श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 52

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 34 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति | तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ||५२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
यदा
जब
ते
तेरी
मोहकलिलम्
मोहरूपी कीचड़ को
बुद्धिः
बुद्धि
व्यतितरिष्यति
पार कर जाएगी
तदा
तब
गन्तासि
प्राप्त होगा
निर्वेदम्
वैराग्य
श्रोतव्यस्य
सुनने योग्य (भविष्य) का
श्रुतस्य
सुने हुए (भूत) का
च
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जब तेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़ को पार कर जाएगी, तब तू श्रोतव्य (सुनने योग्य) और श्रुत (सुने हुए) के प्रति वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात मोक्षदायिनी भगवती श्रुति के रूप में देखा जाता है। इसमें समाहित प्रत्येक श्लोक मानव जीवन की उलझनों को सुलझाने के लिए एक महाऔषधि की तरह कार्य करता है। विशेषकर द्वितीय अध्याय, जिसे 'सांख्य योग' की संज्ञा दी गई है, वह मनुष्य के अंतःकरण में व्याप्त अज्ञान, मोह, शोक और संशय के बादलों को चीरकर ज्ञान का सूर्योदय करने वाला है। प्रस्तुत श्लोक—"यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति | तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ||५२||"—साधना की उस पराकाष्ठा का वर्णन करता है, जहाँ पहुँचकर साधक समस्त सांसारिक बंधनों और कर्मकांडीय उलझनों से मुक्त होकर परमानंद की स्थिति को प्राप्त कर लेता है।

सांसारिक जीवन में मनुष्य निरंतर भ्रम, आसक्ति और मोह के जाल में फंसा रहता है। वह क्या सही है और क्या गलत, इसे लेकर हमेशा दुविधा में रहता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवजाति को यह संदेश दे रहे हैं कि जब हमारी बुद्धि वैराग्य और आत्मज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण होकर मोह रूपी कीचड़ (कलिल) को पार कर जाती है, तब चित्त में एक अलोकिक शांति का प्रादुर्भाव होता है। यह अवस्था बौद्धिक शुद्धि और चेतना के विस्तार की वह स्थिति है, जहाँ लौकिक और परलौकिक उपदेशों के प्रति किसी प्रकार का आकर्षण या क्षोभ शेष नहीं रहता। भक्तलोक.इन (Bhaktilok.in) के इस विशेष आलेख में हम इसी दिव्य श्लोक के अंतरंग रहस्यों, शाब्दिक विग्रह, दार्शनिक पृष्ठभूमि और हमारे दैनिक जीवन पर इसके प्रभावों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आपके आध्यात्मिक मार्ग को प्रशस्त करेगा।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता — द्वितीय अध्याय (सांख्य योग), श्लोक ५२

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥ ५२ ॥

पदावली (संस्कृत विच्छेद):

यदा, ते, मोह-कलिलम्, बुद्धिः, व्यतितरिष्यति, तदा, गन्ता, असि, निर्वेदम्, श्रोतव्यस्य, श्रुतस्य, च।

