श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 25

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 37 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् | उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ||२५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
भीष्म
भीष्म
द्रोण
द्रोणाचार्य
प्रमुखतः
आगे
सर्वेषाम्
सभी
च
और
महीक्षिताम्
राजाओं के
उवाच
बोले
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
पश्य
देखो
एतान्
इन
समवेतान्
एकत्रित
कुरून्
कुरुवंशियों को
इति
इस प्रकार।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

भीष्म, द्रोण और सभी राजाओं के सामने कृष्ण ने कहा: हे पार्थ! इन एकत्रित कुरुवंशियों को देखो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भूमिका एवं आध्यात्मिक महत्त्व

श्रीमद्भगवद्गीता केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध के मैदान का वर्णन करने वाला कोई सामान्य ऐतिहासिक ग्रंथ मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना के सबसे गहरे और रहस्यमयी अंतर्द्वंद्व का एक दिव्य दर्पण है। भगवद्गीता के प्रथम अध्याय, जिसे 'अर्जुनविषादयोग' के नाम से जाना जाता है, उसकी यह पच्चीसवीं (25वीं) संख्या अत्यंत ही मर्मस्पर्शी और नाटकीय मोड़ को दर्शाती है। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण की सर्वशक्तिमत्ता, उनकी सर्वज्ञता और योगेश्वर स्वरूप का एक अत्यंत जीवंत और अद्भुत दर्शन होता है। जब महाभारत के इस महायुद्ध की वेला में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब पार्थ (अर्जुन) के सारथी के रूप में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण ने केवल भौतिक दृष्टि से ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक दृष्टि से भी अर्जुन को उसकी सम्पूर्ण विराट स्थिति का बोध कराने का संकल्प लिया।

कुरुक्षेत्र के उस विशाल रणक्षेत्र में कौरव सेना का नेतृत्व कर रहे पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और अन्य महान पृथ्वीपति राजाओं की उपस्थिति केवल राजनीतिक या सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि यह मानवीय मोह, कर्तव्य, और धर्म के सबसे बड़े संकट का प्रतीक थी। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह कहा कि "हे पार्थ! इन सभी कुरुवंशियों को देखो जो यहाँ एकत्रित हैं," तो इसके पीछे एक अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक संदेश छिपा था। श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखाना चाहते थे कि जिस युद्ध को वह केवल अपने भाइयों और गुरुजनों के संहार के रूप में देख रहा है, वह वस्तुतः अधर्म पर धर्म की विजय का एक अनिवार्य और ब्रह्मांडीय चरण है। इस श्लोक का सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व इस बात में निहित है कि यह मनुष्य को उसके जीवन के हर उस चौराहे पर खड़ा कर देता है जहाँ उसे अपने प्रियजनों के मोह और अपने कर्तव्य (धर्म) के बीच चयन करना पड़ता है। भक्तिलोक.इन के इस विस्तृत शोध-पत्र में हम इसी श्लोक के शाब्दिक अर्थ, इसके ऐतिहासिक प्रसंग, दार्शनिक गहराई और आधुनिक जीवन में इसके प्रासंगिक लाभों का अत्यंत सूक्ष्मता से विश्लेषण करेंगे ताकि साधकगण इसे अपने जीवन में उतारकर परम शांति को प्राप्त कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् uvaacha paartha pashyaitaansamvetaankurooriti (25)

देवनागरी लिपि में मूल श्लोक:

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति॥ २५॥

श्लोकोच्चारण विधि एवं अनुष्ठानिक नियम:

  • प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त या संध्या बेला में स्नान उपरांत पवित्र आसन पर बैठें।
  • श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें।
  • प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध संस्कृत स्वर के अनुसार करें।
  • पाठ के अंत में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का मानसिक ध्यान करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण नीचे दी गई सारणी में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
भीष्म पितामह भीष्म अटूट प्रतिज्ञा, कुल की मर्यादा और वृद्धों के प्रति आदर का प्रतीक, जिन्हें हराना असंभव था।
द्रोण गुरु द्रोणाचार्य विद्या, अस्त्र-शस्त्र ज्ञान और आचार्य परंपरा का प्रतीक, जिनके प्रति अर्जुन के मन में अगाध श्रद्धा थी।
प्रमुखतः प्रमुख रूप से, आगे रखकर उन सभी महान योद्धाओं की श्रेणी में मुख्यता का बोध कराता है जो उस सेना की रीढ़ थे।
सर्वेषां सभी के समग्रता का द्योतक, यानी कोई भी योद्धा या राजा इस दृष्टि से बाहर नहीं था।
च और संयोजक पद जो भीष्म-द्रोण और अन्य राजाओं के बीच की निरंतरता को जोड़ता है।
महीक्षिताम् पृथ्वी के राजाओं / शासकों के भौतिक सत्ता, अहंकार और सांसारिक राज्यों के उन अधीशों का प्रतिनिधित्व जो युद्ध में लिप्त थे।
उवाच कहा / बोले योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से निकला वह दिव्य निर्देश जो अर्जुन की चेतना को झकझोरने वाला था।
पार्थ हे पार्थ (प्रथा/कुंती पुत्र अर्जुन) यह नाम कुंती के पुत्र के रूप में उनके मानवीय दायित्व और पारिवारिक संबंधों की याद दिलाता है।
पश्य देखो केवल आँख से देखने की बात नहीं, बल्कि अंतःकरण की दृष्टि से वास्तविकता को स्वीकार करने का आह्वान।
एतान् इन सबको सामने खड़े उन तमाम स्वजनों, गुरुओं और मित्रों की ओर संकेत जो मोह का कारण बने थे।
समवेतान् अच्छी प्रकार से एकत्रित हुए युद्ध के लिए पूरी तरह संगठित और काल के मुँह में समाने के लिए तैयार हुए लोग।
कुरून् इति कुरुवंशियों को (इस प्रकार) कुरु कुल के इस विनाशक समागम को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अंतिम निर्देश।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध का प्रसंग वेदों, पुराणों और विशेषकर महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित इस महाकाव्य का सबसे केंद्रीय भाग है। कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर जब कौरव और पांडव सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब यह श्लोक उस नाटकीय और उच्च तनावपूर्ण क्षण का वर्णन करता है जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी चतुराई और सारथी के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह करते हुए अर्जुन के रथ को दोनों सेनाओं के बीच लाकर खड़ा कर दिया था। संजय ने हस्तिनापुर में बैठे हुए धृतराष्ट्र को इस दृश्य का अत्यंत सजीव वर्णन सुनाया था।

इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में, भीष्म और द्रोण का नाम अत्यंत आदर और जटिलता के साथ जुड़ा हुआ है। पितामह भीष्म वह महान योद्धा थे जिन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था और जो धर्म की रक्षा के लिए अपनी आजीवन प्रतिज्ञा से बंधे हुए थे, परंतु दुर्भाग्यवश वे दुर्योधन के पक्ष में खड़े थे। इसी प्रकार, आचार्य द्रोण ने अर्जुन को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाया था, किंतु वे भी अपनी आजीविका और राज्य के प्रति निष्ठा के कारण कौरव पक्ष से युद्ध करने के लिए विवश थे। जब अर्जुन ने इन दोनों महान हस्तियों को अपने सामने शत्रुओं के रूप में देखा, तो उनका गांडीव धनुष उनके हाथों से फिसलने लगा।

श्रीकृष्ण का इन योद्धाओं को विशेष रूप से दिखाना इस बात का प्रतीक था कि जब अधर्म समाज की जड़ों में गहराई तक उतर जाता है, तब व्यक्तिगत संबंध और गुरुजनों का आदर भी धर्म के विराट मार्ग में बाधा बन सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह दृश्य इसलिए दिखाया ताकि अर्जुन अपने अल्पकालिक मोह (मोहग्रस्त करुणा) से ऊपर उठकर अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करे। यह संपूर्ण आख्यान हमें यह सिखाता है कि जीवन के किसी भी कठिन मोड़ पर, चाहे हमारे सामने हमारे कितने भी आदरणीय और प्रिय व्यक्ति क्यों न हों, यदि वे अन्याय और अधर्म के पक्ष में खड़े हैं, तो सत्य और न्याय का साथ देना ही मनुष्य का सर्वोच्च कर्तव्य बनता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक और इसके मर्म का नियमित स्मरण व अध्ययन करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक एकाग्रता और स्थिरता

श्लोक का नियमित पाठ करने से मन की चंचलता समाप्त होती है और जीवन की विकट परिस्थितियों में भी मानसिक संतुलन बनाए रखने की अद्भुत शक्ति मिलती है।

