Holi Bhajan

होली खेले मसाने में काशी में घाट में खेले लिरिक्स (Holi Khele Masane Me Kashi Me Ghat Me Khele Lyrics in Hindi) - Shiv Bhajan - Bhaktilok

240 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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होली खेले मसाने में काशी में घाट में खेले - परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

देवादिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित यह पावन भजन "होली खेले मसाने में काशी में घाट में खेले" सनातन संस्कृति, अघोर परंपरा और मोक्षदायिनी नगरी काशी की अलौकिक संस्कृति का एक अत्यंत जीवंत और अनूठा रूप प्रस्तुत करता है। सामान्यतः होली का पर्व रंगों, उमंग, उल्लास और सामाजिक मेल-मिलाप का प्रतीक माना जाता है, जहाँ अबीर-गुलाल और फूलों से होली खेली जाती है। किंतु काशी (वाराणसी) के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र श्मशान घाट पर महाशमशान के अधिष्ठात्री देव भगवान शिव अपने गणों—भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियों और अघोरी साधकों के साथ चिता की राख (भस्म) से होली खेलते हैं। यह भजन इसी परम वैराग्य, मृत्यु के भय से परे आत्मिक मुक्ति और शिव के अलौकिक स्वरूप का अत्यंत मनमोहक वर्णन करता है। शिव तांडव स्तोत्र और महाकाल साधना की परंपरा से जुड़े भक्त इस भजन को अत्यंत भाव और ऊर्जा के साथ गाते हैं। इसे प्रातःकाल या प्रदोष काल में स्मरण करने से साधक के मन से मृत्यु का भय समाप्त होता है और अमोघ शिव भक्ति की प्राप्ति होती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ होली खेले मसाने में काशी में घाट में खेले ॥

होली खेले मसाने में काशी में घाट में खेले
होली खेले मसाने में काशी में घाट में खेले
होली खेले मसाने में।।

तन में भस्म लगाये शंकर, वेश बड़ा मनभावन है
माथे पर चंद्रमा विराजे, जटा में सोहे गंगा
खोल दिया है नयन तीसरा...
होली खेले मसाने में, होली खेले मसाने में
हरि राख से खेले जय भोले, हरि भस्म से खेले जय भोले।।

भंगिया पीवे भोले शंकर, धतूरा को खावे रे
चौसठ योगनि नाचे गावे, दम दम डमरू बजावे
मसान की राख से खेले होली, धूम मचावे मसाने में...
होली खेले मसाने में, होली खेले मसाने में।।

भूत प्रेत परिवार बाजे, गोचर बिछु कीरा रे
जहर हाल पी बाबा, मन में राखे धीरे रे
गालवा में मुंड माल लपेटे, भुतवन संग मसाने में
होली खेले मसाने में, होली खेले मसाने में।।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस अद्भुत शिव भजन की पंक्तियाँ देवादिदेव महादेव के उस रूप को दर्शाती हैं जो सांसारिक मोह-माया, राग-द्वेष और नश्वरता के बंधनों से परे है। 'मसान' यानी श्मशान वह स्थान है जहाँ सम्पूर्ण संसार की भौतिक कामनाएँ और शरीर की लिप्तता समाप्त हो जाती है। जब भगवान शिव मणिकर्णिका घाट पर चिता भस्म से होली खेलते हैं, तो वे संपूर्ण मानवता को यह संदेश देते हैं कि यह भौतिक शरीर अंततः राख होना है, इसलिए अहंकार का त्याग करके उस अविनाशी परम ब्रह्म (शिव) में मन लगाना ही जीवन का परम लक्ष्य है।

भजन में वर्णन है कि बाबा विश्वनाथ के तन पर भस्म रमी हुई है, उनके माथे पर चंद्र और जटाओं में माँ गंगा विराजमान हैं। वे भांग और धतूरे का प्रसाद ग्रहण करते हैं तथा उनके अनुचरों में भूत, प्रेत, पिशाच, गोचर और मुंडमालाधारी गण सम्मिलित होते हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान शिव किसी बाह्य रूप-रंग के मोहताज नहीं हैं; वे अकिंचन, श्मशानवासी और अघोरेश्वर हैं, जो हर जीव को बिना किसी भेदभाव के अपनी शरण में स्थान देते हैं। श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की पावन नगरी में यह मसान होली इस बात का प्रतीक है कि जीवन और मृत्यु दोनों ही शिव की ही लीला हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • अघोर एवं वैराग्य भाव: यह भजन साधक को सांसारिक आकर्षणों से मुक्त होकर वैराग्य और आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है।
  • महाकाल स्वरूप की उपासना: इसमें भगवान शिव के महाकाल और भूतनाथ रूप का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है।
  • काशी की विशिष्ट संस्कृति: यह भजन शिव पुराण एवं काशी की प्राचीन परंपरा 'रंगभरी एकादशी के उपरांत मसान की होली' का जीवंत दर्शन कराता है।
  • मृत्युंजय चेतना: इसे गाने या सुनने वाले भक्तों के हृदय से मृत्यु का भय हमेशा के लिए दूर हो जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को विशेष रूप से महाशिवरात्रि, रंगभरी एकादशी, होली के पावन पर्व, प्रदोष काल अथवा मासिक शिवरात्रि के दिन पूरी श्रद्धा के साथ गाना चाहिए। इसे गाते समय साधक को पवित्र आसन पर बैठकर भगवान शिव का मानसिक ध्यान करना चाहिए। रुद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने के पश्चात इस भजन का संकीर्तन करने से विशेष मानसिक शांति एवं आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति होती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के मुख्य आराध्य देवादिदेव महादेव, महाकाल, भूतनाथ और काशी के राजा बाबा विश्वनाथ हैं। साथ ही इस परंपरा में माँ पार्वती, नंदी महाराज, चौसठ योगिनियाँ और भगवान शिव के समस्त गणों का स्मरण किया जाता है। अघोर संप्रदाय और नाथ परंपरा के संतों ने भी श्मशान साधना और शिव के इसी कल्याणकारी स्वरूप को सर्वोपरि माना है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन लोक परंपरा और पारंपरिक शिव गीतों (शिव भजनों) की समृद्ध श्रृंखला का एक अभिन्न अंग है, जिसे उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और ब्रज-काशी क्षेत्र में बड़े ही उत्साह से गाया जाता है। इसके रचनाकार कोई विशिष्ट संत या कवि हो सकते हैं, किंतु लोककंठ में बस जाने के कारण यह रचना आज प्रत्येक शिव भक्त की जुबान पर है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

