मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः | सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः || ७||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदएताम्
इस
विभूतिम्
विभूति को
योगम्
योग को
च
और
मम
मेरे
य
जो
वेत्ति
जानता है
तत्त्वतः
तत्व से
स
वह
अविकल्पेन
विकल्परहित (अचल)
योगेन
योग से
युज्यते
युक्त हो जाता है
न
नहीं
अत्र
इसमें
संशयः
संशय।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो पुरुष मेरी इस विभूति और योगशक्ति को तत्व से जान लेता है, वह निश्चल योग से युक्त हो जाता है; इसमें कोई संशय नहीं है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Understanding the true nature of Krishna's divine manifestations (Vibhuti) and His Yoga power (the ability to manifest while remaining transcendent) leads to unshakable devotion. Such knowledge eliminates all doubts and establishes one firmly in the path of union with the Divine.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति मेरी इस विभूति (दिव्य ऐश्वर्य) और योगशक्ति (अद्भुत सामर्थ्य) को यथार्थ रूप से जान लेता है, वह अविकल्प (अचल) योग से युक्त हो जाता है। इसमें कोई संशय नहीं है।
Lord Krishna declares that true knowledge of His divine opulences and mystic power leads to unshakable union with Him. Such a person becomes firmly established in devotion, free from all doubts and uncertainties.