श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 10

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 54 मिनट का पठन 143 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत | सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ||१०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
तम्
उससे
उवाच
बोले
हृषीकेशः
हृषीकेश
प्रहसन्
हँसते हुए
इव
जैसे
भारत
हे भरतवंशी (धृतराष्ट्र)
सेनयोः
दोनों सेनाओं के
उभयोः
दोनों
मध्ये
मध्य में
विषीदन्तम्
शोक करते हुए
इदम्
यह
वचः
वचन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत! तब दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए अर्जुन से हृषीकेश (कृष्ण) ने हँसते हुए से ये वचन कहे।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति, भारतीय आध्यात्मिक चेतना और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान एक प्रकाशपुंज के समान है, जो मानवीय जीवन की हर उलझन को सुलझाने में सक्षम है। जब-जब मानव मन मोह, भ्रम, कर्तव्य-विमुखावस्था और आंतरिक विषाद के गहन अंधकार से घिरता है, तब-तब गीता का यह दिव्य संदेश प्रकाश की किरण बनकर उसे सही मार्ग दिखाता है। महाभारत के महासमर के मुहाने पर, कुरुक्षेत्र की उस पावन और भीषण भूमि पर, जहाँ धर्म और अधर्म की सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं, पाण्डुपुत्र अर्जुन अत्यधिक मानसिक उद्वेग और विषाद के दौर से गुजर रहे थे। अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और प्रियजनों को सम्मुख देखकर उनका गाण्डीव धनुष हाथ से छूट रहा था और उनका हृदय करुणा तथा कर्तव्य के द्वंद्वात्मक संघर्ष से विदीर्ण हो रहा था। ऐसे अत्यंत नाजुक, गंभीर और संवेदनशील क्षण में, जब अर्जुन पूरी तरह से हताश होकर अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पण कर देते हैं, तब योगेश्वर श्रीकृष्ण की प्रतिक्रिया कैसी होती है? इस महान ऐतिहासिक और दार्शनिक प्रसंग का अत्यंत जीवंत, मार्मिक और गूढ़ चित्रण श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के इस महत्वपूर्ण दसवें श्लोक में किया गया है।

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण का केवल एक सारथी के रूप में उपस्थित होना नहीं, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्मांड के संचालक, परम ब्रह्म, और जगद्गुरु के रूप में अर्जुन के मोह का परिहार करने की पृष्ठभूमि तैयार करना है। 'हृषीकेश' शब्द का प्रयोग इस प्रसंग में अत्यंत सामयिक और তাৎপর্যपूर्ण है, जिसका अर्थ है—इन्द्रियों के स्वामी। जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड की इन्द्रियों और समस्त जीवों के अंतरमन को भली-भांति नियंत्रित और जानते हैं, वे भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के भीतर चल रहे मानसिक द्वंद्व, भय, अज्ञान और मोह को गहराई से ताड़ रहे थे। अर्जुन का यह विषाद कोई साधारण दुःख नहीं था, बल्कि यह जीव मात्र के उस मूल अज्ञान का प्रतीक था, जो सांसारिक संबंधों में उलझकर अपने स्वधर्म को भूल बैठता है। इस गंभीर पृष्ठभूमि के बीच भगवान श्रीकृष्ण का मंद-मंद मुस्कुराना (प्रहसन्निव) इस बात का प्रतीक है कि वे अर्जुन के इस क्षुद्र मोह और तात्कालिक कायरता को भली-भांति समझ रहे थे और यह जानते थे कि यह विषाद ज्ञान के प्रकाश से ही समाप्त हो सकता है। यह मुस्कान करुणा, स्नेह, वात्सल्य और ज्ञान की गरिमा से परिपूर्ण है, जो एक गुरु अपने शिष्य के प्रति रखता है। Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर हम इसी श्लोक के माध्यम से आपके जीवन में आध्यात्मिक चेतना का संचार करने का विनम्र प्रयास कर रहे हैं ताकि आप भी अपने जीवन के कुरुक्षेत्र में विजयश्री प्राप्त कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यहाँ श्रीमद्भगवद्गीता के इस अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक का प्रामाणिक संस्कृत पाठ, उसका सटीक उच्चारण और पाठ करने की विधि प्रस्तुत की जा रही है:

