मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् | कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा || ३४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदमृत्यु
मृत्यु
सर्व-हर
सबका हरण करने वाला
च
और
अहम्
मैं
उद्भव
उत्पत्ति
च
और
भविष्यताम्
भविष्य में होने वालों की
कीर्ति
कीर्ति
श्री
श्री (लक्ष्मी)
वाक्
वाणी
च
और
नारीणाम्
स्त्रियों में
स्मृति
स्मृति
मेधा
मेधा
धृति
धृति
क्षमा
क्षमा।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं सर्वहारी मृत्यु हूँ और भविष्य में होने वाले पदार्थों का उद्भव भी हूँ; स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna reveals His presence in both destructive and creative aspects: as death (which consumes all) and as the origin of all future beings. Among feminine qualities, He identifies with seven virtues: fame (kirti), prosperity (shri), speech (vak), memory (smriti), intelligence (medha), steadfastness (dhriti), and forgiveness (kshama).
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: "मैं सर्वहारी मृत्यु हूँ और भविष्य में होने वाले पदार्थों का उद्भव भी हूँ; स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।"
The Lord encompasses both ends of existence — the destroyer and the creator. He also manifests as the most cherished feminine virtues, showing His presence in the qualities that ennoble human life.