श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 53

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 36 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||५३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
श्रुतिविप्रतिपन्ना
श्रुति (वेद) के विभिन्न प्रवचनों से भ्रमित
ते
तेरी
यदा
जब
स्थास्यति
स्थित होगी
निश्चला
निश्चल
समाधौ
समाधि में
अचला
अचल
बुद्धिः
बुद्धि
तदा
तब
योगम्
योग (समाधि)
अवाप्स्यसि
प्राप्त करेगा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जब वेदों के विभिन्न प्रवचनों से भ्रमित तेरी बुद्धि समाधि में अचल होकर स्थित हो जाएगी, तब तू योग को प्राप्त कर लेगा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का यह परम रहस्यमय श्लोक मानव चेतना को संशयवाद से निकालकर पूर्ण समाधि और आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है।

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'श्रीमद्भगवद्गीता' को समस्त उपनिषदों का सार माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवजाति को प्रदान किया गया यह दिव्य ज्ञान केवल युद्ध के मैदान का उपदेश नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक पग पर उत्पन्न होने वाली मानसिक उलझनों, भ्रमों और अस्तित्वगत संकटों का एकमात्र अचूक समाधान है। जब मानव मन भौतिक संसार के आकर्षणों, कर्मकांडों के जटिल जालों और विभिन्न शास्त्रों के विरोधाभासी मत-मतांतरों से घिर जाता है, तब उसकी बुद्धि संशयग्रस्त हो जाती है। इसी संशयग्रस्त स्थिति से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है यह अद्भुत श्लोक—"श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि"।

ब्रह्मांडीय चेतना के दृष्टिकोण से, यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य की बुद्धि जब तक बाह्य ध्वनियों, वेदों और शास्त्रों की केवल शाब्दिक बहसों या विधि-विधानों में उलझी रहती है, तब तक उसे परमसत्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। 'श्रुतिविप्रतिपन्ना' का अर्थ ही है—अनेक प्रकार के वचनों, श्रुतियों और मतों से विचलित या भ्रमित हो जाना। आज के आधुनिक युग में भी, जहां सूचनाओं की भरमार है और चारों ओर विरोधाभासी विचारधाराएं मनुष्य के मन को झकझोर रही हैं, यह श्लोक एक आंतरिक सुदृढ़ता का दीप प्रज्वलित करता है।

जब साधक की बुद्धि इन सभी द्वंद्वों को पार करके अंतःकरण की गहराइयों में, यानी 'समाधि' में स्थिर हो जाती है, तब उसे उस अचल और अखंड परमब्रह्म का बोध होता है। यह स्थिति साधारण मानसिक शांति से कहीं अधिक उच्च है; यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति जीवन और मरण के चक्र से परे होकर शाश्वत आनंद (योग) को प्राप्त कर लेता है। Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर हम इसी गूढ़ श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों का विस्तार से विश्लेषण कर रहे हैं, ताकि हर साधक अपने जीवन में इस दिव्य संदेश को उतारकर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ द्वितीयोऽध्यायः (सांख्ययोग) - श्लोक ५३

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥


(पदच्छेद: श्रुति-विप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला समाधौ अचला बुद्धिः तदा योगम् अवाप्स्यसि)

