मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन | अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ||३५||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदएतान्
इनको
न
नहीं
हन्तुम्
मारने की
इच्छामि
इच्छा करता हूँ
घ्नतः
मारे जाने पर भी
अपि
भी
मधुसूदन
हे मधुसूदन (कृष्ण)
अपि
भले ही
त्रैलोक्यराज्यस्य
तीनों लोकों के राज्य के
हेतोः
लिए
किम् नु
क्या कहना
महीकृते
पृथ्वी के लिए।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे मधुसूदन! मैं इन्हें मारना नहीं चाहता, चाहे ये मुझे ही क्यों न मारें, तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, तो फिर पृथ्वी के लिए तो क्या कहना?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक जगत में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ मात्र नहीं, बल्कि साक्षात मोक्षदायिनी भगवती गंगा के समान माना गया है, जो मानव मात्र के अंतःकरण के अज्ञान रूपी अंधकार को पूर्णतः मिटाकर ज्ञान का दिव्य प्रकाश फैलाती है। महाभारत के कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब धर्मसंकट में पड़े अर्जुन का विषाद केवल एक व्यक्तिगत या पारिवारिक मोह नहीं था, बल्कि यह समस्त मानवता की उस आंतरिक उधेड़बुन का प्रतीक है जो जीवन के हर मोड़ पर कर्तव्य और भावनाओं के बीच उत्पन्न होती है।
'एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन...' यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) का 35वां श्लोक है, जो अर्जुन की उस मानसिक अवस्था को दर्शाता है जहाँ भौतिक सुख, ऐश्वर्य, और यहाँ तक कि तीनों लोकों (स्वर्ग, पाताल और मृत्युलोक) का साम्राज्य भी उनके लिए अपने गुरुओं, स्वजनों और प्रियजनों के रक्त से सने सिंहासन के आगे अत्यंत तुच्छ और अर्थहीन प्रतीत होता है। इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी करुणा, अहिंसा और पारिवारिक ममत्व को सर्वोपरि रखते हुए युद्ध से स्पष्ट इनकार कर देते हैं।
भक्तिकुल.इन (Bhaktilok.in) के हमारे इस विशेष अध्ययन में, हम इस अद्वितीय श्लोक के शाब्दिक अर्थ, संस्कृत व्याकरण, दार्शनिक गहराई, पौराणिक पृष्ठभूमि और इसके माध्यम से मिलने वाले शाश्वत जीवन संदेशों का अति सूक्ष्म और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर रहे हैं। यह मार्गदर्शिका आपको न केवल गीता के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराएगी, बल्कि आपके दैनिक जीवन के तमाम नैतिक संकटों में आंतरिक शांति और उचित निर्णय लेने की शक्ति भी प्रदान करेगी।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥३५॥
संस्कृत पदच्छेद (Sanskrit Padachheda):
एतान् न हन्तुम् इच्छामि घ्नतः अपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्य-राज्यस्य हेतोः किम् नु महीकृते ॥
श्लोक गायन एवं पठन विधि (Recitation Method):
इस श्लोक का पाठ शांत चित्त से, प्रातःकाल स्नान के पश्चात या संध्यावंदन के समय करना अत्यंत फलदायी होता है। इसका उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। मन में यह भाव रखें कि अर्जुन की तरह हमारे जीवन में भी मोह का शमन केवल भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाने से ही संभव है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का शाब्दिक अर्थ और उसका विस्तृत आध्यात्मिक विश्लेषण नीचे सारणीबद्ध रूप में प्रस्तुत है:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
श्रीमद्भगवद्गीता के प्रणेता महर्षि वेद व्यास हैं, जिन्होंने महाभारत महाकाव्य के भीतर इस दिव्य संवाद को संकलित किया है। कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध का शंख बज चुका था। दोनों ओर की सेनाएं व्यूह रचना कर चुकी थीं। ऐसे रोमांचक और तनावपूर्ण क्षण में पांडव सेना के मुख्य सेनापति और महान धनुर्धर अर्जुन ने अपने सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि वे उनके रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलें, ताकि वे देख सकें कि युद्ध करने के लिए कौन-कौन से योद्धा उपस्थित हुए हैं।
