मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् | पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् || २९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदअनन्त
अनंत (शेषनाग)
च
और
अस्मि
हूँ
नागानाम्
नागों में
वरुण
वरुण
यादसाम्
जलचर प्राणियों में
अहम्
मैं
पितॄणाम्
पितरों में
अर्यमा
अर्यमा
च
और
अस्मि
हूँ
यम
यम
संयमताम्
नियन्ताओं में
अहम्
मैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
नागों में मैं अनन्त (शेषनाग) हूँ, जलचरों में मैं वरुण हूँ, पितरों में मैं अर्यमा हूँ, और नियन्ताओं में मैं यम हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna continues His enumeration: among the Nagas (serpent deities), He is Ananta (the cosmic serpent on whom Vishnu rests); among aquatic beings, He is Varuna (god of waters); among the Pitris (ancestral spirits), He is Aryama; among those who enforce law and order, He is Yama (lord of death and justice).
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: "नागों में मैं अनन्त हूँ, जलचरों में मैं वरुण हूँ, पितरों में मैं अर्यमा हूँ, और नियन्ताओं में मैं यम हूँ।"
The Lord identifies with the presiding deities of various realms — the cosmic serpent who supports the universe, the lord of waters, the chief of ancestors, and the dispenser of justice after death.