पाठ करने की विधि व नियम:
  • प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  • भगवान श्रीकृष्ण या अपने इष्टदेव के सम्मुख दीप प्रज्वलित करें।
  • इस श्लोक का प्रतिदिन कम से कम 11, 21 या 108 बार मानसिक अथवा उपांश जप करें।
  • पाठ के समय मन को पूर्णतः शांत रखें और इसके अर्थ पर मनन करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का सार निहित है। आइए, तालिका के माध्यम से इसके एक-एक पद को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
श्रुतिविप्रतिपन्ना वेदों या शास्त्रों के अनेक प्रकार के वचनों से भ्रमित जब मनुष्य नाना प्रकार के कर्मकांडों, यज्ञों और परस्पर विरोधी धार्मिक मतों को सुनकर असमंजस में पड़ जाता है।
ते तेरी (बुद्धि) यहाँ भगवान श्रीकृष्ण सीधे अर्जुन (तथा समस्त साधकों) को संबोधित कर रहे हैं।
यदा जिस काल में, जब उस निश्चित समयांतराल या अवस्था का संकेत जब साधक का आंतरिक विकास पूर्णता की ओर होता है।
स्थास्यति स्थित हो जाएगी चंचलता का त्याग करके एक ही बिंदु (परमात्मा) पर टिक जाना या ठहर जाना।
निश्चला अचल, अडिग, स्थिर ऐसी स्थिति जिसमें दुनिया की आंधी-तूफान या सुख-दुःख भी हलचल पैदा न कर सकें।
समाधौ परमात्मा में, समाधि की अवस्था में जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान—तीनों का भेद मिट जाता है और केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है।
अचला जो कभी विचलित न हो विषयों के प्रति आकर्षण या विकर्षण से पूरी तरह मुक्त हो चुकी चेतना।
बुद्धिः निर्णय करने वाली शक्ति, अंतःकरण वह आंतरिक क्षमता जो सत्य और असत्य का विवेक करती है।
तदा तब उस विशिष्ट क्षण का वर्णन जब साधना का परिणाम प्रत्यक्ष होता है।
योगम् अवाप्स्यसि योग (परमात्मा से मिलन) को प्राप्त करेगा जीव का शिव के साथ एकरूप हो जाना, मोक्ष या आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह प्रसंग महाभारत के भीषण युद्ध के आरंभिक क्षणों का है, जब कौरव और पांडव सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं। पांचजन्य शंख की गूंज और युद्ध के हुंकारों के बीच, हस्तिनापुर के राजकुमार अर्जुन अपने सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष आत्मिक रूप से टूट जाते हैं। अपनों को सामने देखकर उनका धनुष 'गांडीव' उनके हाथों से छूटने लगता है और उनके मन में कर्तव्य-अकर्तव्य को लेकर गंभीर भ्रम उत्पन्न हो जाता है।

वैदिक इतिहास और महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के अनुसार, अर्जुन उस समय केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के प्रतिनिधि थे। मनुष्य जब अपने जीवन के किसी कुरुक्षेत्र में खड़ा होता है, तो उसके सामने भी धर्म, अधर्म, कर्तव्य, लोभ, मोह और स्वार्थ के अनेक प्रश्न खड़े होते हैं। वेदों और शास्त्रों में स्वर्ग प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के यज्ञों, अनुष्ठानों और सकाम कर्मों का विधान है। एक साधारण मनुष्य इन्हें सुनकर और पढ़कर भ्रमित हो जाता है कि आखिर उसके लिए सर्वोच्च श्रेय क्या है? क्या सांसारिक भोग-विलासविलास या स्वर्ग के लालच में किए जाने वाले कर्म ही जीवन का अंतिम सत्य हैं?

इसी संशय का निवारण करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को 'सांख्य योग' और 'बुद्धियोग' का उपदेश दिया। भगवान ने समझाया कि जब तक मनुष्य वेदों के शाब्दिक और कर्मकांडी जाल (श्रुतिविप्रतिपन्ना) में उलझा रहता है, तब तक उसका मन चंचल रहता है। वेदों का उद्देश्य मनुष्य को कर्मकांडों में बांधना नहीं, बल्कि उसे निष्काम भाव सिखाते हुए समाधि तक पहुँचाना है।

महर्षि वेदव्यास ने इस श्लोक के माध्यम से यह संदेश दिया है कि आध्यात्मिक यात्रा पुस्तकों के अध्ययन या बाहरी अनुष्ठानों से शुरू अवश्य होती है, लेकिन उसकी पूर्णता आंतरिक स्थिरता यानी समाधि में होती है। जब साधक का मन गुरु के वचनों और शास्त्रों के सार को अपने भीतर पचाकर पूरी तरह स्थिर हो जाता है, तब उसे किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती। यही शास्त्रीय पृष्ठभूमि इस श्लोक को हर युग के साधक के लिए मार्गदर्शक बनाती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

आंतरिक शांति और मानसिक स्थिरता

नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ और मनन करने से मस्तिष्क की तरंगे शांत होती हैं। आधुनिक जीवन की तनावपूर्ण भागदौड़ के बीच यह श्लोक मन को अति-विचारों (Overthinking) और अवसाद से मुक्ति दिलाकर गहरी स्थिरता प्रदान करता है।

भ्रम और संशय का निवारण

जीवन में जब कभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने में दुविधा उत्पन्न हो, तब इस श्लोक का स्मरण करने से विवेक जागृत होता है। यह सही और गलत, सत्य और असत्य के बीच का भेद स्पष्ट करने में सहायता करता है।

सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

भगवद्गीता के इन दिव्य श्लोकों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) आसपास के वातावरण को शुद्ध करते हैं। इससे साधक के चारों ओर एक सकारात्मक और सुरक्षात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है।

