श्री दुर्गा आरती संग्रह
2+ पावन आरतियाँ

श्री दुर्गा की आरतियाँ
पावन स्तुति व भक्ति संग्रह

भक्तिलोक पर भगवान श्री दुर्गा जी की समस्त पावन आरतियों, नित्य वंदना, राग-ताल, शास्त्रीय विधि, सरल भावार्थ एवं प्रामाणिक हिंदी लिरिक्स का संपूर्ण संकलन।

शास्त्र-सम्मत एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

शुद्ध पाठ, राग-ताल, शास्त्रीय विधि और सरल भावार्थ सहित आरती संग्रह।

2+ आरतियाँ उपलब्ध
1,041+ साधक दर्शनार्थी
1 / 1 वर्तमान सूची पृष्ठ
द
श्री दुर्गा
780 पाठ

जय माता दी आरती (Jai Mata Di Aarti) – Lyrics in Hindi | Ambe Tu Hai Jagdambe

पढ़ें प्रसिद्ध जय माता दी आरती 'अम्बे तू है जगदम्बे' के संपूर्ण बोल हिंदी में। माँ दुर्गा की भक्ति और शक्ति से परिपूर्ण यह आरती आपके जीवन में सुख-समृद्धि लाए।

द
श्री दुर्गा
261 पाठ

जगदम्बा आरती (Jagadamba Aarti) – Lyrics in Hindi

प्रसिद्ध जगदम्बा आरती के पावन बोल हिंदी में पढ़ें। माँ दुर्गा की आराधना से जुड़े इस भक्तिमय पाठ से घर में सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

श्री दुर्गा आरती का आध्यात्मिक महत्व एवं शास्त्रीय विधि

सनातन हिंदू धर्म में आरती की परंपरा अत्यंत प्राचीन, पावन और फलदायी मानी गई है। 'आरती' शब्द संस्कृत के 'आरात्रिक' शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है — 'रात्रि या अंधकार को दूर करने वाला दिव्य प्रकाश'। भगवान श्री दुर्गा की नित्य पूजा-अर्चना के समापन पर जब कपूर अथवा शुद्ध देसी घी के पंचमुखी दीपक से आरती की जाती है, तो वह भक्त के हृदय से अज्ञान, भय, और नकारात्मकता के अंधकार को समाप्त कर ज्ञान और भक्ति का दिव्य प्रकाश भर देती है।

"दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥"
अर्थात्: दीपक की ज्योति साक्षात् परब्रह्म और भगवान जनार्दन का स्वरूप है। हे दिव्य ज्योति! आप हमारे समस्त पापों, संतापों और विघ्नों का हरण करें।

१. श्री दुर्गा आरती करने के प्रमुख आध्यात्मिक नियम

आरती करते समय कुछ विशेष शास्त्रीय नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक बताया गया है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:

  • शुद्धता व पवित्रता: आरती सदैव स्नान उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर, शांत व एकाग्र चित्त से करनी चाहिए।
  • दीपक का चयन: आरती के लिए शुद्ध पीतल, तांबा अथवा चांदी की थाली का उपयोग करें। उसमें शुद्ध देसी गाय के घी का दीपक अथवा भीमसेनी कपूर का उपयोग श्रेष्ठ माना गया है।
  • दक्षिणावर्त घुमाने की विधि: आरती की थाली को भगवान के श्री चरणों में ४ बार, नाभि मंडल में २ बार, मुखारविंद के सामने १ बार और संपूर्ण श्री विग्रह के समक्ष ७ बार दक्षिणावर्त (Clockwise - 'ॐ' की आकृति में) घुमाया जाना चाहिए।

२. आरती के समय शंख व घंटी का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक प्रभाव

आरती के दौरान शंख, घंटा और घड़ियाल बजाने की सुदीर्घ परंपरा है। स्कंद पुराण के अनुसार, घंटी की ध्वनि से निकलने वाली तरंगे वातावरण में उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा, विषाणुओं और तामसिक शक्तियों को नष्ट करती हैं। इसके साथ ही जब भक्त एकाग्र होकर आरती का सामूहिक गान करते हैं, तो मंदिर अथवा गृह प्रांगण में सकारात्मक प्राण ऊर्जा (Positive Vibrations) का संचार होता है।

३. आरती ग्रहण करने (आरती लेने) की शास्त्रीय विधि

आरती संपन्न होने के उपरांत आरती की थाली को जल के छींटों से शांत (आचमन) किया जाता है। इसके पश्चात दोनों हाथों की हथेलियों को दीपक की ज्योति के ऊपर हल्के से घुमाकर अपने मस्तक, नेत्रों और हृदय पर लगाया जाता है। इसे 'आरती का तेज ग्रहण करना' कहा जाता है, जिससे अंतःकरण पवित्र और प्रफुल्लित होता है।

श्री दुर्गा आरती से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQs)

भगवान श्री दुर्गा जी की आरती नित्य प्रातःकाल दैनिक पूजन के उपरांत तथा संध्याकाल सूर्यास्त के समय गोधूलि वेला में करना सर्वोत्तम माना गया है। विशेष पर्वों अथवा त्योहारों पर महाआरती का आयोजन करना और भी पुण्यदायी होता है।
हाँ, घर में अकेले भी श्रद्धापूर्वक भगवान की आरती की जा सकती है। यदि परिवार के सभी सदस्य मिलकर सामूहिक रूप से आरती करें, तो घर में परस्पर प्रेम, सौहार्द और सकारात्मक ऊर्जा का कई गुना अधिक विस्तार होता है।
कपूर जलते समय कोई राख या अवशेष नहीं छोड़ता, जो इस बात का प्रतीक है कि भक्त का अहंकार भगवान की भक्ति में पूर्णतः विलीन हो जाना चाहिए। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध और जीवाणुरहित बनाती है।

श्री दुर्गा जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

समस्त आरतियाँ देखें