मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ | ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ||३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदश्रीभगवान्
भगवान श्रीकृष्ण
उवाच
बोले
लोके
संसार में
अस्मिन्
इस
द्विविधा
दो प्रकार की
निष्ठा
स्थिति
पुरा
पहले
प्रोक्ता
कही गयी
मया
मेरे द्वारा
अनघ
हे निष्पाप
ज्ञानयोगेन
ज्ञान योग से
सांख्यानाम्
सांख्ययोगियों के लिए
कर्मयोगेन
कर्म योग से
योगिनाम्
योगियों के लिए।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा (साधना मार्ग) मेरे द्वारा पहले कही गयी है – सांख्ययोगियों के लिए ज्ञानयोग और योगियों (कर्मयोगियों) के लिए कर्मयोग।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान स्पष्ट करते हैं कि दो मार्ग हैं – एक ज्ञान निष्ठा (सांख्य) और एक कर्म निष्ठा (योग)। यह विभाजन साधक की प्रकृति के अनुसार है। कोई विरोध नहीं, बल्कि दोनों एक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं। The Lord clarifies that there are two paths – one of knowledge (Sankhya) and one of action (Yoga). The division is according to the nature of the seeker; both lead to the same goal.
श्लोक का अर्थ / Meaning
भगवान कहते हैं कि दो प्रकार की निष्ठा है – एक ज्ञानियों के लिए, एक कर्मयोगियों के लिए। The Lord says there are two kinds of spiritual paths – one for the contemplative, one for the active.