ॐ श्री परमात्मने नमः

अथ प्रथमोध्यायः — अर्जुनविषादयोग

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।

सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥१०॥


(पदच्छेद: तम् उवाच हृषीकेशः प्रहसन् इव भारत, सेनयोः उभयोः मध्ये विषीदन्तम् इदं वचः)

पाठ की विधि एवं नियम:
  • 1. प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र आसन (कुश या ऊनी आसन) पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • 2. अपने सामने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य प्रतिमा, चित्र या श्रीमद्भगवद्गीता की पवित्र पुस्तक को स्थापित करें।
  • 3. शुद्ध घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें, तत्पश्चात् मानसिक रूप से भगवान श्रीगणेश, कुलदेवी-देवता और गुरुजनों का स्मरण करें।
  • 4. इस श्लोक का उच्चारण स्पष्ट, शुद्ध और सस्वर होना चाहिए, जिससे स्वर लहरियाँ आपके मन और चक्रों को जागृत कर सकें।
  • 5. पाठ के उपरांत भगवान को मिश्री या तुलसी पत्र का भोग लगाकर श्लोक के मर्म पर मनन करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई में उतरने से हमें इसके दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्यों का साक्षात्कार होता है। आइए, इसका विस्तृत विश्लेषण तालिका के माध्यम से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तम् (Tam) उसको (अर्जुन को) यह उस विशिष्ट व्यक्ति (अर्जुन) की ओर संकेत करता है जो इस समय अज्ञान और मोह के गहन अंधकार में डूबा हुआ है।
उवाच (Uvacha) कहा / बोले परमात्मा की वाणी केवल ध्वनियों का संकलन नहीं है, बल्कि यह वह दिव्य ज्ञान है जो संसार के समस्त भ्रमों को चीरकर रख देता है।
हृषीकेशः (Hrishikeshah) इन्द्रियों के स्वामी (श्रीकृष्ण) जो समस्त जीवों की इन्द्रियों और उनके मन-बुद्धि के आंतरिक संचालक हैं। वे जानते हैं कि अर्जुन की इन्द्रियाँ किस प्रकार विचलित हो रही हैं।
प्रहसन्निव (Prahasanniva) मानो मुस्कुराते हुए / हँसते हुए भगवान की यह मुस्कान उपहास नहीं, बल्कि उस करुणा का प्रतीक है जो जानती है कि दुःख का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है, यह केवल अज्ञान जनित है।
भारत (Bharata) हे धृतराष्ट्र! (संजय द्वारा संबोधन) कुरु वंश की महान परंपरा और उसके गौरव का स्मरण कराना, जिसे अधर्म से बचाना अर्जुन का कूटनीतिक और नैतिक दायित्व था।
सेनयोः (Senayoh) सेनाओं के कौरवों और पाण्डवों—दोनों पक्षों की विशाल सेनाएँ, जो धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य के प्रतीक के रूप में आमने-सामने थीं।
उभयोर्मध्ये (Ubhayormadhye) दोनों के बीच में रथ का ठीक दोनों सेनाओं के मध्य में खड़ा होना यह दर्शाता है कि तटस्थ रहकर न्याय और सत्य का निर्णय कहाँ से लिया जाना चाहिए।
विषीदन्तम् (Vishidantam) शोकग्रस्त / विषाद में डूबे हुए अर्जुन की वह मनोदशा जहाँ वे कर्तव्य पथ से भटककर मानसिक रूप से टूट चुके थे और गहन निराशा के गर्त में चले गए थे।
इदम् वचः (Idam Vachah) यह वचन (गीता का उपदेश) वह दिव्य ज्ञान रूपी अमृत वचन, जो संपूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी मार्गदर्शक बनने वाला था।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के भव्य और ऐतिहासिक ताने-बाने से जुड़ी हुई है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय आते हैं। कुरुक्षेत्र का युद्ध प्रारम्भ होने से ठीक पूर्व, जब दोनों पक्षों की सेनाएँ रणक्षेत्र में व्यूह रचना करके खड़ी थीं, तब कुरुराज धृतराष्ट्र के अनुरोध पर महर्षि व्यास द्वारा प्रदत्त दिव्य दृष्टि से युक्त होकर सूत संजय हस्तिनापुर के महल में बैठे-बैठे धृतराष्ट्र को युद्ध की संपूर्ण जीवंत कथा सुना रहे थे। इसी प्रसंग में, कौरव सेना के उत्साह और शंखनाद के उत्तर में पाण्डव सेना द्वारा भी जब शंख बजाए गए, तो वातावरण में एक भयंकर गूँज फैल गई।

