मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन | अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् || ३२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदसर्गाणाम्
सृष्टियों में
आदि
आदि
अन्त
अन्त
च
और
मध्यम्
मध्य
च
और
एव
ही
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन
अध्यात्म-विद्या
आध्यात्मिक विद्या
विद्यानाम्
विद्याओं में
वाद
तर्क
प्रवदताम्
वाद-विवाद करने वालों में
अहम्
मैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे अर्जुन! सृष्टियों में मैं आदि, अन्त और मध्य हूँ; विद्याओं में मैं अध्यात्मविद्या हूँ, और वाद-विवाद करने वालों में मैं निर्णायक सत्य हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna reveals His all-pervasiveness: He is the beginning, middle, and end of all creations. Among all branches of knowledge, He is the science of the Self (Adhyatma Vidya) — the highest knowledge. Among logicians and debaters, He is the conclusive truth that resolves all arguments.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: "हे अर्जुन! सृष्टियों में मैं आदि, अन्त और मध्य हूँ; विद्याओं में मैं अध्यात्मविद्या हूँ, और वाद-विवाद करने वालों में मैं निर्णायक सत्य हूँ।"
The Lord reveals His comprehensive presence — He is the source, sustainer, and dissolution of all creation; He is the highest knowledge of the Self; and He is the ultimate truth that resolves all philosophical debates.