श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 26

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 43 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् | आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ||२६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
तत्र
वहाँ
अपश्यत्
देखा
स्थितान्
खड़े हुए
पार्थः
पार्थ (अर्जुन)
पितॄन्
पिताओं को
अथ
तथा
पितामहान्
दादाओं को
आचार्यान्
आचार्यों को
मातुलान्
मामाओं को
भ्रातॄन्
भाइयों को
पुत्रान्
पुत्रों को
पौत्रान्
पौत्रों को
सखीन्
मित्रों को
तथा
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वहाँ अर्जुन ने देखा कि दोनों सेनाओं में उनके पिता, पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र आदि सभी खड़े थे।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन धर्म के आध्यात्मिक गगन में श्रीमद्भागवद्गीता वह सूर्य है जो मानव मात्र के अंतःकरण के अज्ञान रूपी अंधकार को चीरकर ज्ञान और कर्तव्य का प्रकाश फैलाता है। महाभारत के भीषण रणक्षेत्र कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर जब दोनों ओर की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब कायरता नहीं अपितु परम पवित्र मानवीय संवेदनाओं और अज्ञानजनित मोह का एक ऐसा अद्भुत और नाटकीय दृश्य उपस्थित हुआ, जिसने संपूर्ण ब्रह्मांड को हिला कर रख दिया। प्रस्तुत श्लोक—"तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्..."—गीता के प्रथम अध्याय यानी 'अर्जुन विषाद योग' का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और मनोवैज्ञानिक मोड़ है। इस श्लोक में महर्षि वेदव्यास ने पांडव श्रेष्ठ अर्जुन की उस मनोदशा का अत्यंत जीवंत चित्रण किया है, जहाँ एक महान योद्धा अपने ही सगे-संबंधियों, गुरुओं, मित्रों और प्रियजनों को शत्रु पक्ष में खड़ा देखता है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक केवल दो पक्षों के बीच के युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि यह हर उस मनुष्य के आंतरिक संघर्ष का प्रतीक है जो जीवन के किसी न किसी मोड़ पर धर्म, कर्तव्य, मोह, ममता और पारिवारिक बंधनों के चक्रव्यूह में उलझ जाता है। जब अर्जुन ने अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में खड़ा करवाया और दृष्टि डाली, तो उसने देखा कि युद्ध भूमि में कोई और नहीं बल्कि उसके अपने ही पिता, ताऊ, दादा, गुरु द्रोणाचार्य और कृपाचार्य, मामा शल्य, भाई दुर्योधनादि, पुत्र और पौत्र तथा स्नेही मित्र खड़े हैं। इस दृश्य ने अर्जुन के गाण्डीव को थामने वाले पराक्रमी हाथों को कंपा दिया और उसके हृदय में एक असीम करुणा और मोह का ज्वार उमड़ पड़ा।

इस लेख के माध्यम से हम Bhaktilok.in के इस विशेष पावन मंच पर इसी दिव्य श्लोक की गहराई में उतरेंगे। हम इसके एक-एक शब्द के मर्म को समझेंगे, इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करेंगे, इसके मानसिक एवं आध्यात्मिक लाभों को जानेंगे और यह समझने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार यह श्लोक आज के आधुनिक युग में भी हमारे जीवन की उलझनों को सुलझाने में एक प्रकाश स्तंभ का कार्य कर सकता है। आइए, इस पावन आध्यात्मिक यात्रा में प्रवेश करें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ प्रथमोऽध्यायः - अर्जुनविषादयोग

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।

आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥२६॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय वेदोक्त छंद के नियमों का पालन करना चाहिए। 'तत्रापश्यत्' में संधि और उच्चारण की स्पष्टता होनी चाहिए। 'पितॄन्' और 'पितामहान्' शब्दों का उच्चारण करते समय दीर्घ स्वरों पर उचित बल दिया जाना चाहिए ताकि श्लोक की लय और उसका दिव्य माधुर्य बना रहे।

