श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 15

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 3 मिनट का पठन 107 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम | भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते || १५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
स्वयम्
स्वयं
एव
ही
आत्मना
अपने से
आत्मानम्
अपने को
वेत्थ
जानते हो
त्वम्
आप
पुरुषोत्तम
हे पुरुषोत्तम
भूत-भावन
हे भूतों को उत्पन्न करने वाले
भूतेश
हे भूतों के ईश्वर
देवदेव
हे देवों के देव
जगत्-पते
हे जगत के स्वामी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने आप को अपने से जानते हैं। हे भूतभावन! हे भूतेश! हे देवदेव! हे जगत्पते!

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Arjuna addresses Krishna with multiple exalted titles, acknowledging His supreme position. He recognizes that only Krishna Himself can fully know His own divine nature. This verse beautifully expresses the transcendence of the Lord — He is self-luminous and self-knowing.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं: "हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने आप को अपने से जानते हैं। हे भूतभावन! हे भूतेश! हे देवदेव! हे जगत्पते!"

Arjuna acknowledges the transcendence of the Lord — He is self-knowing and self-luminous. No external agency can comprehend His divine nature; it is known only to Himself and revealed by His grace.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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