श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 8

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 44 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ||८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
न
नहीं
हि
निश्चय ही
प्रपश्यामि
देखता हूँ
मम
मेरे
अपनुद्यात्
दूर कर सके
यत्
जो
शोकम्
शोक को
उच्छोषणम्
सुखा देने वाला
इन्द्रियाणाम्
इन्द्रियों को
अवाप्य
प्राप्त करके
भूमौ
पृथ्वी पर
असपत्नम्
बिना शत्रु के
ऋद्धम्
समृद्ध
राज्यम्
राज्य
सुराणाम्
देवताओं का
अपि
भी
च
और
आधिपत्यम्
अधिपत्य।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखा देने वाले इस शोक को दूर कर सके, चाहे मैं पृथ्वी पर बिना शत्रु के समृद्ध राज्य प्राप्त कर लूँ या देवताओं का भी अधिपति बन जाऊँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् - Bhaktilok.in

भूमिका एवं आध्यात्मिक महत्त्व

सनातन धर्म के महान ग्रंथ श्रीमद्भागवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) का यह आठवां श्लोक ("न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्...") मानव मनोविज्ञान, अगाध मानसिक संकट, कर्तव्य-विमुढ़ता और मोह की उस पराकाष्ठा का जीवंत और अचूक दस्तावेज है, जिससे जीवन के किसी न किसी मोड़ पर हर साधारण और असाधारण मनुष्य का सामना होता है। यह श्लोक केवल महाभारत के रणक्षेत्र कुरुक्षेत्र की एक तात्कालिक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भौतिक उपलब्धियों, ऐश्वर्य, पद, और प्रतिष्ठा की सीमाओं को बेनकाब करते हुए आंतरिक शांति के उस अकाट्य सत्य को उजागर करता है, जिसे केवल ब्रह्मज्ञान और आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है।

जब महान योद्धा अर्जुन अपने ही परिजनों, गुरुजनों और प्रियजनों को शत्रु पक्ष में खड़ा देखते हैं, तब उनके भीतर उत्पन्न होने वाला शोक उनके संपूर्ण शारीरिक और मानसिक तंत्र को शोषित (सुखा) करने लगता है। इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस महाकाव्य में यह स्वीकार करते हैं कि संसार का समस्त वैभव, स्वर्ग का आधिपत्य और पृथ्वी का अकुंठ राज्य भी उनके इस आंतरिक और मानसिक संताप को शांत करने में असमर्थ है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत शोधपरक आलेख में हम इस श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्षों का गहन विश्लेषण करेंगे, ताकि आज की तनावपूर्ण जीवनशैली में जी रहे साधक और पाठक इससे उचित मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के इस महत्वपूर्ण श्लोक का उच्चारित पाठ, संस्कृत पदच्छेद और उसका भावपूर्ण स्वरूप नीचे दिया गया है। इसका पाठ विधि-विधान से एकाग्रचित्त होकर करने से मानसिक विकारों का शमन होता है:

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८॥

पदच्छेद (Word Splitting):

न / हि / प्रपश्यामि / मम / अपनुद्यात् / यत् / शोकम् / उच्छोषणम् / इन्द्रियाणाम् / अवाप्य / भूमौ / असपत्नम् / ऋद्धम् / राज्यम् / सुराणाम् / अपि / च / आधिपत्यम् ॥ ८ ॥

श्लोक का सामान्य हिंदी अनुवाद: अर्जुन कहते हैं—"मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता जो मेरे इस शोक को दूर कर सके, जो मेरी इंद्रियों को सूखा रहा है (सुस्त और चेतनाहीन कर रहा है)। यदि मुझे पृथ्वी पर निष्कंटक, समृद्ध और शत्रुहीन राज्य मिल जाए, अथवा स्वर्ग के देवताओं का आधिपत्य (इन्द्र पद) भी प्राप्त हो जाए, तो भी मेरा यह शोक दूर नहीं हो सकता।"

