मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप | न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ||९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदएवम्
इस प्रकार
उक्त्वा
कहकर
हृषीकेशम्
हृषीकेश (कृष्ण) से
गुडाकेशः
गुडाकेश (अर्जुन)
परन्तप
हे शत्रुतापन
न
नहीं
योत्स्ये
युद्ध करूँगा
इति
इस प्रकार
गोविन्दम्
गोविन्द (कृष्ण) से
उक्त्वा
कहकर
तूष्णीम्
मौन
बभूव
हो गया
ह
निश्चय ही।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे परन्तप! (संजय कहते हैं) इस प्रकार हृषीकेश (कृष्ण) से कहकर और गोविन्द से "मैं युद्ध नहीं करूँगा" कहकर गुडाकेश (अर्जुन) मौन हो गए।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ||९||
महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) का यह अत्यंत महत्वपूर्ण एवं टर्निंग पॉइंट श्लोक है।
अध्यात्मक एवं ब्रह्माण्डकीय महत्व: विषाद से योग की ओर प्रथम पग
सनातन धर्म के सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता का यह नवां श्लोक मानव जीवन के एक ऐसे मोड़ को चित्रित करता है जहाँ अज्ञान, मोह, और कर्तव्य का भीषण अन्तर्द्वन्द्व चरम सीमा पर पहुँच जाता है। कुरुक्षेत्र की महासमर भूमि पर, जहाँ दोनों ओर से शंखनाद हो चुके हैं, अस्त्र-शस्त्र तन चुके हैं, और मृत्यु का तांडव नाचने को तैयार है, वहाँ धर्मराज युधिष्ठिर के पराक्रमी अनुज, महाबाहु अर्जुन अपने गांडीव धनुष को नीचे रख देते हैं। यह श्लोक केवल एक योद्धा की असमंजस स्थिति का वर्णन नहीं है, बल्कि यह हर उस साधारण मनुष्य की आन्तरिक स्थिति का प्रतीक है जो जीवन की जटिल परिस्थितियों, पारिवारिक मोह और कर्तव्य की वेदी के बीच स्वयं को पूर्णतः असहाय और दिशाहीन पाता है।
यहाँ अर्जुन ने अपने आराध्य, सखा और मार्गदर्शक भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी करुणा और कायरता का जो सम्मिश्रण प्रदर्शित किया है, वह अंततः ब्रह्मांड के सबसे महान ज्ञान यानी गीता के अवतरण की आधारशिला बनता है। 'गुडाकेश' कहे जाने वाले अर्जुन, जिन्होंने नींद और आलस्य पर विजय प्राप्त कर ली थी, वे अब एक नए प्रकार की मानसिक निद्रा यानी 'अज्ञान जनित मोह की निद्रा' के शिकार हो चुके हैं। इस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में, यह श्लोक अंधकार से प्रकाश की ओर जाने वाली उस महान यात्रा का द्वार खोलता है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण जगत को जीवन जीने की कला, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का वह अमृत प्रदान करते हैं जो युगों-युगों तक मानव जाति का मार्गदर्शन करता रहेगा।
भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष अध्ययन में हम इस श्लोक के हर एक आयाम को शास्त्रीय, व्याकरणिक, दार्शनिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझेंगे, ताकि साधक केवल शब्दों को न पढ़े, बल्कि अर्जुन की तरह अपने जीवन के हर कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण को अपना सारथी बना सके।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥ ९॥
पदच्छेद (Word Separation):
एवम् + उक्त्वा + हृषीकेशम् + गुडाकेशः + परन्तप + न + योत्स्य इति + गोविन्दम् + उक्त्वा + तूष्णीम् + बभूव + ह।
श्लोक गान की शास्त्रीय विधि:
इस श्लोक का उच्चारण करते समय अनुष्टुप छंद के नियमों का पालन करना चाहिए। प्रथम चरण में 'हृषीकेशम्' और द्वितीय चरण में 'गोविन्दमुक्त्वा' का उच्चारण स्पष्ट, सस्वर और संयत गति से होना चाहिए, जो साधक के मन में गंभीरता और वैराग्य का भाव उत्पन्न करे।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
नीचे दी गई सारणी में श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
