मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् | केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया || १७||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदकथम्
कैसे
विद्याम्
जानूँ
अहम्
मैं
योगिन्
हे योगिन्
त्वाम्
आपको
सदा
सदा
परिचिन्तयन्
चिन्तन करता हुआ
केषु केषु
किन-किन
च
और
भावेषु
भावों में
चिन्त्य
चिन्तन करने योग्य
असि
हैं
भगवन्
हे भगवन्
मया
मेरे द्वारा।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे योगिन्! मैं निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको कैसे जानूँ? हे भगवन्! मेरे द्वारा किन-किन भावों में आप चिन्तन करने योग्य हैं?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Arjuna asks the practical question: how can he constantly meditate on Krishna? He seeks specific forms and aspects through which the Lord can be contemplated. This shows Arjuna's sincere desire for constant remembrance and devotion.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अर्जुन प्रश्न करते हैं: "हे योगिन्! मैं निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको कैसे जानूँ? हे भगवन्! मेरे द्वारा किन-किन भावों में आप चिन्तन करने योग्य हैं?"
Arjuna seeks practical guidance for meditation. Having heard of Krishna's divine glories, he wants to know the specific forms and aspects through which he can constantly remember and contemplate the Lord.