मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् | आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||५५||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदश्रीभगवान्
भगवान
उवाच
बोले
प्रजहाति
त्याग देता है
यदा
जब
कामान्
कामनाओं को
सर्वान्
सब
पार्थ
हे पार्थ
मनोगतान्
मन में स्थित
आत्मनि
आत्मा में
एव
ही
आत्मना
आत्मा द्वारा
तुष्टः
सन्तुष्ट
स्थितप्रज्ञः
स्थितप्रज्ञ
तदा
तब
उच्यते
कहा जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ! जब पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को पूर्णतः त्याग देता है और आत्मा द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
स्थितप्रज्ञ की पहली पहचान – उसने सभी मानसिक कामनाओं का त्याग कर दिया है, और वह आत्मा में ही आत्मा से सन्तुष्ट है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ! जब पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को पूर्णतः त्याग देता है और आत्मा द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। When one completely casts off all desires of the mind and is satisfied in the Self by the Self, then he is said to be a man of steady wisdom.
आत्मसंतुष्टि / Self-satisfaction
स्थितप्रज्ञ बाह्य वस्तुओं से नहीं, अपितु अपने आत्मा से सन्तुष्ट रहता है।