मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः | स केनेनापि योगेन भ्रष्टः परन्तप ||२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदएवम्
इस प्रकार
परम्पराप्राप्तम्
परम्परा से प्राप्त
इमम्
इस
राजर्षयः
राजर्षियों ने
विदुः
जाना
सः
वह
कालेन
काल के प्रभाव से
अपि
भी
योगेन
योग से
भ्रष्टः
नष्ट
परन्तप
हे परन्तप।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस (योग) को राजर्षियों ने जाना। परन्तु हे परन्तप! काल के प्रभाव से वह योग लुप्त हो गया।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह योग ज्ञान राजर्षियों (जो राजा भी थे और ऋषि भी) द्वारा परम्परा से प्राप्त किया जाता रहा। किन्तु लम्बे समय के बाद यह परम्परा टूट गई और ज्ञान लुप्तप्राय हो गया। कृष्ण यहाँ योग के पुनरुद्धार की आवश्यकता बता रहे हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना। परन्तु हे परन्तप! काल के लम्बे प्रभाव से वह योग लुप्त हो गया। Thus handed down in succession, the royal sages knew it. But with the long lapse of time, it has been lost, O Arjuna.
ज्ञान का ह्रास / Decline of Knowledge
यह श्लोक बताता है कि आध्यात्मिक ज्ञान भी समय के प्रभाव से विकृत या लुप्त हो सकता है। इसलिए समय-समय पर उसके पुनरुद्धार की आवश्यकता होती है। This verse highlights the need for periodic revival of spiritual knowledge.