महाभारत का युद्ध सनातन इतिहास का सबसे भीषण और निर्णायक संग्राम था। हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए कौरवों और पांडवों के मध्य उत्पन्न हुआ यह विवाद अंततः शस्त्रों के निर्णय पर आ पहुँचा था। कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने थीं। कौरव पक्ष की ओर से पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य और आचार्य कृपाचार्य जैसे महान योद्धा उपस्थित थे, तो दूसरी ओर पांडव सेना धर्म की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध थी। ऐसे अभूतपूर्व अवसर पर अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलने का आग्रह किया था।
जब अर्जुन ने रथ के मध्य भाग में आकर अपने सगे-संबोधियों, गुरुओं, दादाओं, मामाओं और भाइयों को युद्ध के मैदान में मर कटने के लिए तैयार देखा, तो उनका क्षत्रिय हृदय करुणा और शोक से भर गया। उनके हाथ से गांडीव धनुष फिसलने लगा, त्वचा में जलन होने लगी और मन पूरी तरह से विचलित हो गया। अर्जुन ने श्रीकृष्ण के सामने तर्क दिए कि इस कुलक्षय से कुलधर्म नष्ट हो जाएगा, पाप बढ़ेगा और वे त्रिलोकी के राज्य के लिए भी अपनों का वध नहीं करना चाहते।
इस श्लोक में अर्जुन द्वारा खुद को 'गुडाकेश' (निद्रा विजेता) कहे जाने के बावजूद मोहग्रस्त होना और अंत में गांडीव रखकर 'तूष्णीं बभूव ह' (मौन हो जाना) यह दर्शाता है कि मानव बुद्धि जब अपने बल पर जीवन की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करती है, तो वह भ्रमित हो जाती है। यह मौਨ केवल शब्दों की समाप्ति नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि अब अर्जुन अपने सीमित तर्कों से थक चुका है और उसे एक ऐसे परम प्रकाश की आवश्यकता है जो उसके अंधकार को मिटा सके। यहीं से महामुनि वेद व्यास द्वारा रचित और भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निःसृत गीता के दिव्य उपदेशों की पृष्ठभूमि तैयार होती है।
धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का सजीव हाल सुना रहे संजय इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि पांडव पक्ष का सबसे पराक्रमी योद्धा भी किस प्रकार मानसिक रूप से टूट चुका है, जिससे कुरुक्षेत्र की भूमि ज्ञान की पावन स्थली में परिवर्तित होने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुकी है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक और इसके प्रसंग का चिंतन करने से साधक को निम्नलिखित आन्तरिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
यह लेख भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के वरिष्ठ विद्वानों, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के मर्मज्ञों द्वारा संपादित रूप से तैयार सामग्री है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रथम अध्याय के नवें श्लोक की व्याख्या करते समय महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के मूल ग्रंथ, आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदासजी और संत ज्ञानेश्वर महाराज की टीकाओं का गहन अध्ययन किया गया है।
हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, पुराणों और उपनिषदों के शाश्वत ज्ञान को अत्यंत सरल, प्रामाणिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पहुँचाना है। प्रत्येक शब्द और भावार्थ को सनातन परंपरा के अनुकूल पूरी शुद्धता और श्रद्धा के साथ प्रस्तुत किया गया है ताकि आधुनिक युग की भागदौड़ भरी जिंदगी में भी हर साधक गीता के उपदेशों को अपने जीवन में उतारकर आत्मिक शांति प्राप्त कर सके।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अर्जुन ने कृष्ण से अपनी व्यथा कह दी और स्पष्ट कर दिया कि वे युद्ध नहीं करेंगे। फिर वे मौन हो गए। Sanjaya describes this scene to Dhritarashtra: Arjuna, after declaring his refusal to fight, falls silent, awaiting Krishna’s response.
संक्रमण / Transition
यह मौन शिष्य की प्रतीक्षा का प्रतीक है। अब गुरु (कृष्ण) बोलेंगे और ज्ञान का प्रकाश फैलाएँगे।