मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् | सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः || २४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदपुरोधसाम्
पुरोहितों में
च
और
मुख्यम्
मुख्य
माम्
मुझे
विद्धि
जानो
पार्थ
हे पार्थ
बृहस्पतिम्
बृहस्पति
सेनानीनाम्
सेनापतियों में
अहम्
मैं
स्कन्द
कार्तिकेय
सरसाम्
जलाशयों में
अस्मि
हूँ
सागर
सागर।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! पुरोहितों में मुझे मुख्य पुरोहित बृहस्पति जानो; सेनापतियों में मैं स्कन्द (कार्तिकेय) हूँ, और जलाशयों में मैं सागर हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna reveals His manifestations in positions of leadership and vastness: among priests (royal advisors), He is Brihaspati (guru of the gods); among military commanders, He is Skanda (Kartikeya); among bodies of water, He is the ocean — the greatest and most expansive.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: "हे पार्थ! पुरोहितों में मुझे मुख्य पुरोहित बृहस्पति जानो; सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ, और जलाशयों में मैं सागर हूँ।"
The Lord identifies with the foremost in each category — the wisest counselor, the mightiest general, and the vastest body of water.