मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते | इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः || ८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदअहम्
मैं
सर्वस्य
सबका
प्रभव
उद्गम स्थान (स्रोत)
मत्त
मुझसे
सर्वम्
सब कुछ
प्रवर्तते
प्रवृत्त होता है
इति
इस प्रकार
मत्वा
जानकर
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझे
बुधा
ज्ञानी पुरुष
भाव-समन्विता
भाव से युक्त।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं सम्पूर्ण जगत का उद्गम स्थान हूँ; मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है। ऐसा जानकर भावपूर्ण भक्तियुक्त ज्ञानीजन मेरा भजन करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
This is one of the most important verses of the Gita. Krishna declares Himself to be the source of everything — both material and spiritual. The wise, understanding this fundamental truth, worship Him with full devotion and love. Verses 8-11 are considered the four essential verses of the Gita by many commentators [citation:7].
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: "मैं समस्त सृष्टि का उद्गम स्रोत हूँ; मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है।" यह गीता का एक मूल मंत्र है। जो ज्ञानीजन इस सत्य को हृदयंगम कर लेते हैं, वे भावपूर्ण होकर मेरा भजन करते हैं।
This verse establishes Krishna as the Supreme Cause of all causes. He is not merely a teacher or an avatar but the very source from which everything emanates. Wise devotees, recognizing this truth, worship Him with deep feeling and devotion.