मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् | मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः || ३५||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदबृहत्-साम
बृहत्साम
तथा
भी
साम्नाम्
सामवेद के गीतों में
गायत्री
गायत्री
छन्दसाम्
छन्दों में
अहम्
मैं
मासानाम्
महीनों में
मार्गशीर्ष
मार्गशीर्ष (अगहन)
अहम्
मैं
ऋतूनाम्
ऋतुओं में
कुसुमाकर
वसन्त ऋतु।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
सामवेद के गीतों में मैं बृहत्साम हूँ, छन्दों में मैं गायत्री हूँ, महीनों में मैं मार्गशीर्ष (अगहन) हूँ, और ऋतुओं में मैं वसन्त ऋतु हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna identifies with the most sacred and beautiful: among Sama Veda hymns, He is the great Brihat-sama; among poetic meters, He is the Gayatri (most sacred Vedic meter); among months, He is Margashirsha (November-December, considered auspicious); among seasons, He is spring (kusumakara — the bearer of flowers).
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: "सामवेद के गीतों में मैं बृहत्साम हूँ, छन्दों में मैं गायत्री हूँ, महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ, और ऋतुओं में मैं वसन्त ऋतु हूँ।"
The Lord identifies with the most exalted in sacred music, the most powerful meter for spiritual realization, the most auspicious month, and the most beautiful season of renewal and bloom.