श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 2

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 133 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे | तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ||२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
व्यामिश्रेण
मिले-जुले
इव
मानो
वाक्येन
वचनों से
बुद्धिम्
बुद्धि को
मोहयसि
मोहित कर रहे हो
इव
सचमुच
मे
मेरी
तत्
इसलिए
एकम्
एक
वद
कहिए
निश्चित्य
निश्चय करके
येन
जिससे
श्रेय
कल्याण
अहम्
मैं
आप्नुयाम्
प्राप्त करूँ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आपके मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धि मोहित हो रही है। अतः कृपया निश्चित करके एक बात बताइए जिससे मैं कल्याण प्राप्त करूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन का भ्रम और गहरा हो गया है। वह एक निश्चित मार्ग चाहते हैं – या तो ज्ञान या कर्म। यह संसार के साधक की स्थिति है जो दो विरोधी प्रतीत होने वाले मार्गों में उलझ जाता है। Arjuna’s confusion deepens; he wants a single definite path – either knowledge or action. This reflects the state of every seeker caught between two seemingly opposite paths.

श्लोक का अर्थ / Meaning

अर्जुन कहते हैं कि आपके वचन मिले-जुले हैं, कृपया निश्चय करके एक मार्ग बताएँ। Arjuna says Your words are mixed; please tell me one definite path.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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