मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः | प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे || १९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदश्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवान् बोले
हन्त
अच्छा
ते
तुमसे
कथयिष्यामि
कहूँगा
दिव्या
दिव्य
हि
ही
आत्म-विभूतय
अपनी विभूतियाँ
प्राधान्यतः
प्रधान रूप से
कुरु-श्रेष्ठ
हे कुरुश्रेष्ठ
न अस्ति
नहीं है
अन्त
अंत
विस्तरस्य
विस्तार का
मे
मेरा।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: हे कुरुश्रेष्ठ! अच्छा, अब मैं तुमसे अपनी प्रधान दिव्य विभूतियाँ कहूँगा, क्योंकि मेरे विभूतियों के विस्तार का अन्त नहीं है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna responds positively to Arjuna's request. He agrees to describe His divine glories, but with the caveat that only the prominent ones can be mentioned, as His manifestations are endless. This humility in the face of infinity is characteristic of divine revelation.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
श्रीभगवान् ने कहा: "हे कुरुश्रेष्ठ! अच्छा, अब मैं तुमसे अपनी प्रधान दिव्य विभूतियाँ कहूँगा, क्योंकि मेरे विभूतियों के विस्तार का अन्त नहीं है।"
The Lord graciously accepts Arjuna's request but humbly notes that His glories are infinite and cannot be fully described. He will, however, mention the most prominent manifestations for Arjuna's meditation and devotion.