2. मोह और अज्ञान का नाश

यह श्लोक मनुष्य के भीतर छिपे अस्वाभाविक मोह, अनावश्यक पारिवारिक आसक्ति और भ्रम को दूर करने में एक तीक्ष्ण तलवार की तरह कार्य करता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

गीता के श्लोकों के उच्चार से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें साधक के आस-पास एक उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक सुरक्षा कवच का निर्माण करती हैं।

4. कर्म के प्रति निष्ठा और कर्तव्यबोध

व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर अपने सामाजिक और नैतिक कर्तव्यों (धर्म) का पालन पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ करना सीख जाता है।

5. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

भगवान श्रीकृष्ण के वचनों के स्मरण मात्र से पूर्व जन्मों के संचित नकारात्मक कर्मों के बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है और चित्त शुद्ध होता है।

6. ईश्वर शरणागति का भाव

जब मनुष्य यह समझ जाता है कि जीवन की हर गतिविधि एक दिव्य नियंत्रण के अधीन है, तो उसके भीतर भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण (शरणागति) का भाव जागृत होता है।

7. भय और चिंता से मुक्ति

भविष्य की अनिश्चितताओं और असफलताओं का भय समाप्त होता है, क्योंकि साधक को यह विश्वास हो जाता है कि उसका वास्तविक सारथी स्वयं श्रीकृष्ण हैं।

8. दिव्य दृष्टि और आत्मबोध

आंतरिक चेतना का विकास होता है, जिससे साधक संसार की नश्वरता और आत्मा की अमरता के सत्य को सहज ही अनुभव करने लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलोक.इन पर प्रस्तुत यह विस्तृत श्लोक विश्लेषण वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और संत ज्ञानेश्वर महाराज के दृष्टिकोण) तथा पारंपरिक महाभारत कथाओं के गहन अध्ययन के उपरांत तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन संस्कृति के शुद्ध, तार्किक और आध्यात्मिक रूप को बिना किसी मिलावट के पहुँचाना है। प्रत्येक शब्द और अर्थ की सत्यता की जांच अनुभवी संस्कृत विद्वानों और धार्मिक शोधकर्ताओं द्वारा की गई है ताकि आधुनिक डिजिटल युग के पाठकों को एक प्रामाणिक और अत्यंत उपयोगी मार्गदर्शिका प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जीवन के प्रत्येक संकटपूर्ण और निर्णायक मोड़ पर मनुष्य को अपने मोह, भय और व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठकर सत्य, धर्म और कर्तव्य का पालन करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजनों को दिखाकर इसी आंतरिक यथार्थ से परिचित कराया था।

उत्तर: श्रीकृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि अर्जुन अपने स्वजनों और गुरुओं के प्रति अत्यधिक मोह के कारण अपने क्षत्रिय धर्म से विमुख हो रहा है। इसलिए उन्होंने अर्जुन को उन सभी को आमने-सामने देखने के लिए कहा ताकि अर्जुन यह समझ सके कि यह युद्ध केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म का एक अपरिहार्य संघर्ष है।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का शुद्ध उच्चारण और उनके दार्शनिक अर्थ का मनन करने से मस्तिष्क की नसें शांत होती हैं, एकाग्रता बढ़ती है और जीवन की जटिल समस्याओं से निपटने के लिए आंतरिक शक्ति एवं मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

उत्तर: 'महीक्षिताम्' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'पृथ्वी के शासक या राजा' होता है। इस श्लोक में इसका तात्पर्य उन सभी राजाओं और महान योद्धाओं से है जो कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव सेना की ओर से युद्ध करने के लिए एकत्रित हुए थे।

उत्तर: भक्तिलोक.इन पर प्रकाशित होने वाली समस्त सामग्री संपादकीय रूप से तैयार की जाती है, जिसमें वेदों, पुराणों, और गीता के पारंपरिक भाष्यों का गहन संदर्भ लिया जाता है। विद्वान संपादकों और संस्कृत भाषाविदों द्वारा इसकी पूर्ण सत्यता और शुद्धता की जांच की जाती है ताकि पाठकों को सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिल सके।

दर्शन / Vision

कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में खड़े सभी संबंधियों और गुरुजनों को दिखाया, जिससे अर्जुन का हृदय द्रवित हो उठा। Krishna showed Arjuna all his relatives and elders on the battlefield, which would soon evoke Arjuna's compassion.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 25 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 25/47 53% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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