कर्मों की शुद्धि और निष्काम भाव

यह श्लोक फल की आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करने की प्रेरणा देता है। जब बुद्धि समाधिस्थ होती है, तब व्यक्ति के द्वारा किए गए सभी कर्म स्वतः ही यज्ञ रूप बन जाते हैं और संचित कर्मों का क्षय होने लगता है।

ध्यान (Meditation) में एकाग्रता

जो साधक ध्यान या प्राणायाम साधना करते हैं, उनके लिए यह श्लोक एक शक्तिशाली बीज मंत्र की तरह कार्य करता है। यह मन को भटकाव से बचाकर 'समाधि' की अवस्था तक पहुँचने का मार्ग सुगम बनाता है।

दिव्य कृपा और आत्मकल्याण

भगवान श्रीकृष्ण के वचनों के प्रति निष्ठा रखने से साधक को भगवद्कृपा का अनुभव होता है। यह भवसागर से पार उतरने और परम पद को प्राप्त करने का सबसे सरल और प्रामाणिक आध्यात्मिक साधन है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत Bhaktilok.in के विद्वान आचार्यों और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का अर्थ पारंपरिक अद्वैत वेदांत और महर्षि वेदव्यास के मूल भाव के पूर्णानुकूल हो। हमने वेदों, उपनिषदों (विशेषकर कठोपनिषद और मुण्डकोपनिषद) तथा श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण) का गहन अध्ययन करके इस सामग्री को संकलित किया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों का शुद्ध, गरिमामयी और व्यावहारिक ज्ञान पहुँचाना है, जो उनके आध्यात्मिक और मानसिक उत्थान में सहायक सिद्ध हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'श्रुति' का अर्थ वेद या शास्त्र है, और 'विप्रतिपन्ना' का अर्थ भ्रमित या अनेक मतों में बंटा हुआ है। इसका तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य विभिन्न शास्त्रों, कर्मकांडों और विरोधाभासी धार्मिक वचनों को सुनता है, तो उसका मन असमंजस में पड़ जाता है कि उसके लिए परम सत्य क्या है। यह श्लोक इसी बौद्धिक भ्रम की स्थिति से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है।

इस श्लोक में 'समाधि' का अर्थ केवल गुफाओं में बैठकर आंखें बंद करना नहीं है। यहाँ समाधि का अर्थ है—परमात्मा में बुद्धि का पूर्णतया स्थिर हो जाना। जब मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी अपने मन को ईश्वर में अचल रूप से टिका लेता है, तो वह दैनिक जीवन में भी समाधि की अवस्था का अनुभव कर सकता है। यह हर साधक के लिए संभव है।

मानसिक तनाव का मुख्य कारण भविष्य की अनिश्चितता और मन का अत्यधिक भटकना (चंचलता) है। यह श्लोक सिखाता है कि जब बुद्धि 'निश्चल' हो जाती है, तब दुनिया के उतार-चढ़ाव मन को प्रभावित नहीं करते। इसका नियमित जप और अर्थ पर विचार करने से मस्तिष्क में स्थिरता और शांति का अनुभव होता है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक पर संपूर्ण मानवजाति का अधिकार है। इसके पाठ के लिए कोई कठिन नियम नहीं हैं। केवल स्वच्छता, पवित्र भाव, श्रद्धा और इसके अर्थ को जीवन में उतारने का संकल्प आवश्यक है। आप इसे किसी भी समय और किसी भी आयु में पढ़ सकते हैं।

यहाँ 'योग' का अर्थ किसी शारीरिक व्यायाम से नहीं, बल्कि जीव का परमात्मा के साथ पूर्ण मिलन (आत्मसाक्षात्कार या मोक्ष) है। जब साधक की बुद्धि शास्त्रों के भ्रम जाल को लांघकर भगवत्स्वरूप में अचल हो जाती है, तब उसे इस परम योग की प्राप्ति होती है, जो सभी दुखों का अंत कर देता है।

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सनातन संस्कृति, वेद, पुराण और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रचार-प्रसार को समर्पित एक आध्यात्मिक मंच।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जब वेदों के विभिन्न प्रवचनों से भ्रमित तेरी बुद्धि समाधि में अचल होकर स्थित हो जाएगी, तब तू योग को प्राप्त कर लेगा। When your mind, confused by various scriptures, becomes steady and fixed in samadhi, then you will attain yoga.

समाधि / Samadhi

योग का चरम लक्ष्य समाधि है, जहाँ बुद्धि पूर्णतः स्थिर हो जाती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 53 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 53/72 74% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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