मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच | ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन | तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ||१||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदअर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
ज्यायसी
श्रेष्ठ
चेत्
यदि
कर्मण
कर्म से
ते
आपकी
मता
मानी गयी
बुद्धि
बुद्धि
जनार्दन
हे जनार्दन
तत्
तो
किम्
क्यों
कर्मणि
कर्म में
घोरे
भयंकर
माम्
मुझे
नियोजयसि
लगा रहे हो
केशव
हे केशव।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अर्जुन बोले: हे जनार्दन! हे केशव! यदि आप कर्म (फल-प्रधान कर्म) से बुद्धि को श्रेष्ठ मानते हैं, तो मुझे इस भयंकर युद्ध में क्यों लगा रहे हैं?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन पिछले अध्याय के उपदेशों में विरोधाभास देखते हैं – एक ओर ज्ञान की श्रेष्ठता, दूसरी ओर युद्ध जैसे हिंसक कर्म की प्रेरणा। यह प्रश्न कर्म योग के मर्म को समझने का आधार बनता है। Arjuna sees a contradiction between the praise of knowledge and the urging to fight; this question sets the stage for the doctrine of Karma Yoga.
श्लोक का अर्थ / Meaning
अर्जुन कहते हैं कि आपने बुद्धि योग को कर्म से श्रेष्ठ बताया, फिर मुझे युद्ध-रूपी कर्म में क्यों लगा रहे हैं? Arjuna points out the apparent inconsistency in Krishna’s teachings.