श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 40

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 4 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
अज्ञः
अज्ञानी
च
और
अश्रद्दधानः
श्रद्धारहित
च
और
संशयात्मा
संशयी (संदेह करने वाला) पुरुष
विनश्यति
नष्ट हो जाता है
न
नहीं
अयम्
यह
लोकः
लोक
अस्ति
है
न
नहीं
परः
परलोक
न
नहीं
सुखम्
सुख
संशयात्मनः
संशयी पुरुष के लिए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशयी पुरुष नष्ट हो जाता है। संशयी पुरुष के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक अज्ञान, अश्रद्धा और संशय के विनाशकारी परिणाम बताता है। जो व्यक्ति ज्ञान से रहित है, श्रद्धा से रहित है, और संशय में डूबा रहता है, वह आध्यात्मिक प्रगति से वंचित रह जाता है। ऐसे संशयी के लिए न तो इस लोक में सुख है (क्योंकि वह निश्चय नहीं कर पाता), न परलोक में (क्योंकि उसने कोई साधना नहीं की), और न ही कहीं सुख है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशयी पुरुष नष्ट हो जाता है। संशयी पुरुष के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख। The ignorant, the faithless, and the doubting self goes to destruction. The doubting self has neither this world nor the next, nor happiness.

व्याख्या / Explanation

आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिए ज्ञान, श्रद्धा और निश्चय तीनों आवश्यक हैं। अज्ञानी को पता ही नहीं कि मार्ग क्या है। अश्रद्धालु को भरोसा नहीं कि मार्ग सही है। संशयी निरन्तर दुविधा में रहता है—करूँ या न करूँ, यह सही है या वह। ऐसा व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता। वह न इस लोक में सुखी है (क्योंकि मन अशान्त रहता है), न परलोक में (क्योंकि कोई पुण्य नहीं कमा पाता)। इसलिए संशय सबसे बड़ा शत्रु है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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