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में एक गहरा दार्शनिक अर्थ छिपा है। आइए, तालिका के माध्यम से इसके हर एक पद का सूक्ष्म विश्लेषण करें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
न हि न ही, कदापि नहीं नकारात्मकता और भौतिक उपायों की पूर्ण असमर्थता का बोध।
प्रपश्यामि मैं देखता हूँ अर्जुन की दृष्टि का अपनी बुद्धि और ज्ञान के दायरे में पूरी तरह विफल होना।
मम मेरे व्यक्तिगत अहंकार, ममत्व (मोह) और स्वामित्व की भावना का प्रकटीकरण।
अपनुद्यात् दूर कर सके शोक या मानसिक अंधकार को जड़ से उखाड़ फेंकने की क्षमता।
यत् शोकम् जो शोक (विलाप) अज्ञान और मोह जनित मानसिक संताप, जो समस्त ऊर्जा का ह्रास करता है।
उच्छोषणम् सुखाने वाला जैसे गर्मी पानी को सोख लेती है, वैसे ही यह शोक प्राण ऊर्जा को सोख रहा है।
इन्द्रियाणाम् इंद्रियों की ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की कार्यक्षमता तथा चेतना का कुंठित होना।
अवाप्य प्राप्त करके भौतिक संपदा या सत्ता को हासिल करने का कार्य।
भूमौ इस पृथ्वी पर भौतिक जगत, मृत्युलोक और कर्मभूमि का दायरा।
असपत्नम् शत्रुहीन, निष्कंटक बिना किसी विरोध या शत्रु के एकाधिकार वाला राज्य।
ऋद्धम् समृद्ध, धन-धान्य से परिपूर्ण ऐश्वर्य, भौतिक सुख-सुविधाओं और संपदा की पराकाष्ठा।
सुराणाम् अपि च तथा देवताओं का भी स्वर्ग के देवताओं की सर्वोच्च सत्ता और दिव्य सुखों का भोग।
आधिपत्यम् स्वामी या आधिपत्य ब्रह्मांडीय या स्वर्गीय प्रशासन का सर्वोच्च पद (इंद्र पद)।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के आरंभिक क्षणों से जुड़ी हुई है। कौरवों और पांडवों की विशाल सेनाएं कुरुक्षेत्र के खुले मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं। शंखध्वनि हो चुकी थी, युद्ध का उद्घोष हो चुका था, और धर्म की स्थापना का यह महान क्षण आ चुका था। ऐसे में, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को दोनों सेनाओं के बीच में लाकर खड़ा कर देते हैं और कहते हैं—"हे पार्थ! इन कौरवों को देखो।" अर्जुन अपने रथ पर सवार होकर जब चारों ओर दृष्टि डालते हैं, तो उन्हें वहां कोई अनजान शत्रु नहीं, बल्कि उनके अपने गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, काका कृप, भाई दुर्योधन, मामा शल्य और अन्य सगे-संबंधी दिखाई देते हैं।

यहीं से अर्जुन के भीतर पारिवारिक मोह (स्नेह) और कर्तव्य (क्षत्रिय धर्म) के बीच एक भीषण मानसिक द्वंद्व शुरू होता है। अर्जुन का शरीर कांपने लगता है, उनके हाथ से गांडीव धनुष फिसलने लगता है, त्वचा जलने लगती है और उनका चित्त पूरी तरह भ्रमित हो जाता है। इस श्लोक में अर्जुन श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी इसी लाचारी और आंतरिक विवशता को व्यक्त करते हैं। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यदि उन्हें तीनों लोकों का राज्य या देवताओं का राजा (इंद्र) भी बना दिया जाए, तब भी उनके इस तीव्र शोक का निवारण नहीं हो सकता। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जब तक मनुष्य के भीतर अज्ञान और मोह का पर्दा रहता है, तब तक बाहरी दुनिया के सारे सुख, सिंहासन और पद उसे सांत्वना देने में पूरी तरह विफल रहते हैं।

महर्षि वेद व्यास ने इस प्रसंग को बहुत ही मनोवैज्ञानिक और यथार्थवादी ढंग से चित्रित किया है। यह इस बात का प्रतीक है कि भौतिक प्रगति और आंतरिक मानसिक शांति दो अलग-अलग ध्रुव हैं। जब तक आत्मा का परमात्मा से मिलन या वास्तविक ज्ञान (गीता ज्ञान) प्राप्त नहीं होता, तब तक इंसान अंदर से खोखला ही रहता है। यही कारण है कि इसके तुरंत बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देना आरंभ किया, जिसे हम 'श्रीमद्भागवद्गीता' के नाम से जानते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवद्गीता के इन श्लोकों का अध्ययन, मनन और श्रवण करने से जीवन में अद्भुत सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक संताप और तनाव से मुक्ति

इस श्लोक और इसके मर्म को समझने से यह बोध होता है कि सांसारिक परेशानियां और शोक अस्थायी हैं, जिससे मन को असीम शांति मिलती है और मानसिक तनाव कम होता है।

2. मोह और अज्ञान का नाश

यह श्लोक मनुष्य को यह सिखाता है कि भौतिक उपलब्धियां आंतरिक दुखों का स्थाई इलाज नहीं हैं, जिससे व्यक्ति मोह के पाश से मुक्त होने लगता है।

3. एकाग्रता और मानसिक बल में वृद्धि

नियमित गीता पाठ से बुद्धि तीव्र होती है और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित होता है, जिससे अर्जुन की तरह कमजोर पड़ती मानसिक स्थिति मजबूत होती है।

4. कर्म प्रधान जीवन की प्रेरणा

शोक और निराशा के दौर में भी अपने कर्तव्यों से विमुख न होने की प्रेरणा मिलती है, और व्यक्ति पलायनवादी सोच से बाहर आता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विकास

