान योद्धा पूरी तरह टूट चुका था। सांसारिक दृष्टि से वह पराजय थी, परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह उस महान ग्रंथ के उद्भव की प्रस्तावना थी जो आज 'श्रीमद्भगवद्गीता' के नाम से पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। प्रारंभ में अर्जुन ने अपने तर्कों से भगवान को यह समझाने का प्रयास किया कि युद्ध करना पाप है। परंतु जब उन्होंने देखा कि उनके अपने तर्कों से उनके मन की अशांति और भ्रम दूर नहीं हो रहा है, तब अर्जुन को अपनी बौद्धिक सीमा का अहसास हुआ।

यहीं पर अर्जुन ने अपने सखा भाव को त्यागकर अपने गुरु और भगवान श्री कृष्ण के समक्ष पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि उनका क्षत्रिय स्वभाव मोह के कारण दूषित हो गया है और वे धर्म के सही मार्ग को तय करने में असमर्थ हैं। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाला यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जब तक अहंकार समाप्त नहीं होता, तब तक वास्तविक ज्ञान का प्रकाश प्राप्त नहीं हो सकता। अर्जुन का यह विलाप और उसके बाद का यह समर्पण ही समस्त संसार के लिए मोक्ष का द्वार बना।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस सातवें श्लोक का नियमित पाठ, मनन और इसके भाव को जीवन में उतारने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. अहंकार का शमन (Ego Dissolution)

यह श्लोक मनुष्य के भीतर छिपे 'मैं सब जानता हूँ' के अहंकार को समाप्त करता है। इसके निरंतर स्मरण से व्यक्ति में विनम्रता और सीखने की प्रवृत्ति (शिष्य भाव) का विकास होता है।

2. मानसिक शांति और संशय मुक्ति

जब जीवन में निर्णय न ले पाने की स्थिति (धर्मसंमोह) उत्पन्न हो, तब इस श्लोक का पाठ करने से मन शांत होता है और अंतःकरण में सही मार्ग चुनने की स्पष्टता आती है।

3. पूर्ण शरणागति का अनुभव

इस मंत्र के जप से साधक यह सीखता है कि कठिन परिस्थितियों में स्वयं को ईश्वर के हाथों में कैसे सौंप देना चाहिए। इससे चिंता, तनाव और अवसाद का स्वतः शमन होता है।

4. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विस्तार

वैदिक श्लोकों के सटीक उच्चारण से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Sound Vibrations) शरीर के चक्रों को संतुलित करते हैं, जिससे व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा और औरा मजबूत होती है।

5. कर्मिक शुद्धि और पापों का नाश

भगवद्गीता के वचनों का प्रतिदिन अध्ययन और स्मरण करने से पिछले जन्मों और वर्तमान के नकारात्मक कर्मों (पापों) का प्रभाव क्षीण होता है और चेतना पवित्र होती है।

6. गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति निष्ठा

यह श्लोक आधुनिक पीढ़ी में अपने गुरुओं, शिक्षकों और मार्गदर्शकों के प्रति आदर और श्रद्धा की भावना को सुदृढ़ करता है, जो जीवन में सफलता की कुंजी है।

7. संकट काल में धैर्य की प्राप्ति

जीवन के किसी भी बड़े संकट या विपत्ति के समय व्यक्ति विचलित नहीं होता, बल्कि वह विश्वास रखता है कि ईश्वर उसका मार्ग अवश्य प्रशस्त करेंगे।

8. मोक्ष और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग

शरणागति योग भगवद्गीता का मूल सार है। इस मार्ग पर चलने से साधक धीरे-धीरे सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

भक्तालोक (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह संपूर्ण आलेख और व्याख्या संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आती है। इसे वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य के संदर्भों सहित), तथा महाभारत के पौराणिक आख्यानों का गहन अध्ययन करने के पश्चात हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और सनातन धर्म के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को त्रुटिहीन, प्रामाणिक, और जीवनोपयोगी आध्यात्मिक सामग्री प्रदान करना है, जिससे वे अपने सनातन धर्म की समृद्ध थाती से जुड़ सकें। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक आचार्यों और प्रामाणिक टीकाओं का सहारा लेने की संस्तुति की जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का सातवां श्लोक है। इस प्रसंग में अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं और अपने कर्तव्यों से विमुख होकर श्री कृष्ण के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं। यहीं से भगवान कृष्ण गीता का वास्तविक उपदेश आरंभ करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'कृपण' कंजूस को कहते हैं, परंतु गीता के संदर्भ में 'कार्पण्य' का अर्थ है - संकीर्ण मानसिकता, कायरता या वह स्थिति जहाँ मनुष्य अपनी उच्च आध्यात्मिक और कर्तव्यनिष्ठ प्रकृति को भूलकर तुच्छ मोह और डर के वशीभूत हो जाता है। आत्मिक शक्ति के होते हुए भी दीनहीन बन जाना ही कार्पण्य दोष है।

अर्जुन ने प्रार्थना की है कि उनका चित्त धर्म के विषय में पूरी तरह भ्रमित हो गया है। वे अपने सारे अहंकार और स्वतंत्र तर्कों का त्याग करके भगवान श्री कृष्ण के शिष्य बन चुके हैं। इसलिए वे उनसे आग्रह करते हैं कि वे उन्हें कोई ऐसा निश्चित और कल्याणकारी (श्रेयस्कर) मार्ग बताएं जो उनके इस संकट और संशय को हमेशा के लिए समाप्त कर सके।

जब भी जीवन में कोई बड़ी दुविधा या मानसिक तनाव उत्पन्न हो, जहाँ सही निर्णय लेना असंभव लगे, तब इस श्लोक का स्मरण करने से व्यक्ति को अपने अहंकार को त्यागने की प्रेरणा मिलती है। यह मानसिक शांति, विनम्रता, निर्णय लेने की स्पष्टता और ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति का भाव विकसित करता है।

हाँ, इस पवित्र श्लोक का पाठ कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इसके लिए प्रातः स्नान करके शुद्ध होकर, शांत मन से भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करते हुए इस श्लोक का सस्वर पाठ या मानसिक जप किया जा सकता है। इसमें किसी भी प्रकार के कठिन कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती, केवल श्रद्धा और समर्पण भाव मुख्य है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं: मैं दीनता (कृपणता) के दोष से ग्रस्त हूँ और धर्म के बारे में मेरी बुद्धि मोहित है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ – जो निश्चित रूप से मेरा कल्याण करे, वह बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। कृपया मुझे सिखाइए। Arjuna explicitly surrenders to Krishna as a disciple, seeking definite guidance.

महत्व / Significance

यह श्लोक गीता के उपदेश का प्रवेश द्वार है। जब तक शिष्य गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण नहीं करता, तब तक गूढ़ ज्ञान नहीं दिया जा सकता। अर्जुन की यह विनम्रता ही उन्हें गीता-ज्ञान का अधिकारी बनाती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/72 10% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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