मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् | यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः || २५||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदमहर्षीणाम्
महर्षियों में
भृगु
भृगु
अहम्
मैं
गिराम्
वाणियों में
अस्मि
हूँ
एकम् अक्षरम्
एक अक्षर (ॐ)
यज्ञानाम्
यज्ञों में
जप-यज्ञ
जपयज्ञ
अस्मि
हूँ
स्थावराणाम्
स्थिर रहने वालों (पर्वतों) में
हिमालय
हिमालय।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणियों में मैं एक अक्षर (ॐ) हूँ, यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ, और स्थावरों (पर्वतों) में मैं हिमालय हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna continues: among the great sages, He is Bhrigu; among forms of speech, He is the sacred syllable Om; among sacrifices, He is japa (silent meditation/chanting); among immovable things, He is the Himalayas — the greatest and most revered mountain range.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: "महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणियों में मैं एक अक्षर (ॐ) हूँ, यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ, और स्थावरों में मैं हिमालय हूँ।"
The Lord identifies with the essence of spiritual practice — the sage who compiled laws, the primordial sound Om, the internal sacrifice of meditation, and the most majestic mountains.