श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 18

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 3 मिनट का पठन 103 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन | भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् || १८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
विस्तरेण
विस्तार से
आत्मन
अपने
योगम्
योग को
विभूतिम्
विभूति को
च
और
जनार्दन
हे जनार्दन
भूय
फिर से
कथय
कहिए
तृप्ति
तृप्ति
हि
ही
शृण्वत
सुनते हुए
न अस्ति
नहीं है
मे
मेरी
अमृतम्
अमृत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे जनार्दन! अपने योग और विभूति को विस्तार से फिर कहिए। आपके इस अमृतमय वचन को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Arjuna expresses his insatiable thirst for hearing about Krishna's divine glories. He compares Krishna's words to nectar (amrita) — the more he drinks, the more he wants. This verse beautifully illustrates the devotee's eternal hunger for divine knowledge.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं: "हे जनार्दन! अपने योग और विभूति को विस्तार से फिर कहिए। आपके इस अमृतमय वचन को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।"

Arjuna's devotion is evident in his endless desire to hear about the Lord. Spiritual nectar, unlike material pleasure, never satiates but only increases the longing for more.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
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श्लोक 18/42 43% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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