माता की आरती (Mata Ki Aarti) – Lyrics in Hindi | Jai Ambe Gauri
माता की आरती – जय अम्बे गौरी के भक्ति भाव से परिपूर्ण यह प्रसिद्ध दुर्गा आरती हिंदी लिरिक्स, अर्थ और महत्व सहित।
भक्तिलोक पर भगवान श्री माता जी की समस्त पावन आरतियों, नित्य वंदना, राग-ताल, शास्त्रीय विधि, सरल भावार्थ एवं प्रामाणिक हिंदी लिरिक्स का संपूर्ण संकलन।
शुद्ध पाठ, राग-ताल, शास्त्रीय विधि और सरल भावार्थ सहित आरती संग्रह।
माता की आरती – जय अम्बे गौरी के भक्ति भाव से परिपूर्ण यह प्रसिद्ध दुर्गा आरती हिंदी लिरिक्स, अर्थ और महत्व सहित।
जय शेरावाली माता आरती हिंदी लिरिक्स पढ़ें। माँ दुर्गा के स्वरूप सिंह वाहिनी की यह पावन आरती भक्तों को शक्ति, रक्षा और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है। संदर्भ एवं व्याख्या सहित संपूर्ण पाठ यहाँ देखें।
सनातन हिंदू धर्म में आरती की परंपरा अत्यंत प्राचीन, पावन और फलदायी मानी गई है। 'आरती' शब्द संस्कृत के 'आरात्रिक' शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है — 'रात्रि या अंधकार को दूर करने वाला दिव्य प्रकाश'। भगवान श्री माता की नित्य पूजा-अर्चना के समापन पर जब कपूर अथवा शुद्ध देसी घी के पंचमुखी दीपक से आरती की जाती है, तो वह भक्त के हृदय से अज्ञान, भय, और नकारात्मकता के अंधकार को समाप्त कर ज्ञान और भक्ति का दिव्य प्रकाश भर देती है।
"दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥"
अर्थात्: दीपक की ज्योति साक्षात् परब्रह्म और भगवान जनार्दन का स्वरूप है। हे दिव्य ज्योति! आप हमारे समस्त पापों, संतापों और विघ्नों का हरण करें।
आरती करते समय कुछ विशेष शास्त्रीय नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक बताया गया है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
आरती के दौरान शंख, घंटा और घड़ियाल बजाने की सुदीर्घ परंपरा है। स्कंद पुराण के अनुसार, घंटी की ध्वनि से निकलने वाली तरंगे वातावरण में उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा, विषाणुओं और तामसिक शक्तियों को नष्ट करती हैं। इसके साथ ही जब भक्त एकाग्र होकर आरती का सामूहिक गान करते हैं, तो मंदिर अथवा गृह प्रांगण में सकारात्मक प्राण ऊर्जा (Positive Vibrations) का संचार होता है।
आरती संपन्न होने के उपरांत आरती की थाली को जल के छींटों से शांत (आचमन) किया जाता है। इसके पश्चात दोनों हाथों की हथेलियों को दीपक की ज्योति के ऊपर हल्के से घुमाकर अपने मस्तक, नेत्रों और हृदय पर लगाया जाता है। इसे 'आरती का तेज ग्रहण करना' कहा जाता है, जिससे अंतःकरण पवित्र और प्रफुल्लित होता है।