प्रतिदिन गीता के प्रथम अध्याय के इन श्लोकों का सस्वर पाठ करने से एकाग्रता बढ़ती है और मन में व्याप्त सांसारिक मोह के प्रति विरक्ति का भाव जागृत होता है, जो मोक्ष मार्ग का प्रथम चरण है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भागवद्गीता के इस २६वें श्लोक में संस्कृत व्याकरण और शब्दावली का अद्भुत समन्वय है। आइए, एक विस्तृत तालिका के माध्यम से इसके प्रत्येक पद के सरल अर्थ और उनके आध्यात्मिक व दार्शनिक भावार्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तत्र (Tatra) वहाँ (कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में) वह स्थान जहाँ धर्म और अधर्म का महासंग्राम होने वाला था, अंतःकरण का प्रतीक।
अपश्यत् (Apashyat) देखा केवल नेत्रों से देखना नहीं, अपितु अंतर्दृष्टि से अपनों की उपस्थिति का बोध होना।
स्थितान् (Sthitan) खड़े हुए / स्थित युद्ध के लिए अपनी-अपनी छावनियों और व्यूह रचनाओं में डटे हुए लोग।
पार्थः (Parthah) प्रथा (कुंती) के पुत्र अर्जुन माया और मोह के बंधन में बंधा हुआ एक सामान्य मनुष्य और योद्धा।
पितॄन् (Pitrin) चाचा, ताऊ और ताऊ-चाचा के तुल्य संबंधी परिवार के वे वरिष्ठजन जिनके प्रति आदर और दायित्व का भाव होता है।
अथ (Atha) और / इसके पश्चात एक योद्धे के मन में एक के बाद एक उठने वाली भावनाओं की क्रमिक श्रृंखला।
पितामहान् (Pitamahan) दादा (जैसे भीष्म पितामह) कुल के गौरव, परंपरा और कुलवृद्ध, जिनका आशीर्वाद सर्वोपरि माना जाता है।
आचार्यान् (Acharyan) गुरुजन (जैसे द्रोणाचार्य, कृपाचार्य) विद्या, शस्त्र और अस्त्र की शिक्षा देने वाले पूजनीय और वंदनीय शिक्षक।
मातुलान् (Matulan) मामागण (जैसे शल्य और शकुनि के संबंधी) ननिहाल पक्ष के वे संबंधी जिनका कुल के साथ आत्मीय संबंध होता है।
भ्रातॄन् (Bhratrin) भाई (कौरव और अन्य बंधु) सृष्टि के सहयात्री और एक ही रक्त से उत्पन्न हुए अपने ही प्रियजन।
पुत्रान्पौत्रान् (Putranpautran) पुत्र और पौत्र (पोते) आने वाली पीढ़ियां, वंश की निरंतरता और भविष्य की आशाएं।
सखींस्तथा (Sakhimstatha) तथा मित्रगण (जैसे कर्ण और अन्य सुहृद) जीवन के हर सुख-दुःख में साथ देने वाले विश्वासपात्र और आत्मीय जन।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक अभिन्न अंग है, जिसे महर्षि वेदव्यास ने लिपिबद्ध किया है। इस ऐतिहासिक घटना की पृष्ठभूमि तब तैयार होती है जब कौरवों और पांडवों के बीच हस्तिनापुर के सिंहासन को लेकर सारे शांति प्रयास विफल हो जाते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों की ओर से अंतिम शांति दूत के रूप में हस्तिनापुर की सभा में जाकर दुर्योधन को समझाने का अथक प्रयास किया था, परंतु दुर्योधन के अड़ियल रवैये और अहंकार के कारण युद्ध अनिवार्य हो गया।

कुरुक्षेत्र की धरती पर दोनों पक्षों की सेनाएं सज चुकी थीं। धर्मराज युधिष्ठिर के अनुरोध पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथि बनने का कठिन उत्तरदायित्व स्वीकार किया था। युद्ध के ठीक आरंभ होने से पूर्व, अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा—"सेनायोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत" (हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले जाकर खड़ा कीजिए)। अर्जुन की इस जिज्ञासा के पीछे तात्कालिक रूप से यह देखने की इच्छा थी कि युद्ध करने के लिए कौन-कौन से दुष्ट योद्धा रणभूमि में उपस्थित हैं।

जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने दिव्य रथ को दोनों सेनाओं के बीच—भीष्म, द्रोण और संसार के तमाम राजाओं के सामने लाकर खड़ा किया, अर्जुन की दृष्टि उन तमाम व्यक्तियों पर पड़ी जिनके साथ उसने अपना बचपन बिताया था, जिनसे शिक्षा प्राप्त की थी, जिनके साथ खेल-कूद कर बड़ा हुआ था। श्लोक में वर्णित 'पितामह' भीष्म, जो अर्जुन के लिए पिता से भी बढ़कर थे, 'आचार्य' द्रोणाचार्य, जिन्होंने अर्जुन को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाया था, और भाई-बंधु, सब सामने खड़े थे।

यहीं से मानवीय मन का सबसे बड़ा द्वंद्व शुरू होता है। एक तरफ क्षत्रिय धर्म था जो देश और न्याय की रक्षा के लिए अधर्मियों का संहार करने की मांग कर रहा था, और दूसरी तरफ पारिवारिक प्रेम, सामाजिक मर्यादा और गुरुजनों के प्रति अगाध श्रद्धा थी। अर्जुन का यह विषाद केवल एक व्यक्ति का दुःख नहीं था, बल्कि यह जीवात्मा का वह विलाप है जो संसार के भौतिक बंधनों (मोह-माया) में फंसकर अपने परम कर्तव्य (स्वधर्म) से विमुख होने लगता है। इस ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि ने ही आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण को गीता के उस दिव्य ज्ञान को प्रकट करने का अवसर दिया, जो आज संपूर्ण मानव जाति के लिए परम मार्गदर्शक है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवद्गीता के प्रथम अध्याय के इन श्लोकों का अध्ययन, मनन और पठन करने से साधक के जीवन में अनेकों प्रकार के मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। संतों और आचार्यों के अनुसार इसके निम्नलिखित प्रमुख लाभ हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

जीवन में जब कभी भी अत्यधिक मानसिक तनाव, भ्रम या निर्णय लेने की दुविधा (Confession) उत्पन्न हो, तो इस श्लोक का मनन करने से मन शांत होता है क्योंकि यह दर्शाता है कि महानुभाव भी दुविधाओं से घिरे रहे हैं।

2. मोह और आसक्ति से मुक्ति

सांसारिक रिश्तों और झूठी मोह-माया के प्रति अति-आसक्ति मनुष्य को उसके वास्तविक मार्ग से भटका देती है। इस श्लोक के भावार्थ को समझने से व्यक्तियों में मोह के प्रति वैराग्य का बीज पड़ता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

गीता के संस्कृत श्लोकों के नियमित उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें (Sound Vibrations) आसपास के वातावरण को शुद्ध करती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं।

4. कर्म और कर्तव्य के प्रति निष्ठा

यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में व्यक्तिगत भावनाओं और कर्तव्यों में संघर्ष होने पर विवेक का मार्ग अपनाना चाहिए तथा अपने धर्म का पालन करना चाहिए।

5. आत्म-विश्लेषण की क्षमता

अर्जुन की तरह अपनी कमजोरियों और भावनाओं को पहचानकर उनका विश्लेषण करने की शक्ति मिलती है, जिससे अहंकार का शमन होता है।

6. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

पवित्र शास्त्रों के अध्ययन और पाठ से पिछले कर्मों के नकारात्मक प्रभाव क्षीण होते हैं और चित्त की शुद्धि होती है, जिससे भक्ति मार्ग प्रशस्त होता है।

7. गुरुजनों के प्रति आदर भाव

श्लोक में आचार्यों और पितामहों का स्मरण यह सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने से बड़ों और गुरुओं के प्रति सम्मान कम नहीं होना चाहिए।

