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श्री शेरावाली माता आरती
491 पाठ

शेरावाली माता आरती (Sheranwali Mata Aarti) – Lyrics in Hindi

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

पारंपरिक शास्त्रीय राग / ताल
५-७ मिनट पठन अवधि
हिन्दी आरती भाषा
परंपरागत रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ शेरावाली माता आरती (Sheranwali Mata Aarti) – Lyrics in Hindi ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

🙏 जय शेरावाली माता

(Sheranwali Mata Aarti) – प्रसिद्ध दुर्गा आरती

सिंह वाहिनी माता की आरती ॥

📝 आरती विवरण

🎤 परंपरा: सनातन
🏷️ श्रेणी: दुर्गा आरती / शेरावाली माता
📍 भाव: शक्ति, रक्षा, भक्ति

📜 आरती लिरिक्स (हिन्दी में)

जय शेरावाली माता, जय जय शेरावाली माता।
सिंह वाहिनी माता, भक्तों की रखवाली माता॥

जय जय अम्बे भवानी, जय जगदम्बा माता।
त्रिनेत्र धारिणी माता, शुम्भ निशुम्भ संहारी॥

जय शेरावाली माता, जय जय शेरावाली माता।
सिंह वाहिनी माता, भक्तों की रखवाली माता॥

महिषासुर मर्दिनी माता, चण्ड मुण्ड विनाशिनी।
रक्तबीज संहारिणी, जय जय जगत तारिणी॥

जय शेरावाली माता, जय जय शेरावाली माता।
सिंह वाहिनी माता, भक्तों की रखवाली माता॥

हरिद्वार में विराजती, वैष्णो देवी कहलाई।
भक्तों की मनोकामना, पूर्ण करो मैया॥

जय शेरावाली माता, जय जय शेरावाली माता।
सिंह वाहिनी माता, भक्तों की रखवाली माता॥

अष्टभुजा दशभुजा, हाथों में शस्त्र सजाए।
शेर पर सवार हो, रण में दैत्य मारे॥

जय शेरावाली माता, जय जय शेरावाली माता।
सिंह वाहिनी माता, भक्तों की रखवाली माता॥

जो नर श्रद्धा से, यह आरती गाता है।
दुःख दरिद्र मिटाकर, सुख संपत्ति पाता है॥

जय शेरावाली माता, जय जय शेरावाली माता।
सिंह वाहिनी माता, भक्तों की रखवाली माता॥

जय शेरावाली माता, जय जय शेरावाली माता।
सिंह वाहिनी माता, भक्तों की रखवाली माता॥

✍️ परंपरागत आरती (सनातन धर्म)

🙏 आरती का अर्थ और संदेश

शेरावाली माता – माँ दुर्गा का वह स्वरूप जो सिंह (शेर) पर सवार होकर भक्तों की रक्षा करती हैं। यह आरती माँ की महिमा, उनके विभिन्न रूपों और असुरों के संहार का वर्णन करती है।

आरती के माध्यम से भक्त माँ से सुख, शांति और मनोकामनाएँ पूर्ण करने की प्रार्थना करते हैं। यह विशेष रूप से वैष्णो देवी, हरिद्वार और शक्तिपीठों में गाई जाती है।

🔍 आरती का विशेष महत्त्व

शक्ति का प्रतीक: शेरावाली माता शक्ति, साहस और विजय की देवी हैं। इनकी आरती से भक्तों में आत्मविश्वास और नकारात्मक शक्तियों पर विजय का भाव जागता है।

रक्षा का वरदान: जो भी श्रद्धा से यह आरती गाता है, माता उसकी सभी विपत्तियों को दूर करती हैं और उसे संकटों से बचाती हैं।

॥ इति श्रीशेरावाली माता आरती सम्पूर्णम् ॥
॥ जय अम्बे गौरी मैया, जय शेरावाली माता ॥

१. शेरावाली माता आरती (Sheranwali Mata Aarti) – Lyrics in Hindi का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री शेरावाली माता के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री शेरावाली माता जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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