पवित्र वैदिक और गीता श्लोकों के उच्चारण से आसपास का वातावरण शुद्ध होता है और शरीर के चारों ओर एक सकारात्मक सुरक्षात्मक आवरण (Aura) बनता है।

6. आत्म-निरीक्षण (Self-Introspection) की क्षमता

साधक अपने जीवन के दुखों के मूल कारणों को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने में सक्षम होता है, जिससे अहंकार का शमन होता है।

7. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

पवित्र शास्त्रों के अध्ययन और उनके वचनों पर मनन करने से पुराने नकारात्मक कर्मों के संस्कारों का क्षय होता है और चेतना उन्नत होती है।

8. ईश्वरीय शरणागति की प्राप्ति

जब मनुष्य अपनी सभी भौतिक सीमाओं और विफलताओं को स्वीकार कर लेता है, तभी वह वास्तविक रूप से भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में शरण लेता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन संस्कृति, वेद, पुराण और श्रीमद्भागवद्गीता के मूल संस्कृत ग्रंथों तथा पारंपरिक आचार्यों की टीकाओं के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों को वेदों और उपनिषदों का वास्तविक, तथ्यात्मक और सरल हिंदी स्वरूप प्राप्त हो, जिससे उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा शांत हो सके। इस लेख में किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण या अप्रमाणिक दावों से बचा गया है और इसे पूर्णतः शैक्षणिक, दार्शनिक और भक्तिपरक मानकों के अनुरूप ढाला गया है। यदि आपके पास इस विषय पर कोई सुझाव या प्रश्न है, तो आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

प्रश्ल 1: श्रीमद्भागवद्गीता के प्रथम अध्याय के इस आठवें श्लोक का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जब मनुष्य अत्यधिक मोह, अज्ञान और मानसिक शोक से ग्रस्त होता है, तब संसार का कोई भी भौतिक सुख, संपत्ति, पृथ्वी का राज्य या स्वर्ग का सिंहासन भी उसे आंतरिक शांति प्रदान नहीं कर सकता। आंतरिक दुखों का निवारण केवल आत्मज्ञान और आध्यात्मिक चेतना से ही संभव है।
प्रश्न 2: अर्जुन के इस शोक को 'इंद्रियों को सुखाने वाला' क्यों कहा गया है?
उत्तर: जब व्यक्ति अत्यधिक मानसिक आघात, चिंता या शोक में डूब जाता है, तो उसकी शारीरिक ऊर्जा, उत्साह और इंद्रियों की कार्यक्षमता नष्ट होने लगती है। अर्जुन की मनोदशा ऐसी हो चुकी थी कि उनका शरीर सुस्त पड़ रहा था और धनुष उनके हाथों से छूट रहा था, जिसे श्लोक में 'उच्छोषणमिन्द्रियाणाम्' कहा गया है।
प्रश्न 3: क्या भौतिक सफलता से मानसिक शांति प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर: श्लोक और गीता के दर्शन के अनुसार, भौतिक सफलता (जैसे राज्य या स्वर्ग का आधिपत्य) बाहरी सुख और सुविधाएं तो दे सकती है, लेकिन यह मन के आंतरिक संताप, भय और शोक को दूर नहीं कर सकती। सच्ची मानसिक शांति केवल ईश्वर की शरणागति और आत्मबोध से ही मिलती है।
प्रश्न 4: इस श्लोक का पाठ या मनन करने से दैनिक जीवन में क्या लाभ होता है?
उत्तर: इस श्लोक का मनन करने से व्यक्ति अपनी समस्याओं को अधिक स्पष्टता से देख पाता है, भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक मोह से मुक्ति मिलती है, और जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की मानसिक शक्ति प्राप्त होती है।
प्रश्न 5: Bhaktilok.in पर यह सामग्री किस प्रकार तैयार की गई है?
उत्तर: Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह सामग्री प्रामाणिक संस्कृत ग्रंथों, पारंपरिक टीकाओं और विषय विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत की जाती है, ताकि पाठकों को शत-प्रतिशत विश्वसनीय और उपयोगी आध्यात्मिक ज्ञान मिल सके।

© 2026 Bhaktilok.in - सर्वाधिकार सुरक्षित। सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु समर्पित।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं: मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता जो मेरे इस शोक को दूर कर सके, जो मेरी इन्द्रियों को सुखा रहा है। यदि मैं पृथ्वी का अखण्ड साम्राज्य भी प्राप्त कर लूँ, या देवताओं का स्वामी भी बन जाऊँ, तो भी यह शोक नहीं मिटेगा। Arjuna declares that no material achievement, however grand, can alleviate his spiritual despair.

गहरा अर्थ / Deeper Meaning

यह श्लोक बताता है कि आध्यात्मिक संताप को भौतिक सुखों से शान्त नहीं किया जा सकता। अर्जुन का शोक वस्तुतः आत्मा की पुकार है, जो उसे परमार्थ की ओर ले जाने वाला है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 8 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 8/72 11% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!