मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् | तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ||७०||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदआपूर्यमाणम्
भरते हुए भी
अचलप्रतिष्ठम्
अचल प्रतिष्ठा वाले
समुद्रम्
समुद्र में
आपः
जल
प्रविशन्ति
प्रवेश करते हैं
यद्वत्
जैसे
तद्वत्
वैसे ही
कामाः
कामनाएँ
यम्
जिसमें
प्रविशन्ति
प्रवेश करती हैं
सर्वे
सब
सः
वह
शान्तिम्
शान्ति
आप्नोति
प्राप्त होता है
न
नहीं
कामकामी
कामनाओं को चाहने वाला।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जैसे नदियाँ भरते हुए भी अचल समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही जिस (स्थितप्रज्ञ) में सब कामनाएँ प्रवेश करती हैं, वह शान्ति को प्राप्त होता है, न कि कामनाओं का चाहने वाला (कामी)।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
समुद्र का दृष्टान्त – नदियाँ आकर समुद्र में मिलती हैं, पर समुद्र अचल रहता है। वैसे ही स्थितप्रज्ञ में कामनाएँ आती हैं, पर वह अविचलित रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जैसे नदियाँ भरते हुए भी अचल समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही जिसमें सब कामनाएँ प्रवेश करती हैं, वह शान्ति पाता है, न कि कामनाओं को चाहने वाला। He attains peace into whom all desires flow like rivers into the ocean, which remains unmoved – not he who desires objects.
अचलता / Steadiness
स्थितप्रज्ञ कामनाओं के आने पर भी अविचलित रहता है।