जब अर्जुन ने सामने खड़े सेना समूहों पर दृष्टि डाली, तो उन्होंने पाया कि वहां उनके अपने ही गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, कृपाचार्य, मामा शल्य, भाई दुर्योधन, और अन्य प्रियजन खड़े हैं। इस दृश्य को देखते ही अर्जुन का महान गांडीव धनुष उनके हाथों से फिसलने लगा। उनके शरीर में कंपकंपी छूटने लगी, त्वचा जलने लगी और उनका मन गहरे विषाद से भर गया। उनके भीतर का यह श्लोक 'एतान्न हन्तुमिच्छामि...' उसी महा-विषाद की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है।
पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह प्रसंग केवल दो पक्षों के बीच के युद्ध का नहीं, बल्कि मानव चेतना का शाश्वत संघर्ष है। जब-जब मनुष्य अपने जीवन में कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान अपने व्यक्तिगत मोह, राग और विराग के जाल में फंस जाता है, तब वह अर्जुन की तरह ही किंकर्तव्यमूढ़ हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उपयोग समस्त मानव जाति को यह सिखाने के लिए किया कि धर्म की स्थापना के लिए व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर निष्काम कर्म करना ही मनुष्य का परम कर्तव्य है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)
श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक और इसके मर्म को अपने जीवन में उतारने से निम्नलिखित अप्रतिम आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
1. मानसिक शांति एवं एकाग्रता
श्लोक के नियमित पठन और मनन से मस्तिष्क की उथल-पुथल शांत होती है और ध्यान लगाने की क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
2. अहंकार और मोह का शमन
यह श्लोक मनुष्य को यह सिखाता है कि भौतिक सुख और तीनों लोकों का राज्य भी आंतरिक शांति और धर्म से बढ़कर नहीं है, जिससे मोह कम होता है।
3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार
संस्कृत के इन पवित्र श्लोकों के उच्चारण से घर और आसपास के वातावरण में सकारात्मक और दैवीय ऊर्जा का संचार होता है।
4. कर्म योग की प्रेरणा
यह साधक को उसके जीवन के कठिन निर्णयों में सही दिशा देखने और बिना फल की आसक्ति के अपने कर्तव्यों का पालन करने की शक्ति देता है.
5. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)
दिव्य वचनों का पठन और स्मरण पिछले संचित नकारात्मक कर्मों के बंधनों को ढीला करने में सहायक माना गया है।
6. भगवान श्रीकृष्ण की कृपा
मधुसूदन को स्मरण करने से साधक के जीवन में आने वाले दुखों और बाधाओं का नाश होता है और ईश्वर की अतुनीय कृपा प्राप्त होती है।
7. नैतिक और चारित्रिक विकास
करुणा, क्षमा और न्याय के उच्च नैतिक मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा मिलती है।
8. भय और अवसाद से मुक्ति
जीवन की अनिश्चितताओं और असफलताओं के भय से जूझ रहे व्यक्तियों को यह श्लोक आंतरिक संबल और स्थिरता प्रदान करता है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलok.in (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों जैसे महर्षि वेद व्यास रचित 'महाभारत' एवं 'श्रीमद्भगवद्गीता (प्रथमोऽध्याय - अर्जुनविषादयोग)' के प्रामाणिक संस्करणों पर आधारित है। हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और आध्यात्मिक शोधकर्ताओं ने इस सामग्री को अत्यधिक सटीकता, व्याकरणिक शुद्धता और तार्किक गहराई के साथ तैयार किया है ताकि हमारे पाठकों को वेदों, उपनिषदों और पुराणों का वास्तविक और मिलावट-रहित ज्ञान प्राप्त हो सके। हमारा उद्देश्य आधुनिक जीवनशैली से जूझ रहे साधकों को प्राचीन भारतीय दर्शन से जोड़ना और उन्हें मानसिक व आध्यात्मिक शांति के मार्ग पर अग्रसर करना है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)
अटल निश्चय / Firm Resolution
अर्जुन ने अब युद्ध न करने का अटल निश्चय कर लिया है। Arjuna has now firmly resolved not to fight.