मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
7 पदयोगसंन्यस्तकर्माणम्
योग (समत्व) द्वारा त्यागे हुए कर्म वाले (अर्थात् फलासक्ति रहित कर्म करने वाले)
ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्
ज्ञान द्वारा छिन्न (नष्ट) किए हुए संशय वाले
आत्मवन्तम्
आत्मनिष्ठ
न
नहीं
कर्माणि
कर्म
निबध्नन्ति
बाँधते
धनञ्जय
हे धनञ्जय।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे धनञ्जय! योग (समत्व) द्वारा कर्मों का त्याग किए हुए, ज्ञान द्वारा जिसके संशय नष्ट हो गए हैं, और जो आत्मनिष्ठ है—ऐसे पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इस श्लोक में ज्ञानी कर्मयोगी के लक्षण बताए गए हैं। वह योग द्वारा—अर्थात् समत्व बुद्धि द्वारा—कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर देता है। उसके सारे संशय ज्ञान से नष्ट हो गए हैं। वह आत्मवान् (आत्मा में स्थित) है। ऐसे व्यक्ति को कोई कर्म बन्धन में नहीं डाल सकता।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे धनञ्जय! योग (समत्व) द्वारा कर्मों का त्याग किए हुए, ज्ञान द्वारा जिसके संशय नष्ट हो गए हैं, और जो आत्मनिष्ठ है—ऐसे पुरुष को कर्म नहीं बाँधते। He who has renounced actions by Yoga, whose doubts are destroyed by knowledge, and who is self-possessed, is not bound by actions, O Dhananjaya.
व्याख्या / Explanation
इस श्लोक में तीन विशेषताएँ बताई गई हैं जो मिलकर व्यक्ति को कर्म-बन्धन से मुक्त कर देती हैं। पहली, योगसंन्यस्तकर्म—समत्व की बुद्धि से किए गए कर्म, जिनमें फल की आसक्ति नहीं होती। दूसरी, ज्ञानसञ्छिन्नसंशय—ज्ञान से सभी संदेहों का नाश हो जाना। तीसरी, आत्मवान्—आत्मा में स्थित होना, स्वयं को शरीर से भिन्न जानना। ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी उनसे बँधता नहीं, क्योंकि कर्तापन का अभिमान नष्ट हो चुका होता है।