भजन की भाषा सरल, प्रवाहमयी और लोक-हिंदी (खड़ी बोली एवं अवधी-भोजपुरी मिश्रित) है। इसमें प्रयुक्त शब्दावली जैसे 'मसाने', 'भंगिया', 'धतूरा', 'चौसठ योगिनि', और 'मुंड माल' काशी और ग्रामीण अंचलों की पारंपरिक भक्ति शब्दावली को दर्शाती है। इसकी लय और ताल (विशेषकर डमरू की धुन के समान) श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है.

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • नश्वरता का बोध: शरीर नाशवान है और अंततः भस्म होना है, इसलिए इस पर अभिमान नहीं करना चाहिए।
  • समरसता: शिव के दरबार में ऊँच-नीच, राजा-रंक, सुंदर-असुंदर का कोई भेद नहीं है; भूत-प्रेत से लेकर देवता तक सब समान हैं।
  • निर्भीकता: भगवान शिव श्मशान में निवास करते हैं, जो हमें सिखाता है कि सच्चे साधक को मृत्यु या किसी भी संकट से भयभीत नहीं होना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
मसाने / मसान श्मशान घाट वैराग्य और भौतिक संसार की नश्वरता का प्रतीक स्थान
भस्म चिता की राख संसार की असारता और पवित्रता का प्रतीक
चौसठ योगिनी माता शक्ति की ६४ विशेष शक्तियाँ शिव के साथ ब्रह्मांडीय संचालन करने वाली ऊर्जाएँ
मुंड माल खोपड़ियों की माला काल और मृत्यु पर भगवान शिव का नियंत्रण

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"होली खेले मसाने में काशी में घाट में खेले..."
भावार्थ: भगवान शिव अपनी प्रिय नगरी काशी के मणिकर्णिका घाट पर साधारण रंगों के स्थान पर चिता भस्म से होली खेल रहे हैं। यह उनकी अलौकिक और त्रिगुणातीत लीला है।

"तन में भस्म लगाये शंकर वेश बड़ा मनभावन है..."
भावार्थ: महादेव के शरीर पर भस्म रमी है, माथे पर चंद्रमा और जटाओं में गंगा मैया सुशोभित हैं। उनका यह अद्भुत वेश भक्तों के मन को मोह लेता है।

"भंगिया पीवे भोले शंकर धतूरा को खावे रे..."
भावार्थ: शिवजी सहज स्वभाव वाले हैं। वे भांग और धतूरा ग्रहण करते हैं तथा अपने गणों के साथ डमरू बजाकर आनंदित होते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

"कर चरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसंवा अपराधं ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाब् श्रीमहादेव शंभो ॥"

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम होली खेले मसाने में काशी में घाट में खेले (Holi Khele Masane Me)
आराध्य देव देवादिदेव महादेव, महाकाल, बाबा काशी विश्वनाथ
संगीत शैली लोक भजन / शिव संकीर्तन
भाषा हिंदी / अवधी लोक भाषा
प्रमुख पर्व महाशिवरात्रि, रंगभरी एकादशी, होली
मुख्य भाव वैराग्य, आनंद, शिव भक्ति और समरसता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन देवादिदेव महादेव भगवान शिव (महाकाल और काशी विश्वनाथ) को समर्पित है।

काशी में रंगभरी एकादशी के अगले दिन (एकादशी और महाशिवरात्रि के पश्चात) मणिकर्णिका घाट पर चिता भस्म से मसान की होली खेली जाती है।

श्मशान इस भौतिक संसार की नश्वरता का प्रतीक है। शिव श्मशान में होली खेलकर यह संदेश देते हैं कि जीवन और मृत्यु दोनों ही उनकी लीला हैं तथा वे मोह-माया से परे हैं।

इस भजन के श्रवण और गायन से मन का अहंकार नष्ट होता है, मृत्यु का भय समाप्त होता है और भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति व वैराग्य भाव जागृत होता है।

हाँ, यद्यपि यह होली और महाशिवरात्रि पर विशेष रूप से गाया जाता है, किंतु शिव भक्त इसे प्रदोष काल, सोमवार या किसी भी धार्मिक सत्संग में गा सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस आलेख में काशी की सनातन परंपरा, अघोर संस्कृति और शिवभक्ति के पारंपरिक स्वरूप को ध्यान में रखते हुए प्रामाणिक और भावपूर्ण जानकारी प्रस्तुत की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव महापुराण - कोटि रुद्र संहिता
  • काशी खंड (स्कंद पुराण)
  • पारंपरिक लोक गाथाएँ एवं शिव संकीर्तन परंपरा

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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