मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते | न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ||४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदन
नहीं
कर्मणाम्
कर्मों का
अनारम्भात्
आरम्भ न करने से
नैष्कर्म्यम्
कर्मों से मुक्ति
पुरुष
मनुष्य
अश्नुते
प्राप्त करता है
न
नहीं
च
और
सन्न्यसनात्
संन्यास से
एव
ही
सिद्धिम्
सिद्धि
समधिगच्छति
प्राप्त होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कर्मों का आरम्भ न करने मात्र से मनुष्य नैष्कर्म्य (कर्मों से मुक्ति) को नहीं प्राप्त होता, और न केवल संन्यास (त्याग) से ही सिद्धि मिलती है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान पहला सूत्र देते हैं: केवल कर्म न करने से कर्म-संन्यास की सिद्धि नहीं मिलती। असली नैष्कर्म्य तो कर्म करते हुए भी फल के आसक्ति से मुक्त रहना है। The Lord gives the first key: mere inaction does not lead to freedom from action; true freedom is acting without attachment.
श्लोक का अर्थ / Meaning
कर्मों का त्याग मात्र सिद्धि नहीं दिलाता, न ही बिना कर्म किए नैष्कर्म्य मिलता है। Neither renunciation nor inaction leads to perfection or freedom from action.