श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 4

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 2 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते | न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ||४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
न
नहीं
कर्मणाम्
कर्मों का
अनारम्भात्
आरम्भ न करने से
नैष्कर्म्यम्
कर्मों से मुक्ति
पुरुष
मनुष्य
अश्नुते
प्राप्त करता है
न
नहीं
च
और
सन्न्यसनात्
संन्यास से
एव
ही
सिद्धिम्
सिद्धि
समधिगच्छति
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कर्मों का आरम्भ न करने मात्र से मनुष्य नैष्कर्म्य (कर्मों से मुक्ति) को नहीं प्राप्त होता, और न केवल संन्यास (त्याग) से ही सिद्धि मिलती है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान पहला सूत्र देते हैं: केवल कर्म न करने से कर्म-संन्यास की सिद्धि नहीं मिलती। असली नैष्कर्म्य तो कर्म करते हुए भी फल के आसक्ति से मुक्त रहना है। The Lord gives the first key: mere inaction does not lead to freedom from action; true freedom is acting without attachment.

श्लोक का अर्थ / Meaning

कर्मों का त्याग मात्र सिद्धि नहीं दिलाता, न ही बिना कर्म किए नैष्कर्म्य मिलता है। Neither renunciation nor inaction leads to perfection or freedom from action.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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