मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् | विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ||१||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदश्रीभगवान्
भगवान
उवाच
बोले
इमम्
इस
विवस्वते
विवस्वान (सूर्य) को
योगम्
योग को
प्रोक्तवान्
कहा था
अहम्
मैंने
अव्ययम्
अविनाशी
विवस्वान्
विवस्वान् ने
मनवे
मनु को
प्राह
कहा
मनुः
मनु ने
इक्ष्वाकवे
इक्ष्वाकु को
अब्रवीत्
कहा।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य (विवस्वान्) से कहा था। सूर्य ने इसे मनु को कहा और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को बताया।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह योग कोई नई रचना नहीं है, बल्कि एक प्राचीन परम्परा है। सृष्टि के आरम्भ में यह ज्ञान सूर्य को दिया गया, जो मनु के माध्यम से इक्ष्वाकु वंश तक पहुँचा। यह ज्ञान की गुरु-शिष्य परम्परा (मौखिक परम्परा) का महत्व दर्शाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य देव (विवस्वान्) को बताया था। सूर्य ने इसे मनु को बताया, और मनु ने इसे राजा इक्ष्वाकु को बताया। The Lord said: I taught this imperishable yoga to Vivasvan (the Sun god); he taught it to Manu; Manu taught it to Ikshvaku.
परम्परा का महत्व / Importance of Tradition
यह श्लोक गीता के ज्ञान की प्राचीनता और गुरु-शिष्य परम्परा के महत्व को रेखांकित करता है। यह ज्ञान सदियों से संतों और राजाओं द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होता आया है। This verse establishes the antiquity of the Gita's wisdom and the importance of the teacher-disciple tradition in preserving it.