श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 36

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 41 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन | पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ||३६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
निहत्य
मारकर
धार्तराष्ट्रान्
धृतराष्ट्र के पुत्रों को
नः
हमें
का
क्या
प्रीतिः
प्रसन्नता
स्यात्
होगी
जनार्दन
हे जनार्दन (कृष्ण)
पापम्
पाप
एव
ही
आश्रयेत्
प्राप्त होगा
अस्मान्
हमें
हत्वा
मारकर
एतान्
इन
आततायिनः
आततायियों को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने पर भी हमें पाप ही लगेगा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्याय 1, श्लोक 36: समग्र आध्यात्मिक एवं ब्रह्मांडीय परिचय

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु समस्त उपनिषदों का सार और मानव जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कराने वाला दिव्य मार्गदर्शक माना गया है। महाभारत के युद्ध के ठीक पूर्व, कुरुक्षेत्र के पवित्र प्रांगण में जब कौरव और पाण्डव सेनाएं आमने-सामने थीं, तब हताश और मोहग्रस्त अर्जुन के मन में जो अंतर्द्वंद उत्पन्न हुआ, वह संपूर्ण मानवता के लिए एक शाश्वत प्रश्नचिह्न बन गया। अर्जुन का यह कथन—"निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन..."—केवल दो पक्षों के बीच युद्ध की असमंजस स्थिति को नहीं दर्शाता, बल्कि यह उस सूक्ष्म मानसिक और नैतिक संकट का प्रतीक है जो हर उस व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी अवश्य आता है जिसे अपने ही प्रियजनों के विरुद्ध धर्म और न्याय की रक्षा के लिए खड़ा होना पड़ता है।

यहाँ अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को 'जनार्दन' कहकर संबोधित करते हैं। जनार्दन का अर्थ है—वह जो समस्त जन (यदुवंशियों, भक्तों या संसार के समस्त प्राणियों) के आराध्य हैं और दुष्टों को पीड़ा देने वाले या उनका दमन करने वाले हैं। अर्जुन का यह संबोधन एक आंतरिक पुकार है कि हे संपूर्ण जगत के नियंता! आप ही विचार कीजिए कि यदि हम धृतराष्ट्र के पुत्रों रूपी अपने ही स्वजनों का वध कर देते हैं, तो हमें कौन सी प्रसन्नता या आत्मिक शांति प्राप्त होगी? इसके विपरीत, यदि हम इन आततायी (अत्याचारी) आक्रमणकारियों का वध भी कर दें, तो हमारे ऊपर केवल और केवल पाप का ही भार आएगा। यह श्लोक कर्तव्य, मोह, हिंसा, अहिंसा, कुल-धर्म और व्यक्तिगत स्नेह के बीच के उस अति सूक्ष्म अंतर को उजागर करता है, जिसका समाधान आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग के रूप में प्रदान किया।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि सांसारिक संबंधों का मोह मनुष्य की बुद्धि को किस प्रकार कुंठित कर देता है। जहाँ एक ओर कौरव पक्ष ने अधर्म, अन्याय, छल और अनाचार की सभी सीमाओं को लांघ दिया था, वहीं दूसरी ओर अर्जुन अपने पारिवारिक बंधनों (गुरुओं, भाइयों, कुलजनों) के प्रति अगाध मोह के कारण अपने क्षत्रिय धर्म से विमुख होते हुए दिखाई देते हैं। इस आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक का पद-दर-पद विश्लेषण, इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि, इसके नियमित चिंतन से मिलने वाले मानसिक व आध्यात्मिक लाभ और इससे जुड़े समस्त पहलुओं का गंभीर अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन。
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥३६॥

"हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा।"

