मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः | भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः || ५||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदअहिंसा
अहिंसा
समता
समता
तुष्टि
संतोष
तप
तप
दानम्
दान
यश
कीर्ति
अयश
अपकीर्ति
भवन्ति
होते हैं
भावा
भाव
भूतानाम्
प्राणियों के
मत्त
मुझसे
एव
ही
पृथग्विधा
अनेक प्रकार के।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति — इस प्रकार प्राणियों के ये सब भिन्न-भिन्न प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Continuing from the previous verse, Krishna lists more qualities that originate from Him. This includes both desirable qualities like non-violence and contentment, as well as undesirable ones like infamy, showing that all dualities are part of the divine manifestation.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति — ये सभी भाव प्राणियों में उन्हीं से प्रकट होते हैं। इस प्रकार वे समस्त द्वंद्वों के परम स्रोत हैं।
Lord Krishna explains that all qualities, whether considered virtuous or not, originate from Him alone. He is the ultimate source of the entire spectrum of human experiences and attributes.