मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच | परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् | पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् || १२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदअर्जुन उवाच
अर्जुन बोले
परम्
परम
ब्रह्म
ब्रह्म
परम्
परम
धाम
धाम
पवित्रम्
पवित्र
परमम्
परम
भवान्
आप
पुरुषम्
पुरुष
शाश्वतम्
शाश्वत
दिव्यम्
दिव्य
आदि-देवम्
आदिदेव
अजम्
अजन्मा
विभुम्
विभु (सर्वव्यापी)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अर्जुन बोले: आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं, शाश्वत दिव्य पुरुष हैं, आदिदेव हैं, अजन्मा हैं और सर्वव्यापी हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
After hearing Krishna's descriptions of His glories, Arjuna responds with profound reverence. He acknowledges Krishna as the Supreme Brahman — the ultimate reality itself. This is a significant declaration where Arjuna, as a devotee, affirms Krishna's divinity using the highest philosophical terms from the Vedas and Upanishads.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहते हैं: "आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं, शाश्वत दिव्य पुरुष हैं, आदिदेव हैं, अजन्मा हैं और सर्वव्यापी हैं।"
Arjuna, overwhelmed by Krishna's revelations, responds with deep reverence. He uses the most exalted philosophical terms to describe Krishna, acknowledging Him not just as a friend or teacher but as the Supreme Reality itself — the source and foundation of all existence.