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
निहत्य मारकर, वध करके युद्धभूमि में शत्रुओं या स्वजनों का भौतिक शरीर समाप्त करना।
धार्तराष्ट्रान् धृतराष्ट्र के पुत्रों को (दुर्योधन आदि कौरवों को) वे लोग जो सांसारिक मोह, अंधापन और अधिकार की लालसा में अंधे हो चुके हैं।
नः हमको (पाण्डवों को) धर्म के पक्ष में खड़े वे लोग जो सत्य का मार्ग चुन रहे हैं किंतु मानवीय भावनाओं से ग्रसित हैं।
का कौन सी / क्या पूर्ण रूप से असंतुष्टि और निरर्थकता का भाव प्रकट करना।
प्रीतिः प्रसन्नता, सुख, प्रेम या संतोष स्वजनों के रक्त से प्राप्त होने वाला तथाकथित विजय का सुख जो अंततः शोक में बदलता है।
स्यात् होगी संभावना का खंडन करते हुए निश्चित रूप से सुख न मिलने की बात कहना।
जनार्दन हे जनार्दन (श्रीकृष्ण का संबोधन, जो सबको भरण-पोषण करते हैं और दुष्टों का नाश करते हैं) अर्जुन का भगवान को उनके उस रूप में स्मरण करना जो भक्तों के संकट हरते हैं और ब्रह्मांड के पालक हैं।
पापम् पाप, अधर्म का फल, दोष विहित कर्मों के विपरीत आचरण करने से उत्पन्न होने वाला कर्म बंधन।
एव ही (निश्चित रूप से) किसी अन्य विकल्प की संभावना को समाप्त कर केवल पाप के भागी बनने का दृढ़ विचार।
आश्रयेत् आश्रय लेगा / प्राप्त होगा पाप का हमारे जीवन में स्थायी रूप से स्थापित हो जाना।
अस्मान् हमको पाण्डव पक्ष और विशेषकर युद्ध लड़ने वाले योद्धाओं को।
हत्वा मारकर, वध करने पर भी युद्ध के नियमों के अंतर्गत भी हिंसा करने का आंतरिक अपराध बोध।
एतान् इन सामने खड़े परिचित व्यक्तियों, आचार्यों, भाइयों और संबंधियों को।
आततायिनः आततायी (अत्याचारी, जहर देने वाला, घर में आग लगाने वाला, धन लूटने वाला, स्त्री का अपहरण करने वाला या प्राण लेने वाला) शास्त्रानुसार वे आक्रामक व्यक्ति जिनका वध बिना किसी पाप के दंडनीय नहीं माना जाता, फिर भी मोहवश अर्जुन उन्हें अपना मान रहे हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के 'भीष्म पर्व' के अंतर्गत आती है, जहाँ महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित इस महाकाव्य का यह अत्यंत मार्मिक हिस्सा है। कौरवों और पाण्डवों के बीच हुए चौदह वर्षों के वनवास, अज्ञातवास और उसके उपरांत शांति के सभी प्रयासों (विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण के शांति दूत के रूप में हस्तिनापुर जाने और दुर्योधन द्वारा 'सुई की नोक के बराबर भी भूमि न देने' के प्रण) के बाद युद्ध अनिवार्य हो गया था। पाण्डवों ने धर्म की रक्षा के लिए और छीने गए राज्य के अधिकार के लिए युद्ध का शंखनाद किया था।

जब युद्ध का आरंभ होने ही वाला था, तब अर्जुन ने अपने सारथि बने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि वे उनके रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा करें। रथ के मध्य में पहुँचते ही अर्जुन ने देखा कि सामने खड़े लोगों में उनके दादा भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, मामा शल्य, भाई दुर्योधन, दुःशासन और अन्य तमाम स्नेहीजन खड़े हैं। इस दृश्य को देखते ही अर्जुन का गांडीव धनुष उनके हाथों से फिसलने लगा। उनके शरीर में कंपकंपी छूटने लगी और उनके मन में यह विचार आया कि जिस राज्य को प्राप्त करने के लिए कुल का नाश करना पड़े, गुरुओं का वध करना पड़े, वह राज्य किस काम का?

विशेष रूप से यहाँ शब्द आया है—'आततायिनः' (आततायी)। सनातन शास्त्रों (विशेष रूप से मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों) में आततायी की परिभाषा बहुत स्पष्ट है। जो व्यक्ति अग्नि लगाने वाला, विष देने वाला, हाथ में शस्त्र लेकर मारने के लिए दौड़ने वाला, धन का अपहरण करने वाला, खेत की भूमि हड़पने वाला तथा पराई स्त्री का अपहरण करने वाला हो—वह 'आततायी' कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार, आततायी का वध करने पर कोई पाप नहीं लगता, क्योंकि वे समाज के लिए असाध्य रोग की तरह होते हैं। दुर्योधन और उसके सहयोगी इन सभी श्रेणियों में आते थे क्योंकि उन्होंने पाण्डवों को विष देने, लाक्षागृह में जलाने और द्रौपदी का चीरहरण करने जैसे कुकृत्य किए थे।

इसके बावजूद, मोह के आवरण में लिपटे अर्जुन अपने ही ज्ञान और शास्त्रार्थ को भूल जाते हैं। वे आततायियों को भी अपना स्वजन मानकर उनके वध को पाप मान बैठते हैं। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जब तक मनुष्य अज्ञान और मोह के अंधकार में रहता है, तब तक उसे अपने कर्तव्य (धर्म) और अधर्म के बीच का सूक्ष्म भेद समझ में नहीं आता। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी अज्ञान को दूर करने के लिए अर्जुन को गीता का अमर ज्ञान दिया।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक में ब्रह्मांडीय ऊर्जा और उच्च कोटि का दार्शनिक ज्ञान समाहित है। इस श्लोक के नियमित पाठ और मनन से निम्नलिखित आध्यात्मिक एवं मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

१
मानसिक संशय और भ्रम का निवारण

जीवन में जब भी कभी निर्णय लेने में दुविधा या असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो, तो इस श्लोक का चिंतन मन को स्पष्टता प्रदान करता है।

२
अनावश्यक मोह और आसक्ति से मुक्ति

यह श्लोक सिखाता है कि अत्यधिक मोह किस प्रकार व्यक्ति की बुद्धि को भ्रमित कर सकता है, जिससे मोह जनित दुखों से मुक्ति मिलती है।

