मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति | स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ||७२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदएषा
यह
ब्राह्मी
ब्रह्म-सम्बन्धिनी
स्थितिः
स्थिति
पार्थ
हे पार्थ
न
नहीं
एनाम्
इसको
प्राप्य
प्राप्त करके
विमुह्यति
मोहित होता
स्थित्वा
स्थित होकर
अस्याम्
इसमें
अन्तकाले
अन्तकाल में
अपि
भी
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष)
ऋच्छति
प्राप्त होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति (ब्रह्म में स्थिति) है। इसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता। इस स्थिति में स्थित होकर अन्तकाल में भी वह ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
गीता अध्याय २ का समापन – यह स्थितप्रज्ञ की ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर व्यक्ति मोह से मुक्त हो जाता है और अन्त में मोक्ष पाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता। इस स्थिति में स्थित होकर अन्तकाल में भी वह ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है। This is the state of being established in Brahman. One does not become deluded after attaining this. Being established in this state even at the end of life, one attains oneness with Brahman.
अध्याय का सार / Essence of the Chapter
अध्याय २ का उपदेश यही है कि स्थितप्रज्ञ बनो – समत्व योग, निष्काम कर्म, और आत्मज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्त करो।