श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 71

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 2 मिनट का पठन 102 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः | निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ||७१||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
विहाय
त्यागकर
कामान्
कामनाओं को
यः
जो
सर्वान्
सब
पुमान्
पुरुष
चरति
आचरण करता है
निःस्पृहः
निःस्पृह (इच्छारहित)
निर्ममः
ममतारहित
निरहङ्कारः
अहंकाररहित
सः
वह
शान्तिम्
शान्ति
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर निःस्पृह (इच्छारहित), निर्मम (ममतारहित) और निरहङ्कार (अहंकाररहित) होकर आचरण करता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

शान्ति का मार्ग – सभी कामनाओं का त्याग, ममता और अहंकार से मुक्त होकर जीना।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर निःस्पृह, निर्मम और निरहङ्कार होकर आचरण करता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है। That person who abandons all desires and acts free from craving, without mineness or egoism, attains peace.

शान्ति की शर्त / Condition for Peace

शान्ति के लिए कामना, ममता और अहंकार का त्याग आवश्यक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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