३
कर्तव्यपरायणता की प्रेरणा

व्यक्ति अपने निजी भावनाओं से ऊपर उठकर अपने वास्तविक सामाजिक और नैतिक कर्तव्यों (धर्म) का पालन करना सीखता है।

४
नकारात्मक कर्मों और पापबोध से शुद्धि

शास्त्रों के सही ज्ञान से मनुष्य को यह समझ में आता है कि धर्म की रक्षा के लिए उठाया गया कदम पाप नहीं, बल्कि पुण्य है।

५
आंतरिक शांति और स्थिरता

भगवद्गीता के अध्ययन से चित्त की वृत्तियां शांत होती हैं और जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी मन स्थिर रहता है।

६
ईश्वरीय शरणागति की भावना

भगवान श्रीकृष्ण को 'जनार्दन' रूप में याद करने से भक्त के भीतर भगवान के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण का भाव जागृत होता है।

७
नैतिक साहस का विकास

अधर्म के खिलाफ आवाज उठाने और सत्य के मार्ग पर अकेले चलने का नैतिक साहस प्राप्त होता है।

८
सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विस्तार

वैदिक मंत्रों और श्लोकों के नियमित उच्चारण से मानसिक तनाव कम होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)

यह आलेख Bhaktilok.in के उच्च संपादकीय मानकों के तहत तैयार किया गया है। प्रस्तुत सामग्री को महर्षि वेद व्यास रचित 'महाभारत' के 'भीष्म पर्व' तथा आदि शंकराचार्य एवं स्वामी रामानुजचार्य द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों के संदर्भों के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को अत्यंत सरल, स्पष्ट और शास्त्रीय शुद्धता के साथ उपलब्ध कराना है, ताकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी लोग अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े रहें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'जनार्दन' शब्द का अर्थ है—वह जो समस्त संसार के प्राणियों का भरण-पोषण करते हैं, भक्तों के संकट दूर करते हैं और दुष्टों तथा अधमियों को ताड़ना (दंड) देते हैं। अर्जुन इस संबोधन के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण को यह याद दिला रहे हैं कि आप समस्त संसार के पालक और न्यायकर्ता हैं, अतः आप ही विचार करें कि स्वजनों के वध से मिलने वाला अधर्म और पाप हमारे लिए कितना विनाशकारी होगा।

शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति जहर देने वाला, घर में आग लगाने वाला, घातक हथियार लेकर मारने दौड़ने वाला, धन लूटने वाला, भूमि हड़पने वाला और पराई स्त्री का अपहरण करने वाला हो, वह 'आततायी' कहलाता है। सनातन धर्मशास्त्रों के अनुसार आततायी का वध करने पर कोई पाप नहीं लगता क्योंकि वे समाज के लिए असाध्य आक्रामक होते हैं। हालांकि, अर्जुन मोहवश दुर्योधन आदि को भी अपना स्वजन मानकर इस नियम को भूल रहे थे।

कदापि नहीं। यह श्लोक अर्जुन के उस तात्कालिक मानसिक मोह और विलाप को दर्शाता है जो युद्ध के आरंभ में उत्पन्न हुआ था। आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस भ्रम को तोड़ा और उन्हें समझाया कि धर्म, न्याय और सत्य की रक्षा के लिए अधर्मियों के विरुद्ध युद्ध करना प्रत्येक क्षत्रिय का परम कर्तव्य है। कर्म से पलायन करना धर्म नहीं है।

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय (जिसे 'अर्जुनविषादयोग' कहा जाता है) मानव मन के वास्तविक धरातल को प्रस्तुत करता है। जब तक मनुष्य अपने जीवन के संशय, मोह, भय और कमियों को स्वीकार नहीं करता, तब तक उसे गीता के ज्ञान (कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग) की आवश्यकता महसूस नहीं होती। यह अध्याय हमें हमारे आंतरिक अंधकार से परिचित कराता है ताकि हम प्रकाश की ओर बढ़ सकें।

दैनिक जीवन में जब भी हम पारिवारिक मोह, पक्षपात या अनुचित संबंधों के कारण अपने कर्तव्य से विमुख होने लगें, तब हमें इस श्लोक का स्मरण करना चाहिए। यह हमें सिखाता है कि न्याय और सत्य का साथ देते समय व्यक्तिगत मोह या भावनाओं को बीच में नहीं लाना चाहिए तथा अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ करना चाहिए।

© Bhaktilok.in | सर्वाधिकार सुरक्षित। प्रस्तुत आलेख वेदोपनिषद एवं श्रीमद्भगवद्गीता के पावन संदेशों पर आधारित है।

पाप का भय / Fear of Sin

अर्जुन को लगता है कि युद्ध में संबंधियों को मारना पाप है, चाहे वे आततायी ही क्यों न हों। Arjuna feels that killing relatives, even if they are aggressors, is sinful.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 36 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 36/47 77% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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