इसी अति तनातनी भरे और रणबांकुरों के हुंकारों से गूँजते वातावरण में अर्जुन ने अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलने का अनुरोध किया। अर्जुन का उद्देश्य अपने शत्रुओं का अवलोकन करना था कि युद्ध में उन्हें किन-किन पराक्रमी योद्धाओं से मुकाबला करना है। लेकिन जैसे ही अर्जुन ने देखा कि सामने खड़े लोगों में उनके अपने दादा भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, मामा शल्य, भाई दुर्योधन और अन्य प्रियजन खड़े हैं, उनका अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित क्षत्रिय स्वभाव अचानक पिघल गया। उनके भीतर का पारिवारिक मोह, ममता और राग इस हद तक हावी हो गया कि वे अपने हाथ के गाण्डीव धनुष को थामने में असमर्थ हो गए। उनके अंग काँपने लगे, मुँह सूखने लगा और वे रथ के पिछले भाग में शोक संतप्त होकर बैठ गए।

यहीं पर व्यास जी के ग्रंथ में इस महान संवाद का द्वार खुलता है। संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि हे राजन! ऐसे भीषण रणक्षेत्र में, जहाँ चारों ओर मृत्यु का तांडव होने को था, और जहाँ अर्जुन जैसे महान योद्धा का अहंकार और मोह चरम सीमा पर था, वहाँ सबके अंतरयामी भगवान श्रीकृष्ण ने कोई क्रोध नहीं किया, कोई डाँट-डपट नहीं लगाई। इसके विपरीत, उन्होंने अपने ओष्ठों पर एक अत्यंत शांत, सौम्य और रहस्यमयी मुस्कान लाई। यह मुस्कान इस बात का प्रमाण थी कि भगवान जानते थे कि अर्जुन का यह मोह नितांत क्षणिक और अज्ञान जनित है। जिस प्रकार एक अनुभवी चिकित्सक रोगी की बीमारी को देखकर समझ जाता है कि इसका इलाज संभव है और वह हल्का सा मुस्कुराकर उसका उपचार शुरू करता है, ठीक उसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के अज्ञान रूपी रोग को दूर करने के लिए गीता के इस महान ज्ञान रूपी अमृत की वर्षा करने के लिए अपने वचनों का आरंभ किया। यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि जीवन के सबसे विकट और संकटपूर्ण समय में भी यदि हमारे पास गुरु का सानिध्य और ईश्वरीय दृष्टि हो, तो हर विषाद को योग में बदला जा सकता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

1. मानसिक शांति एवं एकाग्रता में वृद्धि

इस श्लोक और इसके मर्म का नियमित स्मरण करने से मन के भीतर चल रहे उद्वेग, तनाव और अवसाद शांत होते हैं। अर्जुन की तरह जब हम भी मानसिक उलझनों में घिरते हैं, तो यह श्लोक हमें स्थिर होना सिखाता है।

2. मोह और भ्रम से मुक्ति

संसार के असार संबंधों और अनावश्यक मोह-माया के जाल से निकलने की आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है। यह हमें यह विवेक प्रदान करता है कि क्या शाश्वत है और क्या नश्वर।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

संस्कृत के इन पवित्र श्लोकों के सस्वर उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक आध्यात्मिक आवरण (औरा) का निर्माण करती हैं।

4. कर्मठता और कर्तव्यपरायणता की प्रेरणा

विषाद को छोड़कर अपने स्वधर्म और कर्मपथ पर डटे रहने की अदम्य ऊर्जा मिलती है। यह हमें सिखाता है कि पलायन कभी समाधान नहीं होता, बल्कि पुरुषार्थ ही सफलता की कुंजी है।

5. आध्यात्मिक शुद्धि और कार्मिक क्लींजिंग

गीता के वचनों का स्वाध्याय चित्त की वृत्तियों को शुद्ध करता है और संचित कर्मों के नकारात्मक प्रभावों को क्षीण करके उच्च आध्यात्मिक लोकों की ओर मार्ग प्रशस्त करता है।