8. ईश्वर की शरण में जाने की प्रेरणा

जब मनुष्य अपने सभी मानवीय प्रयासों और संबंधों को संकट में देखता है, तभी वह भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाने के लिए प्रेरित होता है, जो गीता का मुख्य उद्देश्य है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, महर्षि वेदव्यास रचित श्रीमद्भागवद्गीता, महाभारत के भीष्म पर्व तथा विभिन्न प्रामाणिक आचार्यों एवं भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी विवेकानंद जी के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी धार्मिक, पौराणिक और दार्शनिक सामग्री पहुंचे, वह वेदों, पुराणों और ऐतिहासिक ग्रंथों की कसौटी पर खरी उतरे।

यह सामग्री शोधित, परिष्कृत और संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आती है, जिसका मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर सनातन संस्कृति का सटीक, सरल और उपयोगी ज्ञान प्रसारित करना है। यदि आपके पास इस विषय से संबंधित कोई भी सुझाव या प्रश्न है, तो आप Bhaktilok.in के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक का मुख्य केंद्रीय भाव अर्जुन के मन में उत्पन्न उस भारी मोह, करुणा और पारिवारिक ममता को दर्शाना है, जो उसने कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अपने गुरुओं, कुल के बुजुर्गों, भाइयों और मित्रों को शत्रु पक्ष में देखकर महसूस किया था। यह मनुष्य की उस आंतरिक दुविधा का प्रतीक है जो कर्तव्य और मोह के बीच फंस जाती है।

उत्तर: 'पार्थ' शब्द अर्जुन के लिए प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ है 'प्रथा (कुंती) का पुत्र'। इस संदर्भ में इस संबोधन का विशेष महत्व है क्योंकि कुंती के पुत्र होने के नाते अर्जुन राजवंश के संस्कारों, पारिवारिक मूल्यों और मर्यादाओं से बंधा हुआ था, जो उसकी करुणा और मोह को और अधिक प्रगाढ़ कर देते हैं।

उत्तर: आध्यात्मिक दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण ने आगे चलकर इस विषाद को 'क्लैब्यम्' (कायरता और हृदय की दुर्बलता) कहा है। यह तात्कालिक रूप से मानवीय संवेदना के कारण स्वाभाविक लग सकता है, परंतु धर्म की रक्षा और आक्रांता अधर्मियों के विरुद्ध युद्ध करने वाले क्षत्रिय के लिए यह कर्तव्यच्युत होने का कारण बन रहा था, जिसे दूर करने के लिए ही गीता का ज्ञान दिया गया।

उत्तर: आधुनिक जीवन में हम सभी कभी-न-कभी पारिवारिक संबंधों, पेशेवर जिम्मेदारियों (Career) और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के बीच संघर्ष का सामना करते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन के कठिन मोड़ों पर जब अपने और कर्तव्य के बीच चयन करना पड़े, तो भावनाओं में बहने के बजाय अपने उच्च बौद्धिक और नैतिक कर्तव्यों (धर्म) को प्राथमिकता देनी चाहिए।

उत्तर: गीता के प्रथम अध्याय में मानव मन की सभी दुविधाओं, कमजोरियों और विकारों का यथाचित चित्रण किया गया है। जब साधक इसे पढ़ता है, तो उसे यह अहसास होता है कि उसकी समस्याएं या मानसिक उथल-पुथल अकेली नहीं है, बल्कि यह सनातन मानव स्वभाव का हिस्सा है। इसके बाद जब वह भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों की ओर बढ़ता है, तो उसे मानसिक शांति और उचित मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

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पारिवारिक संबंध / Family Bonds

अर्जुन ने देखा कि उनके अपने लोग ही दोनों ओर खड़े हैं – यही उनके विषाद का मूल कारण बना। Arjuna realized that his own kinsmen stood on both sides – this was the root of his despondency.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 26 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 26/47 55% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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