पाठ करने की विधि व नियम:
  • प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप या गीता ग्रंथ का विधिवत पूजन करें।
  • इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार (एक माला) या कम से कम 11 बार सस्वर पाठ करें।
  • पाठ के दौरान मन में एकाग्रता बनाए रखें और श्लोक के प्रत्येक शब्द के भाव पर विचार करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के मर्म को गहराई से समझने के लिए इसके प्रत्येक शब्द का प्रामाणिक अर्थ और दार्शनिक विश्लेषण निम्नलिखित सारणी में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यदा जब यह काल और अवस्था की निरंतरता को दर्शाता है, जब साधक की साधना परिपक्व होती है।
ते तेरी (आपकी) यह सीधे तौर पर अर्जुन को संबोधित है, तथा प्रत्येक जिज्ञासु साधक के लिए व्यक्तिगत आह्वान है।
मोहकलिलम् मोह रूपी कीचड़/मलिनता अज्ञान और ममत्व (मेरा-तेरा) का वह दलदल जिसमें फंसकर बुद्धि विवेक खो बैठती है।
बुद्धिः बुद्धि, अंतःकरण, विवेक शक्ति निर्णय लेने वाली वह आंतरिक क्षमता जो शुद्ध होने पर परमात्मा से जोड़ती है।
व्यतितरिष्यति पूरी तरह पार कर जाएगी संघर्ष और साधना के बल पर मोह के इस समुद्र या कीचड़ को लांघकर आगे निकल जाना।
तदा तब उस विशिष्ट ज्ञान प्राप्ति के क्षण का संकेत, जब चेतना का कायाकल्प होता है।
गन्ता असि तू प्राप्त हो जाएगा / हो जाएगा साधक की उस उन्नत अवस्था की प्राप्ति जिसका वर्णन वेद और उपनिषद करते हैं।
निर्वेदम् वैराग्य, अनासक्ति, क्षोभ-रहित अवस्था सांसारिक भोगों और व्यर्थ के वचनों के प्रति पूर्ण विरक्ति या उदासीनता का भाव।
श्रोतव्यस्य सुनने योग्य (भविष्य के उपदेशों से) वे तमाम भविष्य की बातें या कर्मकांडीय प्रलोभन जिन्हें सुनने की इच्छा अब शेष नहीं रहती।
श्रुतस्य सुने हुए (वेदादि शास्त्रों व वचनों से) अतीत में सुने गए समस्त शास्त्रीय नियमों, विधि-विधानों और कर्मकांडों से ऊपर उठना।
च और यह समुच्चय दोनों प्रकार के ज्ञान (अतीत और भविष्य के श्रवण) को एकीकृत करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के ठीक आरंभ में, कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब कौरव और पांडव सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब धर्मसंकट में पड़े अर्जुन ने अपने गाधिव धनुष को रख दिया था। उनके मन में अपने ही गुरुओं, सगे-संबोधियों और भाई-बांधवों के वध का भीषण मोह उत्पन्न हो गया था। अर्जुन का यह मोह केवल पारिवारिक प्रेम नहीं था, बल्कि यह उस अज्ञान का प्रतीक था जो मनुष्य को उसके कर्तव्य (स्वधर्म) से विचलित कर देता है। इस विकट परिस्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने सारथी की भूमिका निभाते हुए जो परम ज्ञान प्रदान किया, वही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाई।

द्वितीय अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने सांख्य योग के माध्यम से आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता का अद्भुत विवेचन किया। अर्जुन लगातार यह पूछ रहे थे कि क्या सही है, क्या सुनना चाहिए, कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है। वेदों के कर्मकांड, यज्ञ, अनुष्ठान और भविष्य की चिंताओं में उलझे अर्जुन को भगवान ने यह आश्वासन दिया कि जब तुम्हारी बुद्धि इन तमाम बाह्य प्रपंचों और मानसिक उलझनों को पार कर जाएगी, तब तुम्हें किसी बाहरी उपदेश या सुने हुए शास्त्रवचनों की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। तुम स्वयं आत्मस्थ हो जाओगे।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अंश (भीष्म पर्व) का यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जीवन में कितने भी बड़े संकट क्यों न आएं, यदि मनुष्य का अंतःकरण ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो जाए, तो वह हर प्रकार के भ्रम से मुक्त हो सकता है। यह श्लोक केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि कलयुग के उन तमाम व्यक्तियों के लिए एक महान मार्गदर्शिका है जो जीवनभर धार्मिक व दार्शनिक बहसों, भविष्य की चिंताओं और व्यर्थ की बातों में उलझे रहते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

1. मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता

इस श्लोक के मनन से मस्तिष्क के वे अनावश्यक विचार शांत होते हैं जो हमें भ्रमित करते हैं। निर्णय लेने की क्षमता तीव्र होती है।

2. मोह और आसक्ति से मुक्ति

मनुष्य का स्वभाव होता है वस्तुओं और व्यक्तियों से अत्यधिक चिपक जाना। यह श्लोक उस मोह रूपी कीचड़ को साफ कर अनासक्ति का भाव जगाता है।

3. अकारण चिंताओं व तनाव का शमन

'श्रोतव्यस्य' (सुनने योग्य भविष्य की बातें) की चिंता से मुक्ति मिलने पर वर्तमान में जीने की कला विकसित होती है, जिससे मानसिक तनाव छूमंतर हो जाता है।

4. आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक औरा

नियमित रूप से गीता के इन वचनों का पाठ करने से शरीर के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (औरा) का निर्माण होता है।

5. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

अज्ञानतावश किए गए मानसिक और वाचिक कर्मों के प्रभावों को यह दिव्य ज्ञान शुद्ध करता है, जिससे कर्म बंधन हल्के होते हैं।

6. सच्ची वैराग्य वृत्ति का उदय

वैराग्य का अर्थ भागना नहीं, बल्कि संसार में रहकर भी उसके मोह से ऊपर उठना है। यह श्लोक साधक को यही गूढ़ दृष्टि प्रदान करता है।

7. ईश्वरीय कृपा और शरणागति

जब बुद्धि निर्मल होती है, तब भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुकी कृपा का अनुभव सहज ही होने लगता है और हृदय में अनन्य भक्ति जगती है।

8. जीवन के प्रति संतोष और आनंद

अतीत के श्रवण और भविष्य के श्रोतव्य से परे जाकर वर्तमान में परमानंद की अनुभूति प्राप्त होती है, जीवन तृप्त हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह आलेख 'भक्तलोक.इन' (Bhaktilok.in) के संपादकीय मंडल और सनातन धर्म के वरिष्ठ विद्वानों द्वारासंपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की व्याख्या करते समय आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुजाचार्य और संत ज्ञानेश्वर महाराज के टीका ग्रंथों (जैसे ज्ञानेश्वरी गीता) के मूल भावों को आधार बनाया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, उपनिषदों और पुराणों का शुद्ध, अकाट्य और जीवनोपयोगी संदेश पहुंचाना है, ताकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच सनातन संस्कृति के शाश्वत मूल्य सुरक्षित रहें और प्रत्येक साधक आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'मोहकलिलम्' का शाब्दिक अर्थ है—मोह या अज्ञान रूपी कीचड़ या दलदल। जिस प्रकार कीचड़ में पैर फंसने पर मनुष्य आगे नहीं बढ़ पाता, उसी प्रकार सांसारिक मोह, ममत्व और अज्ञानता में फंसकर मनुष्य की बुद्धि और विवेक गतिहीन हो जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण इसी दलदल को पार करने की बात कह रहे हैं।

इसका अर्थ शास्त्रों का त्याग करना बिल्कुल नहीं है। इसका गूढ़ार्थ यह है कि जब व्यक्ति को आत्मज्ञान (ब्रह्मज्ञान) प्राप्त हो जाता है, तब वह बाहरी कर्मकांडीय वचनों (जो उसने सुने हैं) और भविष्य में मिलने वाले उपदेशों (जो सुनने योग्य हैं) की बाध्यता से ऊपर उठ जाता है। उसे वेदों के परोक्ष ज्ञान के स्थान पर प्रत्यक्ष आत्म-अनुभूति हो जाती है।

दैनिक जीवन में हम अक्सर दूसरों की बातों, भविष्य की अनिश्चितताओं और अफवाहों में उलझकर तनावग्रस्त हो जाते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि अपने आंतरिक विवेक को जागृत करो, ताकि बाहर की अनगिनत आवाज़ें और भ्रामक उपदेश आपको विचलित न कर सकें। यह आंतरिक शांति और निर्णय क्षमता को मजबूत करता है।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) से लिया गया है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सांख्य दर्शन, कर्मयोग और स्थिर प्रज्ञा (स्थितप्रज्ञ) के लक्षणों का विस्तार से उपदेश दिया है, जो गीता का सार माना जाता है।

हाँ, इस श्लोक के नियमित पाठ और इसके अर्थ पर मनन करने से चित्त में सात्विक वैराग्य का उदय होता है। वैराग्य का अर्थ संसार से पलायन करना नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए उसके प्रति आसक्ति और मोह से मुक्त होकर निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जब तेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़ को पार कर जाएगी, तब तू सुने हुए (शास्त्र) और सुनने योग्य (भविष्य के उपदेश) के प्रति वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा। When your intellect crosses the turbid waters of delusion, you will attain indifference to what has been heard and what is yet to be heard.

वैराग्य / Dispassion

आत्मज्ञान के बाद शास्त्रों का भी मोह नहीं रहता, क्योंकि सत्य का साक्षात्कार हो चुका होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 52 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 52/72 72% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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