मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदतस्मात्
इसलिए
अज्ञानसम्भूतम्
अज्ञान से उत्पन्न
हृत्स्थम्
हृदय में स्थित
ज्ञानासिना
ज्ञानरूपी तलवार से
आत्मनः
अपने
छित्त्वा
काटकर
एनम्
इस
संशयम्
संशय को
योगम्
योग में
आतिष्ठ
स्थित हो
उत्तिष्ठ
खड़ा हो
भारत
हे भारत।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इसलिए हे भारत! तू अज्ञान से उत्पन्न, हृदय में स्थित इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट डाल। योग (समत्वबुद्धि) में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अध्याय ४ का समापन इस आह्वान के साथ होता है। कृष्ण अर्जुन को आदेश देते हैं कि वे अज्ञान से उत्पन्न संशय को, जो उनके हृदय में है, ज्ञानरूपी तलवार से काट डालें। फिर योग (समत्व की बुद्धि) में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़े हों। यह अध्याय ज्ञान और कर्म के समन्वय का उपदेश देकर अर्जुन को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इसलिए हे भारत! तू अज्ञान से उत्पन्न, हृदय में स्थित इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट डाल। योग (समत्वबुद्धि) में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा। Therefore, O Bharata, cut this doubt, born of ignorance, residing in your heart, with the sword of knowledge. Resort to Yoga and arise!
व्याख्या / Explanation
यह अध्याय ४ का समापन श्लोक है। कृष्ण अर्जुन को तीन आदेश देते हैं: (1) अपने हृदय में स्थित संशय को काट डालो—यह संशय अज्ञान से उत्पन्न है। (2) इसके लिए ज्ञानरूपी तलवार का प्रयोग करो—ज्ञान ही एकमात्र हथियार है जो संशय को नष्ट कर सकता है। (3) फिर योग (समत्व बुद्धि) में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। यह पूरे अध्याय का सार है कि ज्ञान प्राप्त करके, समभाव से अपने कर्तव्य का पालन करो।