6. भगवत्कृपा और शरणगति का अनुभव

यह बोध कराता है कि जीवन के हर संकट में परमात्मा हमारे सारथी के रूप में हमारे साथ विद्यमान हैं। इससे भक्त के हृदय में अनन्य भक्ति और पूर्ण समर्पण (शरणागति) का भाव जागृत होता है।

7. निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making) में सुधार

जब मन शांत और बुद्धि स्पष्ट होती है, तो जीवन के जटिल निर्णयों को लेने में असमंजस समाप्त होता है और सही दिशा में कदम उठते हैं।

8. भय और अनिश्चितता का शमन

भविष्य की अनिश्चितताओं और हार-जीत के भय से मुक्ति मिलती है। साधक यह समझ जाता है कि कर्म करना उसके हाथ में है, फल परमात्मा के अधीन है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण एवं विभिन्न आचार्यों के भाष्यों यथा आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञाननानन्द जी महाराज के दृष्टिकोण) पर आधारित है। हमारी संपादकीय नीति पाठकों को तथ्यात्मक, दार्शनिक रूप से परिपक्व और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुद्ध सामग्री प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री इस बात को सुनिश्चित करती है कि आधुनिक जीवनशैली से जूझ रहे पाठकों को प्राचीन वेदान्त दर्शन का सहज, सरल और व्यावहारिक लाभ मिल सके। हमारा उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि वेदों, उपनिषदों और गीता के शाश्वत ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाकर उनके मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान में योगदान देना है। सभी संदर्भों को अत्यंत सावधानी और विद्वत् मंडली के मार्गदर्शन में सत्यापित किया गया है ताकि हमारे पाठकों को प्रामाणिक ज्ञान की प्राप्ति हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इस श्लोक में श्रीकृष्ण की मुस्कान इस बात का प्रतीक है कि वे अर्जुन के मोह, कायरता और तात्कालिक अज्ञान को भली-भांति समझ रहे थे। यह मुस्कान उपहास की नहीं, बल्कि अगाध करुणा, स्नेह और इस विश्वास की परिचायक है कि वे जल्द ही अर्जुन के इस अज्ञान को अपने दिव्य ज्ञान से दूर कर देंगे।

'हृषीकेश' का शाब्दिक अर्थ है—इन्द्रियों के स्वामी (हृषीक = इन्द्रियाँ, ईश = स्वामी)। इस प्रसंग में यह शब्द इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि श्रीकृष्ण समस्त जीवों की इन्द्रियों और मन को नियंत्रित करने वाले हैं। वे जानते थे कि अर्जुन की इन्द्रियाँ और मन मोहवश किस प्रकार विचलित हो रहे हैं और केवल वही इसे सही दिशा दे सकते हैं।

रथ का दोनों सेनाओं के मध्य में जाना इस बात का प्रतीक है कि जीवन के निर्णयों और धर्म-अधर्म के संघर्ष को निष्पक्षता और तटस्थता के साथ देखना चाहिए। यह वह स्थिति है जहाँ जीव (अर्जुन) अपने कर्मक्षेत्र में खड़े होकर अपने आंतरिक बंधनों और कर्तव्यों का मूल्यांकन करता है।

इस श्लोक और गीता के वचनों का नियमित पाठ करने से मानसिक तनाव, अवसाद और मोह से मुक्ति मिलती है। यह व्यक्ति में कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, सही निर्णय लेने की क्षमता और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठा को जागृत करता है।

यह श्लोक और संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता सार्वकालिक और सार्वभौमिक है। आज का प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी कुरुक्षेत्र और विषाद का सामना कर रहा है। आधुनिक जीवन की उलझनों, करियर के तनाव और पारिवारिक द्वंद्वों में यह श्लोक मार्गदर्शक का कार्य करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं: हे भारत! तब दोनों सेनाओं के बीच शोकाकुल अर्जुन को देखकर हृषीकेश (कृष्ण) मुस्कुराते हुए से बोले। Sanjaya narrates: Krishna, standing between the armies, smiles and begins to teach the grieving Arjuna.

मुस्कान का अर्थ / Meaning of the Smile

कृष्ण की मुस्कान अर्जुन के मोह की निरर्थकता पर है, और साथ ही यह आश्वासन है कि अब ज्ञान से उसका निवारण होगा। यह मुस्कान गुरु की कृपा का प्रतीक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/72 14% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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